उदारीकारण के तीन दशक : 134 करोड़ लोगों का देश एक फीसदी पूँजीपतियों का उपनिवेश

उदारीकरण ने यह तय कर दिया था कि जिसके पास धन होगा, उसे ही सेवाएं हासिल होंगी। सरकार धीरे-धीरे जनकल्याणकारी राज्य की अवधारणा का परित्याग कर देगी और मोदी राज तक आते-आते यही हुआ भी है।…

उदारीकारण यानी मेहनतकश जनता की बर्बादी के तीन दशक -आठवीं किस्त

मुनाफाखोर होते खरबपति, मज़दूर होते कंगाल

उदारीकरण और निजीकरण ने एक तरफ़ तो पूँजी और संसाधनों को कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित किया है, तो दूसरी तरफ निजीकरण के लिए राज्य व्यवस्था ने लोक अधिकारों, बुनियादी सेवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा आदि पर अपनी ज़िम्मेदारियों को सीमित किया है।

भारत में वर्ष 1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के शुरू होते समय एक भी डॉलर अरबपति नहीं थे। वर्तमान में 121 अरबपति भारत की न सिर्फ़ अर्थव्यवस्था को ही अपने नियंत्रण में ले चुके हैं, बल्कि भारतीयों का व्यवहार, उपभोग और समझदारी को भी लगभग अपने क़ब्ज़े में कर लिया है। जबकि व्यापक मेहनतकश आबादी का कंगालीकरण हुआ है और एक बड़ी आबादी रसातल में चली गई है।

किसी देश के आर्थिक विकास का साधारण मतलब तो यही होता है कि वहाँ की आम जनता की गरीबी दूर हो, सबको रोजगार मिले, अमन-चैन का माहौल हो, कम से कम हर हाथ को काम हर पेट को रोटी मिले। सबको शिक्षा और इलाज मिले। लेकिन यहाँ तो विकास कुछ और हो रहा है। मज़दूर लगातार कंगाल बनता जा रहा है।

दरअसल मज़दूर जितना अधिकतम श्रम करता है, उसको लूटने वालों की आमदनी उतनी ही बढ़ती जाती है और महंगाई की लूट उसकी छोटी सी आमदनी को और भी ज्यादा मुश्किल में डाल देती है। यही है कंगालीकरण की प्रक्रिया। बीते 30 सालों में यह हो रहा है। जैसे-जैसे मुट्ठीभर अरबपति खरबपति बन रहा है, व्यापक मेहनतकश मज़दूर कंगाल होता जा रहा है।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

असमानता तीन दशक में चरम पर

एक रिपोर्ट के अनुसार 45 करोड़ भारतीय ग़रीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की मानव विकास रिपोर्ट में भारत 188 देशों की सूची में खिसककर अब 131वें स्थान पर पहुँच गया है। दक्षिण एशियाई देशों में यह तीसरे स्थान पर, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों से भी पीछे चला गया है।

दुनिया के किसी भी हिस्से से अधिक, 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। एक तिहाई आबादी भूखी रहती है और यहाँ हर दूसरे बच्चे का वज़न सामान्य से कम है।

वैश्विक भूख सूचकांक के आधार पर बनी 119 देशों की सूची में भारत बांगलादेश से भी नीचे 100वें स्थान पर है। बेरोज़गारी की दर लगातार बढ़ती जा रही है। हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा करके सत्ता में आयी मोदी सरकार ने बेरोजगारी की भयवाहता को छुपने के लिए 2018 में रोज़गार के आँकड़े जुटाने और जारी करने की व्यवस्था को ही बन्द कर दी।

शिक्षा अमीरजादों की बनी बपौती

दुनिया का हर चौथा अशिक्षित व्यक्ति भारतीय है। ग्रामीण इलाक़ों में तो 36 प्रतिशत लोग आज भी पढ़ना-लिखना नहीं जानते। दक्षिण एशिया के ग़रीब मुल्क़ों में भी प्रौढ़ शिक्षा दर और युवा/बाल शिक्षा दर दोनों के लिहाज़ से भारत चौथे स्थान पर है।

