लेबर कोड विरोधी मज़दूर कन्वेंशन : 23 को काला दिवस; 27 को भारत बंद का सक्रिय समर्थन

मासा के कन्वेंशन ने पाँच प्रस्ताव पारित किया और चारो लेबर कोड, काले कृषि क़ानूनों, निजीकरण, छंटनी, बंदी के खिलाफ जुझारू, निरंतर व निर्णायक आंदोलन को तेज करने का संकल्प मजबूत किया।

23 सितंबर को काला दिवस मनाने का आह्वान; 27 सितंबर भारत बंद का सक्रिय समर्थन

मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे हैं मज़दूर विरोधी चार श्रम संहिताओं के खिलाफ 19 सितंबर को मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA) की ओर से दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक मज़दूर कन्वेंशन का आयोजन हुआ। इस दौरान मज़दूर विरोधी चारों लेबर कोड को रद्द करने की मांग को बुलंद करने के साथ 23 सितंबर को देशभर में काला दिवस मनाने का आह्वान किया गया। साथ ही किसान संगठनों के आह्वान पर 27 सितंबर भारत बंद का सक्रिय समर्थन करने की घोषणा की गई।

कन्वेन्शन में आईएफटीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष कॉम एस बी राव ने कहा कि पिछली शताब्दी में 70-80 सालों तक मज़दूर संघर्षों की धमक थी, जिससे मज़दूरों को तमाम कानूनी अधिकार मिले। इसीलिए 1972 तक जो भी कानून बने वह मज़दूरों के पक्ष में थे, लेकिन 80 के दशक से कानूनों में जो भी परिवर्तन हुए, वे मज़दूर विरोधी रहे। संघर्षों के कमजोर होते जाने का ही परिणाम है कि आज 29 कानूनों को चार लेबर कोड में बदल कर मज़दूरों को कानूनी तौर पर बेहद कमजोर बना दिया गया है।

कर्नाटका श्रमिक शक्ति के वर्ध राजेंद्रा ने कहा कि हमला मज़दूरों पर भी बड़ा है और किसानों पर भी, इसलिए मज़दूरों-किसानों को मिलकर लड़ना होगा। कॉरपोरेट-पक्षीय कृषि कानूनों के खिलाफ जुझारू व निर्णायक संघर्ष में डटे किसानों को सलाम पेश करते हुए कहा कि किसानों के लंबे दौर से चल रहे आंदोलन से मज़दूरों को सीख लेना होगा और लेबर कोड के विरोध में संघर्ष को तेज करना होगा।

नए लेबर कोड के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए एसडब्लूसीसी बंगाल के अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि मोदी सरकार ने 1914 में ‘इज डूइंग बिजनेस’ के तहत 92 पॉइंट प्रस्तुत किया, जिसके तहत ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों के बीच श्रम कानूनों में बदलाव, निजीकरण, छँटनी, बंदी का खेल तेज हुआ। इसी के तहत 29 श्रम कानूनों को खत्म करके चार श्रम संहिताएं बनी।

उन्होंने बताया कि इनमें से एक वेतन संहिता 2019 में और बाकी तीन (औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा व व्यावसायिक व कार्यदशाओं की सुरक्षा) कोरोना पाबंदियों के बीच पिछले साल जन विरोधी कृषि कानूनों के बाद 23 सितंबर को संसद में पारित हुए।

नए क़ानून ‘हायर एंड फायर’ के तर्ज पर हैं, यानी मालिकों द्वारा मनमर्जी रखना-निकालना आसान होगा। अब स्थायी रोजगार खत्म होकर फिक्स टर्म आ रहा है, वेतन घटेगा, काम के घण्टे बढ़ेंगे, यूनियन बनाना, आंदोलन करना बेहद मुश्किल होगा। इसके तहत कर्मकार की परिभाषा बदल दी गई, स्थाई रोजगार की जगह फिक्स टर्म अनुबंध लाया गया, वेतन निर्धारण का मानदंड बदल दिया गया।

कहा कि इनसे जहां संगठित क्षेत्र बर्बाद हो जाएगा, वहीं असंगठित क्षेत्र, जिसमें 90% से अधिक मज़दूर अनिश्चित परिस्थितियों में कार्यरत हैं और जो पहले से ही ज़्यादातर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर है, सबसे बुरी तरह प्रभावित होगा। यह मज़दूरों के सामने बड़ी चुनौती है, जिसका मुकाबला सड़क पर उतरकर कराना होगा।

