इस सप्ताह : एक काली कविता !

एक काली कविता / अमिता शीरीं

मैं काली हूं
मैं बहुत काली हूं
लेकिन मैं सुन्दर हूं.
बहुत सुंदर.

बहुत पहले
जब आतताइयों ने
छीन के फेंक दिया था
मुझे मेरी मां की गोद से
जहाज का बोझ हल्का करने के लिए.
तभी से खोज रही हूं मैं
समुन्दर की अतल गहराइयों में
जीवन का सुच्चा मोती.

मां
तुम्हारे ऊपर हुए हर बलात्कार को
झेला है मैंने अपने ऊपर
तुम्हारी कोख के समन्दर में
ज़ोर ज़ोर से
डूबने उतराने लगती थी मैं.
गुलामों के उस जहाज की तरह
जिसमें भर कर ले गए थे वे
मेरे पिता को बेचने के लिए.

इतिहास के सागर की
तली में
मुझे मिला है मलबा उसी जहाज का
उस मलबे से मैंने खोज निकाली हैं
बेड़ियां
जो पड़ी थी उनके पांवों में.
मां मुझे पिघलानी हैं
ये बेड़ियां
एक एक करके सारी

मां
मुझे अपना काला रंग और तपाना है
इतना चमकदार करना है कि
बदल जाए काले रंग के मायने.
मेरी काली चेतना कहती है
मेरा काला रंग
सिर्फ़ रंग नहीं
ये इंसानियत के बढ़ते जाने की
शानदार दास्तान है.

बिखर गए थे बीज की तरह
हमारे काले पुरखे सारे.
अफ्रीका से एशिया ऑस्ट्रेलिया अमेरिका
और यहां वहां.

मेरी काली मां ने
धारण किया था समूची मानवता को
अपनी कोख में
तब मेरी मां गुलाम नहीं थी
काला रंग भी नहीं था किसी के वश में.

उसी काली मां की कोख से पैदा हुई मैं
काली हूं बहुत काली
और बहुत सुंदर.
मुझे बनाना है इस दुनिया को
अपने जितना ही सुंदर
अपने से कहीं ज़्यादा सुंदर
और काला, और सुंदर…


