उदारीकरण के साथ सांप्रदायिकता-जातिवाद का फन फैलाता जहरीला नाग

जैसे-जैसे देश और दुनिया के मुनाफाखोरों के लिए देश का बाजार चारागाह बनता गया, जनता की बुनियादी जरूरतों- रोजी-रोटी का संकट बढ़ता गया और सांप्रदायिक और जातिवादी खेल भी तीखा होता गया।…

उदारीकारण यानी मेहनतकश जनता की बर्बादी के तीन दशक -दसवीं किस्त

बंटों और राज करो : कैसे होता गया साम्प्रदायिकता-जातिवाद हावी?

80 के दशक में जब से इन आम जन विरोधी नीतियों को लागू करने का नया दौर शुरू हुआ, और जैसे-जैसे यह गति पकड़ती गई, वैसे-वैसे धार्मिक और जातीय विद्वेष को और गति दिया जाने लगा। जनता को धर्म-जाति और दूसरे-तीसरे मुद्दों में उलझाने का काम भी आगे बढ़ता गया। जाहिरा तौर पर इस खेल में सभी चुनावी राजनीति पार्टियां शामिल रहीं। लेकिन सबसे महारत आरएसएस-भाजपा सिद्ध हुईं।

80 के दशक में एक तरफ मंडल कमेटी की रिपोर्ट आई जिसका राजनीतिक पार्टियों ने जातिगत बंटवारे के खेल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। वहीं दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद को गहरा किया जाने लगा। सामाजिक न्याय के मसीहाओं से लेकर “हिन्दू” धर्मध्वजावाही की किस्में तेजी से पनपती और विस्तार लेते हुए समाज को मारकाट के गहरे दलदल में धकेलने का काम किया।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

दरअसल इन चालीस सालों में देश के आर्थिक व सामाजिक हालात देश को जहाँ पहुंचा रहे थे, वहाँ जनता का असन्तोष फूटकर सड़कों पर उबल पड़ने की प्रबल संभावना थी। ऐसे में इसकी सबसे कारगर काट है जाति-धर्म और अन्धराष्ट्रवाद के नाम पर लोगों को टुकड़े-टुकड़े में बांट देने की राजनीति।

वैसे तो सभी चुनावी पार्टियां यही खेल खेलती रही हैं लेकिन इस काम को सबसे बख़ूबी अंजाम देने में महारत संघ-भाजपा को है, जिनकी पूरी सोच ही ग़रीबों, दलितों, अल्प‍संख्यकों, महिलाओं के प्रति गहरी घृणा से भरी हुई है।

ऐसे में मुनाफाखोर नीतियों से भुखमरी, कुपोषण और ग़रीबी का चेहरा और विद्रूप होने लगा, तो देश के सामने राष्ट्र को खड़ा कर दिया गया। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई जैसी बुनियादी चीजों के बजाय मंदिर और मस्जिद ज़्यादा बड़े मुद्दे बना दिए गए।

यहाँ यह गौर करने की बात है की 1990 आते-आते जब देश को नई आर्थिक नीतियों यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की ओर धकेला गया; ठीक इसी समय मंडल के नाम पर अगड़े-पिछड़े की लड़ाई और जबरदस्त खून खराबे, दंगे फसाद हुए। (आरक्षण के बहाने 1989-90 में फसाद)।

यही वह समय था जब बाबरी मस्जिद ध्वंस के लिए रथ यात्राएं निकलीं (1990)। 1991 में नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह की सरकार में नई आर्थिक नीति का ताना-बाना बना, ठीक उसी समय बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ और पूरा देश दंगे की आग में झोंक दिया गया (1992)।