जन संघर्ष मंच हरियाणा के कॉम पाल सिंह ने कहा कि मोदी सरकार जनता के खून पसीने से खड़े देश की सार्वजनिक व सरकारी संपत्तियों को बेचने, रेल, बैंक, बीमा, संचार से लेकर तेल, कोल तक सबका निजीकरण तेज कर दिया है। बातों की लफ्फाज मोदी सरकार बेहयाई से निजीकरण को अब किराए पर देना बता रही है।

आईएफटीयू सर्वहारा की कॉम विदुषी ने फासीवाद के बढ़ते खतरों की चर्चा करते हुए कहा कि मोदी सरकार द्वारा लगातार नीतियों पर हमले, समाज पर हमले और मज़दूर वर्ग पर हमले और दमन तेज हो गए हैं। उन्होंने कहा कि चार लेबर कोड दस्तावेज है, जो फासीवाद के बढ़ने को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के गहराते संकट और गिरते मुनाफ़ा दर के मद्देनज़र सरकारों द्वारा अपने पूंजीवादी-साम्राज्यवादी आकाओं के लिए लागू की गई नव-उदारवादी नीतियों का ही यह प्रत्यक्ष परिणाम है। जिसने बुर्जुआ जनवाद व फासीवाद के गठजोड़ को मजबूत किया।

टीयूसीआई के कॉम उदय ने कहा कि मोदी सरकार का यह हमला पूरी मेहनतकश जनता पर है। जन विरोधी तीन कृषि क़ानून, बिजली संशोधन विधेयक मोदी सरकार के हमलों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। करीब 10 माह से जारी किसानों के जनांदोलन के बावजूद मोदी सरकार की हठधर्मिता कायम है। ऐसे में क्रांतिकारी शक्तियों को जोड़कर एक बड़ा आंदोलन खड़ा करना होगा।

मज़दूर सहयोग केंद्र के कॉम मुकुल ने कहा कि पिछले चार दशक से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की जो नीति लागू हो रही है उसके कारण एक तरफ विदेशी पूँजी के प्रवाह के साथ निजीकरण, छँटनी, बंदी तेज होती गई है, तो दूसरी तरफ मंडल कमीशन की रिपोर्ट और बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि के बहाने जाति और धर्म के नाम पर दंगे फसाद और सांप्रदायिक विद्वेष तेज होते गए। वहीं बोफोर्स से लेकर राफेल घोटाले तक भ्रष्टाचार विकराल रूप लेता गया। इसी के साथ मेहनतकश जनता का दमन तेज होता गया, निजता पर हमले बढ़ते गए और सरकार का निगरानी तंत्र भी मजबूत होता गया। खच्चर घोड़े की गति से शुरू यह दौर मोदी राज में ‘बुलेट; रफ्तार से दौड़ रही है।

एसडब्लूसी तमिलनाडु के कॉम सतीश ने कहा कि मोदी सरकार के लेबर कोड के साथ, 3 काले कृषि कानून, फिशरीज कानून, बिजली संशोधन बिल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और ‘राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन’, कृषि, शिक्षा और देश की सभी सार्वजनिक संपत्तियों को कॉर्पोरेट को सौंप देने हेतु हैं। 

एआईडब्लूसी के कॉम होमेन्द्र मिश्रा ने रोडवेज के संविदा मज़दूरों के संघर्ष को बताया और कहा कि यदि शरीर में एक जगह कोई बीमारी है तो पूरे शरीर में ही दर्द होगा, इसलिए सबको मिलकर आंदोलन को आगे बढ़ाना होगा।

इंक़लाबी मज़दूर केंद्र के कॉम श्यामबीर ने कहा कि पिछले दशकों में मज़दूर वर्ग पर हमले लगातार बढ़ते रहे हैं, जिसे मोदी सरकार ने बेलगाम बना दिया। कोविड आपदा को कॉरपोरेट के हित में अवसर में बदल दिया। लंबे संघर्षों के दौरान मज़दूरों के हासिल श्रम क़ानूनी अधिकारों को मालिकों के हित मे सीमित करने, बेलगाम शोषण, जीवन-आजीविका के बढ़ते संकट और मज़दूर आंदोलन पर भारी दमन इसके गवाह हैं। कहा कि वर्तमान लेबर कोड बाजपेयी सरकार के समय आए द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट पर ही आधारित और घोर मज़दूर विरोधी है। कहा कि अब क़ानून विहीन मज़दूरों को वैसा ही संघर्ष कराना होगा, जैसा अतीत में हुआ।

