मानवाधिकार आयोग की चिंता संघर्षरत किसानों के प्रति नहीं, उद्योगपतियों के हित में है!

लाठी भी किसान खाए, शहादत भी किसान दे, और दोष भी किसानों पर ही थोप दिया जाए, ये काम मानवाधिकार आयोग का तो नहीं होता। हाँ मोदी राज में सत्ता संरक्षण में सब जायज है।

9 महीने बाद मानवाधिकार आयोग अचानक चिंतित क्यों?

काले कृषि क़ानूनों के खिलाफ़ दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को लेकर मानवाधिकार आयोग ने यूपी, राजस्थान, हरियाणा के साथ दिल्ली को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। आयोग ने इन सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, पुलिस महानिदेशकों के साथ दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से एक्शन टेकेन रिपोर्ट भेजने को कहा है।

सवाल यह है कि किसान आंदोलन के 9 महीने पूरे होने के बाद मानवाधिकार आयोग अचानक ‘मानवाधिकार’ के लिए चिंतित क्यों हो गया।

उसके लिए जबरदस्त ठंड, भयावह गर्मी, तूफ़ानी बारिश को नौ महीने से झेल रहे किसानों के प्रति नहीं है, 650 से ज्यादे किसानों की मौत पर चिंता नहीं है, पुलिसिया दमन और शांतिपूर्ण धरनारत किसानों पर दर्ज होते फर्जी मुकदमों पर चिंता नहीं है, बल्कि निजी कंपनियों के कथित आर्थिक नुकसान पर चिंता है।

क्या कहता है मानवाधिकार आयोग का पत्र

मानवाधिकार आयोग ने किसानों के लिए चिंता नहीं जताई बल्कि उद्योगपतियों की चिंता जताई है। आयोग ने सरकार को पत्र लिखकर कहा है कि ”ऐसे आरोप लग रहे हैं कि किसान आंदोलन से उद्योग धंधे चौपट हो रहे हैं, आना-जाना मुश्किल हो रहा है, और किसान कोरोना नियमों का पालन भी नहीं कर रहे हैं।” आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय से भी ”किसान आंदोलन से होने वाले नुकसान” पर अध्ययन करने के लिए कह दिया है।

आयोग के पत्र में कहा गया है कि आरोप है कि आंदोलन की वजह से 9 हजार माइक्रो, मीडियम और बड़ी कंपनियां प्रभावित हैं। परिवहन व्यवस्था भी बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। इसकी वजह से बुजुर्ग, दिव्यांगों को यात्रा में कठिनाइयां उठानी पड़ रही हैं। उन्हें गंतव्य तक पहुंचने के लिए लंबे रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। पत्र में ये भी कहा गया है कि धरने पर बैठे किसान कोरोना नियमों का पालन भी नहीं कर रहे।

आयोग ने इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ से आंदोलन के दुष्प्रभावों का अध्ययन करने को कहा है। यह रिपोर्ट 10 अक्टूबर तक तलब की गई है। इसके आलावा नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट, केंद्रीय गृह मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ केंद्र सरकार से भी रिपोर्ट मांगी गई हैं। दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क, दिल्ली विवि को कहा गया है कि आंदोलन के दुष्प्रभावों पर अध्ययन कर रिपोर्ट भेजें।

आख़िर किसके अधिकारों की चिंता कर रहा है मानवाधिकार आयोग!

सड़कों पर अवरोध तो सरकार ने लगाई है, तो किसानों से सवाल क्यों?

ध्यान देने वाला सवाल ये है कि अगर सड़क बंद है तो सवाल किसानों से क्यों किया जा रहा है? अगर सड़क खुदी हुई है तो किसान नेताओं से क्यों पूछा जा रहा है। सड़क तो सरकार ने खुदवाईं हैं, बेरिकेडिंग तो सरकार ने लगवाए हैं, पुलिस तो सरकार ने बुलवाई है, फिर यातायात प्रभावित होने के लिए किसानों से जवाब-तलब क्यों किये जा रहे हैं?

किसान नेताओं की तो खुद ही ये मांग रही है कि बेरिकेडिंग हटें, पुलिस हटे, सड़कें खुलें। सड़क पर बेरिकेडिंग लगना मतलब किसानों को प्रोटेस्ट करने से रोकना, प्रोटेस्ट करने से रोकना मतलब संवैधानिक अधिकार से रोकना, संवैधानिक अधिकार से रोकना, मतलब मानवाधिकारों से रोकना।

हालांकि, आयोग ने अपने पत्र में यह भी कहा कि है कि किसान प्रदर्शन के अधिकार के तहत धरने पर बैठे हैं। वो जिस तरह से शांतिपूर्ण तरीके से अपना आंदोलन चला रहे हैं उसका सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन पत्र की मूल चिंता के बीच इस लिखे हुए का कोई मतलब नहीं है।

मोदी सरकार का यह एक और दांव है!

खोपड़ी भी किसानों की फूटे, लाठी भी किसान खाए, और दोष भी किसानों पर ही थोप दिया जाए, ये काम मानवाधिकार आयोग का तो नहीं होता। हाँ मोदी राज में सत्ता संरक्षण में सब जायज है।

साफ है कि इस ऐतिहासिक किसान आंदोलन को कुचलने, बदनाम करने के लिए सत्ताधारी भाजपा, आरएसएस, पूरी मशीनरी और पूरी गोदी मीडिया सारे हथकंडे आजमा चुकी, तो अब उसने यह नया पासा फेंका है। लेकिन जज्बे के साथ आगे बढ़ता, पूरे देश में फैल चुका किसान आंदोलन इन हथकंडों से डिगने वाली नहीं है।

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