देश और दुनिया के पूँजीपति लुटेरों के लिए देश का बाजार चारागाह बनता गया और रोजगार घटते गए, महंगाई बढ़ती गई, भ्रष्टाचार बढ़ता गया। ऐसे ही समय में दंगे फसाद और भी ख़तरनाक रूप लेते रहे। सन 2000 आते-आते बीमा क्षेत्र का निजीकरण, मज़दूर विरोधी द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट, पेंशन के खातमे जैसे बड़े जनविरोधी कदमों के दौर में गुजरात का भयावह दंगा भी हुआ (2002)।

गुलामी की ये नीतियां जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे गोरक्षा, लव जिहाद जैसे तमाम-तमाम तरीकों से जनता को भीड़ तंत्र में बदलकर पूरे मुद्दों से ही भटका दिया गया। जनता का एक बड़ा हिस्सा इसके मायाजाल में उलझता गया और बढ़ती तबाही को भूलकर खून खराबे का हिस्सेदार बनाता गया।

मनमोहन सिंह सरकार के दौरान पूँजी के हित में विकास की गति धीमी पड़ने लगी तो देश-दुनिया के पूँजीपतियों ने अथाह धन बहाकर मोदी की सरकार बनवाई। देश भर में साम्प्रदायिक नफ़रत फैला कर भाजपा द्वारा केन्द्र सरकार पर काबिज होना मुनाफे के हित में था। मालिकों के हित में नीतियों को तेजी से बेरोकटोक लागू करना और जनता को दूसरे मुद्दों में उलझाए रखने में मोदी की महारत थी।

2014 में मोदी सरकार का आगमन इसी कड़ी का सबसे बदसूरत नमूना है। जब पूरा देश पाकिस्तान-कश्मीर, हिन्दू-मुस्लिम, सीएए-एनआरसी-एनपीआर के फिरकापरस्ती में उलझा दिया गया और नोटबंदी, जीएसटी से होते हुए कोरोना के दौर तक जनता अधिकारविहीन और कंगाल होती चली गई।

पिछले सात वर्षों के दौरान देशभर में नफ़रत की आँधी चलाकर और जुनूनी भीड़ को उकसाकर कमज़ोरों की हत्‍याएँ करवाने का जो घिनौना अभियान संघ-भाजपा ने चलाया है उसके भयावह नतीजे सामने हैं।

व्‍हाट्सऐप पर फैलाये गये झूठ और अफ़वाहों, अनजान शत्रु के ख़ि‍लाफ़ गु़स्‍से से भरे बेरोज़गार व हताश नौजवानों की फ़ौज, सत्‍ता के खुले संरक्षण ने हर राज्‍य में ऐसी हिंसक और तर्कहीन भीड़ तैयार की है जो ज़रा से उकसावे पर किसी की भी जान ले सकती है। साम्‍प्रदायिक विद्वेष व अन्धराष्‍ट्रवाद का उन्‍मादी शोरगुल देश भर में फैल गया है।

धार्मिक, जातीय और अन्‍धराष्‍ट्रवादी नफ़रत का ज़हर पूरे समाज की पोर-पोर में फैलाने में ये कामयाब हो रहे हैं। योगी सरकार ने हाल ही में उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियन्त्रण, स्थिरीकरण एवं कल्याण) विधेयक – 2021 का प्रारूप जारी किया है। यह जनता के जनवादी अधिकारों पर एक फ़ासीवादी हमला है जिसमें यह प्रावधान करने का प्रस्ताव है कि दो से ज़्यादा बच्चों वाले माँ-बाप के निकाय चुनाव लड़ने, सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने, राशन कार्ड बनवाने, सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने और प्रमोशन हासिल करने आदि पर रोक लगा दी जायेगी।

इस सांप्रदायिक हमले के साथ लोगों को यह झूठ भी परोसा जा रहा है कि प्रदेश में ग़रीबी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का असली कारण यह है कि आबादी बहुत ज़्यादा हो गयी है!

