मजदूर-विरोधी लेबर कोड के खिलाफ 19 सितंबर को दिल्ली में मासा द्वारा कन्वेंशन

मजदूर-विरोधी लेबर कोड के खिलाफ मासा द्वारा 19 सितंबर (रविवार), को शाम 6 बजे से गांधी पीस फाउंडेशन, आईटीओ, दिल्ली में कन्वेंशन होगा और 23 सितंबर को देशव्यापी काल दिवस मानेगा।

23 सितंबर 2020 को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा आजाद भारत की संसद में अडाणी-अम्बानी जैसे एकाधिकारी पूंजीपतियों के इशारों पर मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को पारित कराकर मजदूर वर्ग पर भीषण हमला बोला था। इसके विरोध में संघर्षशील ट्रेड यूनियनों/मज़दूर संगठनों के साझा मंच मासा की ओर से 19 सितंबर को दिल्ली में कन्वेन्शन होगा। जबकि मज़दूर विरोधी श्रम संहिताओं के विरोध में 23 सितंबर को देशव्यापी काल दिवस मनाया जाएगा।

दिल्ली कन्वेन्शन के लिए मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) द्वारा आमंत्रण जारी किया गया है, जिसे हम यहाँ साझा कर रहे हैं-

साथियों,

पिछले दशकों में मजदूर वर्ग पर हमले लगातार बढ़ते रहे हैं। श्रम कानून में ‘सुधार’, बेलगाम शोषण, जीवन-आजीविका के बढ़ते संकट और मजदूर आंदोलन पर भारी दमन इसके गवाह हैं। पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के गहराते संकट और गिरते मुनाफ़ा दर के मद्देनज़र सरकारों द्वारा अपने पूंजीवादी-साम्राज्यवादी आकाओं के लिए लागू की गईं नव-उदारवादी नीतियों का ही यह प्रत्यक्ष परिणाम है।

भारत में, भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार ने 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद से इस प्रक्रिया को अभूतपूर्व रूप से तेज किया है। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर मजदूर विरोधी ‘सुधारों’ के बाद इसने, अपने ही शब्दों में, कोविड “आपदा को अवसर” में बदलते हुए एक साल पहले संसद में चार नई श्रम संहिताओं अथवा लेबर कोड को पारित कर भारत के मजदूर वर्ग पर सबसे बड़े हमले को अंजाम दिया। राष्ट्रपति द्वारा हरी झंडी मिल जाने के बाद अब इन 4 संहिताओं के कार्यान्वयन के लिए केवल राज्यों द्वारा संहिताओं पर नियमावली तैयार किए जाने की देर है, जो रिपोर्ट के अनुसार आगामी 1 अक्टूबर तक पूरा हो सकता है।

ये श्रम संहिताएं न केवल 44 श्रम कानूनों की मौजूदा प्रणाली को ध्वस्त करेगी, बल्कि मजदूर वर्ग के सबसे बुनियादी अधिकारों और शक्तियों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी या वस्तुतः समाप्त कर देगी जैसे यूनियन गठन, हड़ताल, सामूहिक समझौता, स्थाई नौकरी, सामाजिक सुरक्षा, कार्यस्थल पर सुरक्षा आदि।

जहां संगठित क्षेत्र बर्बाद हो जाएगा, वहीं असंगठित क्षेत्र, जिसमें 90% से अधिक मजदूर अनिश्चित परिस्थितियों में कार्यरत हैं और जो पहले से ही ज़्यादातर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर है, सबसे बुरी तरह प्रभावित होगा। मजदूरों द्वारा संघर्ष व बलिदान से हासिल किए गए अधिकारों व सुरक्षाओं के छिन जाने से मजदूर वर्ग को पूंजी की नंगी तानाशाही के अंतर्गत सदियों पीछे धकेल दिया जाएगा, जहां उजरती-गुलामी की वास्तविकता पूर्णतः उजागर होगी। वस्तुतः सभी क्षेत्रों में हड़ताल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने हेतु लाया गया ‘आवश्यक रक्षा सेवा अधिनियम, 2021’ इसका एक ज्वलंत उदाहरण है।

इसी फासीवादी नीति के तहत मोदी सरकार ने 3 काले कृषि कानून, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और ‘राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन’ भी पारित करवाया है, कृषि, शिक्षा और देश की सभी सार्वजनिक संपत्तियों को कॉर्पोरेट को सौंप देने हेतु। कॉरपोरेट-पक्षीय कृषि कानूनों के खिलाफ जुझारू व निर्णायक संघर्ष में डटे किसानों को हम सलाम करते हैं और 27 सितंबर 2021 को भारत बंद के आह्वान को सफल बनाने की अपील करते हैं। हम 23 सितंबर को संसद में लेबर कोड पारित होने के एक वर्ष होने पर ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाने की भी अपील करते हैं।

उपरोक्त परिस्थितियों में हम श्रम संहिताओं के खिलाफ एक कन्वेंशन का आयोजन कर रहे हैं, इनके खतरों व नतीजों और साथ ही साथ इनके व इनके उद्गम स्रोत के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध से आगे बढ़ कर एक जुझारू निर्णायक संघर्ष को तेज करने की नीति पर चर्चा हेतु। अतः हम सभी मजदूरों और मजदूर-वर्ग की ताकतों को इस कन्वेंशन में भाग लेने के लिए सादर आमंत्रित करते हैं।

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा)

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