करोड़ों बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पाते हैं। उनमें भी बड़ी संख्या में बच्चे कक्षा एक से आठवीं के बीच पढ़ाई छोड़ देते हैं। ज्यादातर सरकारी स्कूलों के पास ढंग के कमरे, डेस्क, पीने का पानी, शौचालय जैसी न्यूनतम सुविधाएँ भी नहीं हैं। इसके बावजूद सरकारी स्कूलें लगातार बन्द हो रही हैं। शिक्षा मद में लगातार कटौतियाँ जारी हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों का शिक्षा पर ख़र्च 1991-92 में 4 प्रतिशत से घटकर 2021 में 3.1 प्रतिशत रह गया।

पिछले वर्षों में केंद्र व राज्य सरकारों का शिक्षा के निजीकरण और कॉरपोरेटिकरण पर जोर बढ़ता गया है। कोरोना महामारी के दौर में एक बड़ा हमला शिक्षा क्षेत्र पर हुआ है। डेढ़ साल से स्कूल-कॉलेज बंद हैं या आधे-अधूरे तरीके से खुले हैं। ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर बच्चों की सामूहिकता और पठन-पठन को सचेतन मटियामेट किया गया है।

इसी दौरान नई शिक्षा नीति के बहाने शिक्षा को कॉरपोरेट के हवाले करने के साथ भगवाकरण किया गया है। इससे एक तरफ तो शिक्षा को मुट्ठीभर अमीरजादों की बपौती बना दी गई है तो दूसरी तरफ आमजन के लिए अवैज्ञानिक व अतार्किक शिक्षा का प्रारूप थोपने का इंतेज़ाम कर दिया गया है।

जीते जी दावा-इलाज नहीं, मरने पर कफ़न भी नहीं

बुनियादी सुविधा स्वास्थ्य भी आम जनता से दूर है। जो थोड़ी बहुत सुविधा मिली भी थी, वह भी मुनाफाखोरों के हवाले हो गई। पहले से ही सीमित सरकारी अस्पतालों के निजीकरण या पीपीपी में संचालन से जनता के निःशुल्क इलाज का हक़ भी छिनता जा रहा है। कई राज्यों में सरकारी अस्पतालों पर्ची-जाँच भी बाजार भाव पर हो चुका है।

सरकारी अस्पतालों को दुर्दशा में धकेलकर बड़े-बड़े महँगे कॉर्पोरेट अस्पताल खुलते गए, जहाँ आम जनता जाने की भी नहीं सोच सकती। कोरोना महामारी के दौरान भयावह अव्यवस्था स्वास्थ्य की हक़ीक़त का दर्पण है। भारत का स्वास्थ्य पर ख़र्च कम्बोडिया, म्यांमार, तोगो, सूडान, गिनी और बुरुंडी जैसे ग़रीब देशों से भी कम है।

संयुक्त राष्ट्र की एक मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार एक भारतीय बच्चा सामान्य तकनीकी इलाज के अभाव में पाँच वर्ष का होने से पहले ही मर जाता है। प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका ‘लैंसेट’ के एक अध्ययन के मुताबिक़, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और लोगों तक उनकी पहुँच के मामले में भारत विश्व के 195 देशों में 145वें पायदान पर है।

पिछले दस वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारों ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का औसतन 1.1% से 1.5% तक ख़र्च किया। भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ख़र्च होने वाला जीडीपी का प्रतिशत पिछले 10 वर्ष से ज़्यादा समय से 1% के आसपास ही बना हुआ है। इलाज का लगभग 73% हिस्सा जनता को अपनी जेब से देना पड़ता है।

आज की हक़ीक़त यह है कि भारत में 23% बीमार लोग इलाज का ख़र्च उठा ही नहीं सकते हैं। आज भी देश में 1456 लोगों पर 1 डॉक्टर है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1000 लोगों पर 1 डॉक्टर होना चाहिए। गाँवों, छोटे क़स्बों में स्थिति और खराब है। 70 फ़ीसदी स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढाँचा देश के 20 बड़े शहरों तक ही सीमित है। देशभर में 30 फ़ीसदी लोग प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक से वंचित हैं।

सरकारी आंकड़ां के मुताबिक 50 साल पहले 5 व्यक्तियों का परिवार एक साल में जितना अनाज खाता था, आज उससे 200 किलो कम खाता है। दाल, सब्जियों, दूध आदि की भयावह कीमत के बीच भोजन में विटामिन और प्रोटीन जैसे जरूरी पौष्टिक तत्वों की लगातार कमी होती गयी है।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

क्रमशः जारी… अगली किस्त में पढ़ें- महँगाई बेलगाम : दाल-रोटी भी मोहाल

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