कन्वेंशन ने 23 सितंबर, 2021 को संसद में 3 लेबर कोड पारित होने के एक वर्ष होने पर ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाने का मज़दूरों से आह्वान किया। साथ ही 27 सितंबर 2021 को भारत बंद के आह्वान को सफल बनाने की अपील की है।

कार्यक्रम का संचालन ग्रामीण मज़दूर यूनियन, बिहार की ओर से कॉम संतोष ने किया। कॉम अमित ने मासा की ओर से सदन में पाँच प्रस्ताव प्रस्तुत किये।

कन्वेंशन के खुले सत्र के दौरान नयन ने मज़दूर पक्षीय क़ानून क्या हो, इसको स्पष्ट करने की ज़रूरत बताई। मज़दूर साथी योगेश ने सवाल उठाया कि हम क्या कर रहे हैं? मज़दूर वर्ग का जुझारू आंदोलन नदारद है। रेंग-रेंगकर बुर्जुआ तरीके से आगे बढ़ने से कुछ नहीं होगा, बल्कि क्रांतिकारी तरीके से आंदोलन को धार देना पड़ेगा। जबकि रोहित मिश्रा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज जैसा चल रहा है वह नाकाफी है।

कन्वेंशन द्वारा सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव-

  1. मासा मज़दूर विरोधी नए श्रम संहिताओं का कड़ा विरोध करती है और सभी नए नियमावली के साथ इन श्रम संहिताओं को तत्काल वापस लेने की मांग करती है। इसके बजाय, श्रमिकों की जरूरतों के अनुसार श्रम कानूनों में सुधार किया जाना चाहिए। मासा को लगता है कि इन नई संहिताओं के खिलाफ और मज़दूर समर्थक सुधारों के लिए मज़दूर वर्ग का एक निरंतर, जुझारू और निर्णायक संघर्ष समय की जरूरत है। इस सम्मेलन से, मासा अन्य संघर्षरत मज़दूर वर्गीय संगठनों और यूनियनों के साथ इस संघर्ष को अखिल भारतीय स्तर पर विकसित करने के लिए अपनी भूमिका निभाने के लिए प्रतिबद्ध है। मासा नए श्रम संहिताओं के पारित होने के एक वर्ष बाद, आगामी 23 सितंबर 2021 को, ‘ब्लैक डेके रूप में मनाएगा और देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन आयोजित करेगा।
  2. मासा केंद्र सरकार के घोर मज़दूर-विरोधी और जन-विरोधी निजीकरण का कड़ा विरोध करता है तथा निजीकरण और निगमीकरण के खिलाफ खनन, ऑर्डिनेंस, स्टील, पेट्रोलियम, बैंकिंग, रेलवे, परिवहन आदि विभिन्न क्षेत्रों में चल रहे श्रमिकों के संघर्ष को समर्थन और एकजुटता प्रदर्शित करता है।
  3. मासा किसान विरोधी, मज़दूर विरोधी और जनविरोधी कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान संघर्ष के प्रति मजबूत एकजुटता के साथ खड़ा है और भारतीय और विदेशी बड़ी कॉर्पोरेट पूंजी और फासीवादी ताकतों की गठजोड़ के हमलों के खिलाफ व्यापक मज़दूर-किसान एकता का आह्वान करता है। मासा 27 सितंबर को एसकेएम के भारत बंदके आह्वान को सक्रिय समर्थन देता है।
  4. मासा विद्युत संशोधन विधेयक 2021 और भारतीय समुद्री मत्स्य विधेयक 2021 का विरोध करता है और इन बिलों को तत्काल वापस लेने की मांग करता है।
  5. मासा मज़दूरों, किसानों और लोकतांत्रिक आंदोलनों पर चल रहे दमन की निंदा करता है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघबद्धता की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध की स्वतंत्रता के साथ खड़ा है। मासा सभी राजनीतिक बंदियों की तत्काल रिहाई और UAPA सहित सभी कठोर कानूनों को वापस लेने की मांग करता है।

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