अगस्त क्रांति : आज़ादी की वह ज़ंग, जो गुलामी के नए दौर का भी परचम है!

अगस्त क्रांति मुल्क की मेहनतकश आवाम के लिए अहम प्रेरणा का स्रोत है। यह गुलामी के बंधनों को तोड़ने की जंग का आह्वान है। यह जाति-मजहब के बंटवारे की दीवार को तोड़कर साझी एकता का भी प्रतीक है।

‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ से मुनाफाखोर लुटेरों भारत छोड़ो की जंग

9 अगस्त, सन् 1942 में एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसने अंग्रेज हुक्मरानों की चूलें हिला दीं। सभी जातियों व मजहब की मेहनतकश आवाम एकसाथ उठ खड़ी हुई थीं।

‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे के साथ ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से आजादी के लिए अंतिम जंग की शुरुआत हुई थी। वीर सपूतों ने देश के तमाम हिस्सों को आजाद करा लिया था और स्वतंत्र हुकूमतें कायम कर ली थीं। और अंततः आतताई गोरे अंग्रेजों को यहां से भागना पड़ा।

इसीलिए 9 अगस्त के दिन को इतिहास में अगस्त क्रांति दिवस के रूप में जाना जाता है। आंदोलन मुम्बई के जिस पार्क से शुरू हुआ वह अगस्त क्रांति मैदान बन गया।

Success of the August Revolution is not a “Good Luck”. - National Defence  Journal

पूरे देश मे फैल गया था आंदोलन

9 अगस्त,, 1942 से शुरू इस आंदोलन की ताप पूरे देश में फैल गई। अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होते हुए बलिया के बागियों ने 19 अगस्त को बलिया में अपनी सरकार स्थापित कर ली थी। लाचार हुकूमत जेल में बंद चित्तू पांडे व उनके सहयोगियों को रिहा करने के लिए मजबूर हुई थी और बलिया आजाद घोषित हो गया था।

8 अगस्त की रात ही पटना में सैंकड़ों गिरफ्तार हुए, लेकिन आंदोलन और तेज हो गया। संघर्षशील जनता ने 48 घंटे बाद फिरंगी राज के प्रमुख प्रतीक (पुराना सचिवालय) पर तिरंगा लहरा दिया। सरकारी दफ्तर-थाने से अंग्रेज या उनके चमचे मार भगाए गए। मुज़फ्फरपुर की जनता ने तो गोंलियों का मुकाबला लकड़ी की ढाल से किया।

आरा, हाजीपुर, सीतामढ़ी व संथालपरगाना की जेल तोड़ कैदी आज़ाद हो गए। विद्रोह से डर कर मुंगेर, पुर्णिया, शाहाबाद, आरा, दरभंगा, चंपारण, भागलपुर… जिलों के 80 फीसद ग्रामीण थाने ज़िला मुख्यालयों मे आ गए। टाटा नगर में मजदूरों ने हड़ताल कर दी। चंपारण से हजारीबाग, भागलपुर तक आंदोलन तेज होता गया।

आंदोलन में लोहाघाट, अल्मोड़ा और बरेली सालम क्षेत्र के क्रांतिवीरों का योगदान स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। 25 अगस्त 1942 को अल्मोड़ा के जैंती के धामद्यो में ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेते हुए चौकुना गांव निवासी नर सिंह धानक और कांडे निवासी टीका सिंह कन्याल शहीद हो गए थे। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में भी था।

आंदोलन की बागडोर जनता के हाथ में

भारत छोड़ो आंदोलन उपनिवेशवाद से देश की मुक्ति के लिए एक निर्णायक मोड़ था। इस आंदोलन ने यह साबित किया कि आजादी हासिल करने की निर्णायक ताक़त जनता है।

इस आंदोलन की खासियत ये थी कि इसका नेत़ृत्व किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं था। अंग्रेज़ों को भगाने का देशवासियों में स्वतःस्फूर्त ऐसा जुनून पैदा हो गया कि कई जगहों पर बम विस्फोट हुए, सरकारी इमारतों को जला दिया गया, बिजली काट दी गई और परिवहन व संचार सेवाओं को भी ध्वस्त कर दिया गया। सरकारी आकलनों के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर 250 रेलवे स्टेशन, 500 डाकघरों और 150 थानों पर हमले हुए और उन्हें क्षति पहुंचाया गया।

भारतीय इतिहास के पन्नों में 9 अगस्त क्रांति दिवस का दिन

भयावह दमन का दौर

आंदोलन जितना उग्र था, अंग्रेजों ने दमन भी उतनी ही क्रूरता से किया। आंदोलन से बौखलाए अंग्रेज़ हुक्मरानों ने हजारों प्रदर्शनकारियों और निर्दोष लोगों को गोली से भून डाला, जेलों में ठूंस दिया।

इतिहासकार विपिनचंद्र के अनुसार, 1942 के अंत तक 60,000 से ज्यादा लोंगों को हवालात में बंद कर दिया गया, जिनमें 16,000 लोगों को सजा दी गई। आंदोलन तात्कालिक रूप से कुचल दिया गया, लेकिन इसने बर्तानवी हुक्मरानों के ताबूत में अंतिम कील ठोंकने का काम किया।

1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ नारे के साथ यह ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी से आजादी के अंतिम जंग की शुरुआत थी और अंततः आतताई गोरे अंग्रेजों को यहाँ से भागना पड़ा।