…मैं यूपी का चेहरा हूं / मुकुल सरल

ठहरा, सहमा, उजड़ा हूं
मैं यूपी का चेहरा हूं

डर-डर के अब जीता हूं
रजधानी में रहता हूं

सबसे ज़्यादा हाथ मेरे
फिर भी मैं क्यों पिछड़ा हूं

गंगा-जमुना दोनों हैं
फिर भी देखो प्यासा हूं

मंदिर में भी चैन नहीं
मस्जिद सा मैं ढहता हूं

सारे तीरथ धाम यहां
भटका भटका फिरता हूं

बस्ती बस्ती आग लगी
सच्ची-सच्ची कहता हूं

मैं बेटी हूं हथरस की
मैं अख़लाक़ का बेटा हूं

शाम से पहले घर आना
बिटिया से ये कहता हूं

दिन में भी बचकर चलना
हां बच्चों… मैं डरता हूं

मैं सुबोध, मैं चंद्र शेखर
मैं कफ़ील के जैसा हूं

खेत में मैं ही खटता हूं
मैं सरहद पे मरता हूं

पढ़-लिख कर बेकार हुआ
दफ़्तर-दफ़्तर फिरता हूं

सच कहने पर जेल है अब
फिर भी मैं सच कहता हूं

यूपी-एमपी फ़र्क़ नहीं
दिल्ली से भी लड़ता हूं


हम तो युद्ध नहीं चाहते / प्रबोध सिन्हा

हम तो युद्ध नहीं चाहते
पर वो तो
हर वक्त
आतुर रहते हैं
मुझसे युद्ध करने के लिए
क्योंकि
मैं किसी को
पसंद नहीं आता
क्योंकि
मैं
अपार मोहब्बत चाहता हूँ
मैं ढेर सारी शांति चाहता हूँ
ताकि अपने बच्चों की आवाज सुन सकूं
मैं लड़कियों के लड़ने और
झगड़ने की आवाज
सुनना चाहता हूँ
मैं
बच्चों के कोलाहल
सुनना चाहता हूँ
मैं जंगलों में
चिड़ियों के आवाज
और उनके गाये हुए गीत
सुनना चाहता हूँ
मैं
उन तितलियों का
स्पंदन चाहता हूँ
जिसने ऊँची पहाड़ को
छूने की हिम्मत की हो
मैं जंगलों के
जीवों से
बतकही का
आलिंगन चाहता हूँ
ताकि उनके दुख
को महसूस कर सकूँ।
मैं सभी उस घर को
बने रहते देखना चाहता हूँ
क्योंकि युद्ध में
ये घर कब्रिस्तान
में बदल दिए जाते हैं
इस लिए मैं
कोई भी युद्ध नहीं चाहता हूँ
युद्ध बुजदिली की
निशानी होती हैं
मुझे तो
जीवन से मोहब्बत हैं
मैं सभी को
महसूसना चाहता हूँ
आओ हमसब
पूरी दुनिया के लोग
आपस में
आलिंगन करें
और मोहब्बत के
फूल को
बिखेर दें।


मैंने प्लेट में टमाटर के ऐसे टुकड़े देखे / देवीप्रसाद मिश्र

मैंने प्लेट में टमाटर के ऐसे टुकड़े देखे
जो मैंने पहले कभी नहीं देखे थे मतलब
कि ऐसे कि जैसे ताज़ा ख़ून से भरे हों
उनका वलय भी बड़ा था उनके बीज भी
मोतियों सरीखे थे मेरे मेज़बान ने उन
टुकड़ों को मेरी प्लेट में रख दिया मैंने
महसूस किया कि इस आदमी के हाथ
बहुत बड़े हैं इतने कि वह मेज़ के आर-पार
अपना हाथ ले जा सकता है और चाहे तो
मेरी गर्दन भी पकड़ सकता है वह इतना लंबा है
कि मेरे सिर पर अपनी प्लेट रख कर
अपना खाना खा सकता है मैंने टमाटर
के टुकड़ों को थोड़ा दहशत के साथ देखते
हुए कहा कि आप के हाथ बहुत लंबे हैं तो
उसने थैंक यू कहा — यह लगा कि उसने
मुझे डाँटा मतलब कि उसकी कृतज्ञता में
सपाटता थी और उसने बहुत बेरुख़ी से
बताया कि वह एक मल्टीनेशनल में
सेल्ज़ में है और फिर वह मुझे इस तरह
देखता रहा कि जैसे वह यह बताना चाहता
हो कि मेरे कितने कम दाम लगेंगे

जिस टमाटर से यवतमाल के किसान का ताज़ा ख़ून
जैसा रिस रहा था उस टमाटर के बारे में
उसने बताया कि यह जेनेटिकली मॉडीफ़ाइड बीज
वाला टमाटर है जिसके बीज अमेरिका में
तैयार किए गए हैं जान यह पड़ता था कि
बहुत लंबे हाथों वाला वह आदमी भी ऐसे ही
किसी बीज से पैदा हुआ था जिसे विकसित
करने में अमेरिका ने बरसों मदद की हो


घोषणा पत्र / रमज़ान दर्गा

(असमिया कवि रमज़ान दर्गा की कविता)

हम श्रमजीवी हैं
जब हमारी सत्ता होगी
पुलिस एवं न्यायाधीशों को
हम मनुष्य बनाएंगे।
टैंकर – बुलडोजर बनेंगे
ऊबड़-खाबड़ जमीन समतल बनेगी
बन्दूक की नली में
चिड़िया घोंसला बनायेगी।

वेश्यावाटिका के नीचे
पुष्पवाटिकाएं बनेगी।
एकमात्र अवकाश में:
सारे संसार में
शान्ति बीज बोयेंगे
भविष्य में
हमारी पीढ़ी शब्दकोश में
शहीद स्मारक का अर्थ ढूंढेगी।



भूली-बिसरी ख़बरे

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