भारत में सार्वजनिक सेवाओं खर्च कम निजी क्षेत्र में ध्यान अधिक देने से वंचितों को नुकसान पहुंचा

A man holds up an intravenous (IV) drip being used to treat his relative as they wait for him to be transferred to a hospital bed in the emergency ward of Jawahar Lal Nehru Medical College and Hospital, during the coronavirus disease (COVID-19) outbreak, in Bhagalpur, Bihar, India, July 28, 2020. REUTERS/Danish Siddiqui

अस्पताल में औसत खर्च तीन गुना बढ़ा, ग़रीबों की मुश्किलें बढ़ी

नई दिल्लीः एक नए अध्ययन के अनुसार भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर कम खर्च करने और प्राइवेट स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित करने से चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बनाने में गंभीर असमानता बढ़ी है, विशेष रूप से कोविड-19 महामारी के दौरान.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑक्सफैम की मंगलवार को जारी रिपोर्ट ‘इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2021ः इंडियाज इनइक्वल हेल्थकेयर स्टोरी’ में कहा गया है कि जो राज्य मौजूदा असमानताओं को कम करने का प्रयास कर रहे हैं और स्वास्थ्य क्षेत्र पर अधिक खर्च कर रहे हैं, वहां कोविड-19 के पुष्ट मामले कम हुए हैं.रिपोर्ट में कोरोना महामारी से निपटने में केरल को सबसे बेहतरीन उदाहरण बताया गया है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘केरल ने बहुस्तरीय स्वास्थ्य प्रणाली तैयार करने के लिए बुनियादी ढांचे में निवेश किया, जिसे सामुदायिक स्तर पर बुनियादी सेवाओं के लिए फर्स्ट कॉन्टैक्ट एक्सेस मुहैया कराने के लिए डिजाइन किया गया था और बाद में मेडिकल सुविधाएं, अस्पताल बेड और डॉक्टरों की संख्या में भी इजाफा किया गया.’

ऑक्सफैम इंडिया के शोधकर्ता और इस रिपोर्ट के अध्ययनकर्ताओं में से एक अपूर्वा महेंद्रा ने कहा, ‘हमें जो पता चला है, उसके दो पहलू है. पहला, वे राज्य जो बीते कुछ सालों से असमानताओं को कम करने- जैसे सामान्य श्रेणी और अनुसूचित जाति एवं जनजाति की आबादी के बीच चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच की असमानता को लेकर काम कर रहे हैं, वहां कोरोना के पुष्ट मामले कम हैं जैसे- तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान. दूसरी तरफ जिन राज्यों में स्वास्थ्य पर जीडीपी खर्च अधिक है, जैसे- असम, बिहार और गोवा वहां कोरोना की रिकवरी दर अधिक है.’

रिपोर्ट में कहा गया, ‘ उच्च आय वर्ग के लोगों और चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बनाने वाले लोगों को निम्न आय समूह के लोगों की तुलना में अस्पताल या कोविड केंद्रों के कम चक्कर काटने पड़े. निम्न आय वर्ग के लोगों को उच्च आय वर्ग के लोगों की तुलना में कोविड पॉजिटिव पाए जाने पर पांच गुना अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ा.’

अनुसूचित जाति व जनजाति से जुड़े पचास फीसदी से अधिक लोगों को सामान्य श्रेणी के 18.2 फीसदी लोगों की तुलना में गैर कोविड चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बनाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

रिपोर्ट में बताया गया, ‘कोविड-19 टीकाकरण अभियान ने देश के डिजिटल विभाजन की अनदेखी की. महामारी की शुरुआत में सिर्फ 15 फीसदी ग्रामीण घरों में इंटरनेट कनेक्शन था. ग्रामीण भारत में स्मार्टफोन यूजर्स शहरी इलाकों की तुलना में लगभग आधे थे. 12 राज्यों की 60 फीसदी से अधिक महिलाओं ने इंटरनेट का कभी इस्तेमाल नहीं किया था.’