आजादी का ख्वाब अधूरा रहा

आज़ादी के लंबे संघर्षों के बाद अंग्रेजी गुलामी को समाप्त करके 1947 में देश के नए शासक दिल्ली की गद्दी पर बैठे थे। लेकिन जल्द ही देश की मेहनतकश आवाम समझने लगी कि जिस आजादी का सपना लेकर शहीदे आजम भगत सिंह जैसे इंक़लबियों से लेकर अगस्त क्रांति के शहीदों तक ने कुर्बानिया दी थी, दरअसल वह आजादी आम जन की आज़ादी नहीं थी।

गोरे अंग्रेज तो चले गए परंतु काले अंग्रेजों का दमनकारी राज कायम रहा और वही काले कानून, बल्कि उससे से भी ज्यादा दमनकारी क़ानून जनता पर थोपे जाते रहे। जनता के ख्वाब टूटने लगे।

जनता फिर सड़कों पर, दमन और तेज

साठ के दशक तक आते-आते देश की जनता सड़कों पर निकल रही थी। यह वह दौर था जब छात्रों के कई व्यापक आंदोलन हुए, रेलवे की सबसे ऐतिहासिक हड़ताल हुई थी। जगह-जगह मज़दूर, किसान, आम जनता लड़ रही थी। नक्सलबाड़ी आंदोलन ने कुछ भटकावों के बावजूद आजादी के नए सपनों के साथ संघर्ष के नए दौर की शुरुआत कर दी थी। पूरे देश में उथल-पुथल मचा हुआ था।

ठीक ऐसे समय में इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली देश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अचानक 25 जून 1975 को पूरे देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। विरोध के हर स्वर को कुचल दिया गया था। सत्ता विरोधी हर शख्सियत को जेल की कालकोठरी में ठूंस दिया गया।

जन दबाव में 1977 में आपातकाल का कला दौर खत्म हुआ। काला ‘मीसा’ कानून खत्म हो गया, लेकिन नए सत्ताधारियों ने मिनी मीसा लागू कर दिया। और तब से लेकर आज तक कदम ब कदम एक-एक करके लंबे संघर्षों से हासिल जनता के सीमित जनतांत्रिक अधिकार भी छिनते चले गए।

एक नए गुलामी का दौर

आज देश की जनता उस काले अंधेरे तौर से भी ज्यादा खतरनाक और भयावह दौर में खड़ी है। आज अघोषित आपातकाल की बर्बर शक्तियां हावी है। असहमति की आवाजों को बेरहमी से चुप करा देने या फर्जी देशभक्ति के शोर में डूबो देने की कोशिशें साफ नजर आ रही हैं।

मौजूदा समय में आरएसएस-भाजपा की सत्ताधारियों द्वारा सरकार के खिलाफ किसी भी विरोध के स्वर को जितनी बर्बरता और निर्ममता से कुचला जा रहा है, उसके उदाहरण तमाम तमाम मानवाधिकार व जनवादी अधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां है।

आपातकाल में तो महज एक मीसा कानून था। आज राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून, यूएपीए जैसे न जाने कितने कानून बनाए जा चुके हैं, जो पीड़ित के बचाव के रास्ते तक बंद कर चुके हैं।

तेजी से छिन रहे हैं संघर्षों से हासिल अधिकार

वर्तमान दौर में ना केवल सत्ता का दमन भयावह रूप ले चुका है, बल्कि लंबे संघर्षों के दौरान हासिल सीमित हक़-अधिकारों को भी खत्म किया जा रहा है। गोरी गुलामी से भी बदतर गुलामी का यह दौर है। मुनाफाखोर देशी व बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वर्चस्व मजबूत हो गया है और जनता को फिरकापरस्ती की आग में झोंककर मोदी सरकार पूँजीपतियों की खुली चाकरी में लगी हुई है।

हालात यह हैं कि लंबे संघर्षों के दौरान जो श्रम कानूनी अधिकार हम मज़दूरों ने हासिल किए थे उसे भी छीनकर अक्टूबर माह से मालिकों के हित में चार लेबर कोड लागू करने के लिए सरकार तैयार है। तीन काले कृषि कानूनों के खिलाफ किसान पिछले 9 महीने से दिल्ली की सीमाओं पर संघर्षरत हैं। सरकारी व सार्वजनिक संपत्तियों को तेजी से बेचा जा रहा है। मोदी सरकार ने कोरोना आपदा को मज़दूरों की तबाही और मालिकों के अवसर में बदल दिया है।

अगस्त क्रांति से प्रेरणा लेकर आजादी के परचम को उठान होगा!

अगस्त क्रांति मुल्क की मेहनतकश आवाम के लिए अहम प्रेरणा का स्रोत है। यह गुलामी के बंधनों को तोड़ने की जंग का आह्वान है। यह जाति-मजहब के बंटवारे की दीवार को तोड़कर साझी एकता का भी प्रतीक है।

आज जब देश की मेहनतकश जनता देसी-विदेशी मुनाफाखोरों की गुलामी की नई ज़ंजीरों में जकड़ी हुई है, महँगाई, बेरोजगारी, छँटनी-बंदी का खुला खेल हो रहा है, दमन का पाटा तेजी से चल रहा है और ‘बांटो, राज करो’ की नीति द्वारा सांप्रदायिकता का खेल चरम पर है, तब अगस्त क्रांति की मशाल को और मजबूती से थाम कर मेहनतकश जन की व्यापक व मजबूत एकता बनाकर सच्ची आजादी की लड़ाई के परचम को ऊपर उठान होगा!

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