भाजपा सरकारों ने सेना-पुलिस-न्‍यायपालिका और चुनाव आयोग सहित तमाम संवैधानिक संस्‍थाओं और शिक्षा-संस्‍कृति-विज्ञान आदि के संस्‍थानों तक में अपनी पैठ बनायी है और उनका बहुत योजनाबद्ध ढंग से भगवाकरण किया है। जनाब मोदी ने इसमें भी कुशलता से क़दम बढ़ाया है।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

ज्ञान की जगह अज्ञानता, कर्मकांड का सचेतन विकास

इस पूरे दौर में बड़े ही सचेतन तौर पर कला, साहित्य, संस्कृत, इतिहास, शिक्षा हर मोर्चे पर एक खतरनाक एजेंडा लागू होता रहा। भाजपा-आरएसएस ने तमाम महत्वपूर्ण अकादमी-शैक्षिक संस्थाओं, सरकारी-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों एवं मीडिया को अपनी जनविरोधी विचारधारा एवं संस्कृत के रंग में रंग देने में कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ी।

लंबे संघर्षों व कुर्बानियों की परंपरा से अर्जित क्रांति के विचार, प्रगति की आत्मा, इतिहासदृष्टि, सौंदर्यबोध, कला-साहित्य-संस्कृत और जनवादी अधिकारों व आजादी को इन्होंने मटियामेट करके ‘इतिहास विहीन युग’ की ओर धकेल दिया।

तर्क, ज्ञान-विज्ञान की जगह अवैज्ञानिकता को बढ़ावा दिया गया और जनता को तर्कविहीनता में ठेला गया। जनता के विचार और कर्म दोनों में गोबर और गोमूत्र पिरो दिए गए। पुराणों और मिथकों, किस्से-कहानियों को इतिहास बना कर पेश किया जाने लगा।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

मेहनतकश जनता बन गई एक-दूसरे की दुश्मन

इन सालों में न जाने कितने कत्लेआम रचे गए; न जाने कितने लोगों की हत्याएं हुई, कितने प्रेमी युगलों की पिटाई हुई और अल्पसंख्यक समुदाय तथा दलित जातियां भय के पूरे एक माहौल में धकेल दी गई।

साफ तौर पर अगर खुली दिमाग से देखने की कोशिश की जाए तो स्पष्ट है कि जैसे-जैसे जनता की बुनियादी समस्याओं, रोजी-रोटी का संकट बढ़ता गया है, वैसे-वैसे सांप्रदायिक और जातिवादी खेल भी तीखा होता गया है।

संघ पोषित मोदी सरकार की जनता को धर्म-जाति के नाम पर विभाजित करने की नीति जो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की राजनीति है, और ज्यादा उजागर हो गई है। दूसरी ओर मोदी सरकार की पूँजीपति और कॉरपोरेट के प्रति पक्षधरता भी और स्पष्ट रूप से सामने आई है।

कुल मिलकर धार्मिक, जातीय और अन्‍धराष्‍ट्रवादी नफ़रत का ज़हर पूरे समाज की पोर-पोर में फैलाकर, जनता को बुरी तरह बांटकर, एकदूसरे को ही अपना दुश्मन बनाकर ये फासिस्ट ताक़तें बेरोज़गारी, ग़रीबी और महँगाई के कारण जनता में सुलग रहे ग़ुस्से को एक व्‍यापक आन्‍दोलन के रूप में फूट पड़ने से रोकने में कामयाब हैं।

जाति, धर्म, भाषा, इलाक़ा आदि-आदि के नाम पर लगातार टुकड़ों में बाँटने की साज़िशें जारी हैं। लोगों को सोचने न दिया जाये, इसके लिए टीवी, अख़बार, फ़िल्में और पूरा मीडिया लगातार झूठ, अन्धविश्वास, जादू-टोने, पिछड़े मूल्यों-मान्यताओं, अश्लीलता और अज्ञानता परोसने में लगा हुआ है।

क्रमशः जारी

अगली कड़ी में पढ़ें- उदारीकारण की बयार के साथ बढ़ता दमनतंत्र

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