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने कहा, ‘हमारे विश्लेषण से पता चला है कि मौजूदा सामाजिक-आर्थिक असमानता ने भारत में स्वास्थ्य प्रणाली में असमानता बढ़ाई है. अलग-अलग स्वास्थ्य मानकों पर सामान्य श्रेणी से जुड़े लोगों ने अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों से बेहतर प्रदर्शन किया है, हिंदुओं ने मुस्लिमों से बेहतर प्रदर्शन किया है, अमीरों ने गरीबों की तुलना में बेहतर किया है, पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है जबकि शहरी आबादी ने ग्रामीण आबादी की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है.’

बेहर ने कहा कि भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में अच्छा काम किया है लेकिन यह सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में निजी क्षेत्र को सहयोग देने में आगे रहा है, जिससे वंचितों को नुकसान पहुंचा है.रिपोर्ट में कहा गया कि 2004 से 2017 के बीच अस्पताल में भर्ती होने के मामले में औसत चिकित्सा खर्च तीन गुना बढ़ा है, जिससे गरीबों और ग्रामीणों को मुश्किल हुई है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘अस्पताल में भर्ती होने पर खर्च किए गए प्रत्येक छह रुपये में से एक रुपया उधार के जरिये आया जबकि शहरी आबादी बचत पर निर्भर है. ग्रामीण आबादी कर्ज पर निर्भर है. उधार लेने की यह जरूरत हाशिए पर मौजूद लोगों को चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बनाने में हतोत्साहित करती है.देश की एक-तिहाई से कम परिवारों को 2015-2016 में सरकारी बीमा योजना में कवर किया गया था.’

रिपोर्ट में कहा गया, ‘सार्वजनिक हेल्थकेयर में भारत के कम खर्च ने गरीबों और वंचितों को खस्ताहालत सार्वजनिक चिकित्सा सुविधाएं और महंगी निजी चिकित्सा सुविधाएं इन दो मुश्किल विकल्पों के साथ छोड़ दिया है. हेल्थकेयर की अत्यधिक कीमतों ने कई लोगों को घरेलू संपत्तियां बेचने और कर्ज लेने के लिए मजबूर किया है. हालांकि, संपत्ति की बिक्री में कुछ हद तक कमी आई है लेकिन अकेले स्वास्थ्य लागत बढ़ने से 6.3 करोड़ लोग हर साल गरीबी में धकेले जा रहे हैं.’

रिपोर्ट में कहा गया, ‘अन्य सामाजिक-आर्थिक कारकों ने भी चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बनाई है. उदाहरण के लिए सामान्य श्रेणी में महिलाओं की साक्षरता दर अनुसूचित जाति की महिलाओं की तुलना में 18.6 फीसदी अधिक और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की तुलना में 27.9 फीसदी अधिक है जिसका मतलब है कि सामान्य श्रेणी की महिलाओं को न सिर्फ उपलब्ध चिकित्सकीय सुविधाओं की बेहतर समझ है बल्कि इन तक बेहतर पहुंच भी है.’रिपोर्ट में कहा गया कि सिखों और ईसाइयों में महिला साक्षरता दर सबसे अधिक 80 फीसदी से अधिक है. इसके बाद हिंदुओं में 68.3 फीसदी और मुस्लिमों में 64.3 फीसदी है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘बाल टीकाकरण में सुधार के बावजूद लड़कियों में टीकाकरण की दर लड़कों की तुलना में कम है. शहरी इलाकों में बच्चों का टीकाकरण ग्रामीण इलाकों के बच्चों की तुलना में अधिक है.अन्य जातियों के मुकाबले अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोग टीकाकरण में पीछे है.’

महेंद्रा ने कहा, ‘महामारी जैसे स्वास्थ्य संकट के दौरान ये मौजूदा असमानताएं और ज्यादा बढ़ जाती हैं. सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में निवेश इतना कम है कि देश में अस्पतालों में बेड की संख्या 2010 में प्रति 10,000 लोगों पर नौ बेड से कम होकर वर्तमान में हर 10,000 लोगों पर सिर्फ पांच बेड रह गई है.’

द वायर से साभार

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