क़ानूनों में पैबंद से जनविरोधी चरित्र नहीं बदलेगा, इसे रद्द करना होगा!

बहरे कानों तक किसानों की आवाज पहुँचे, 22 से संसद विरोध मार्च

जनविरोधी तीन कृषि क़ानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर 236 दिनों से संघर्षरत किसान विकट संकटों को झेलते हुए भी उत्साह से लबरेज हैं। किसान एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं। देशव्यापी जनआन्दोलन बन चुके इस संघर्ष में 550 से ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी है।

कई मोर्चों पर एक साथ संघर्ष जारी

किसानों का मूल संघर्ष कृषि कानूनों की वापसी का है। इसके साथ वे सत्ताधारी भाजपा-आरएसएस के तिकड़मों और मीडिया के कुत्सा प्रचारों से जूझ रहे हैं। आंदोलन के दौरान हरियाणा और पंजाब में किसानों पर लगाए जा रहे आपरधिक मामलों की वापसी के लिए भी संघर्ष जारी है। इन सबके बीच वे विपरीत मौसम का भी सामना कर रहे है।

बड़े ही सुनियोजित, व्यवस्थित और विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों के साथ आगे बढ़ता यह आंदोलन अब एक नए मुकाम पर है। संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा सांसदों के लिए जारी ‘पीपुल्स व्हिप’ के बाद सोमवार से शुरू हुए संसद के मानसून सत्र में किसानों का मुद्दा गर्मा रहा है और किसान 22 जुलाई से संसद तक विरोध मार्च की तैयारी में हैं। 

संसद में गूंज रहा है किसानों का मुद्दा

संयुक्त किसान मोर्चा ने संसद के मानसूत्र सत्र के पहले दिन सोमवार को किसानों के मुद्दे पर हुए हंगामे को महिलाओं, दलितों और पिछड़ों, आदिवासियों के मंत्री बनने से उपजी नाराज़गी बताये जाने की कड़ी निंदा की है। मोर्चा ने जारी बयान में कहा है कि नरेंद्र मोदी का बयान वास्तव में निरर्थक है क्योंकि संसद भवन में गूँज रहे नारे किसान आंदोलन से सीधे संसद पहुंचे थे। जो नारे लगाए जा रहे थे, वे हाशिये के नागरिकों के थे, जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में सरकार के अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक कानूनों और नीतियों का सामना करना पर रहा है।

मोदी सरकार की हठधर्मिता जारी

संसद के अंदर विपक्षी पार्टियां तीनों कृषि क़ानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं, उसे समाप्त करने की माँग कर रही हैं, इस दौरान मारे गए किसानों के मुआवजे की भी माँग कर रहे हैं। वही केंद्र सरकार ने पूरी हठधर्मिता के साथ कहा कि प्रदर्शन के दौरान जिन किसानों की मौत हुई है, उनके परिवार को किसी तरह का मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा।

तमाम विरोधों के बावजूद मोदी सरकार लंबे समय से किसानों से कोई वार्ता तक नहीं कर रही है। लेकिन वह मीडिया में यह जरूर फैला रही है कि वह किसान यूनियन के साथ चर्चा के लिए सदैव तैयार है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि इस मसले को सुलझाने के लिए इन कानूनों से जुड़े प्रावधानों पर चर्चा हो ताकि किसी भी तरह की आपत्ति को पहले से ही सुलझाया जाए।

जनविरोधी क़ानूनों की वापसी ही समाधान

संयुक्त किसान मोर्चा और किसान यूनियनें शुरू से स्पष्ट करती रही हैं कि काले कृषि क़ानूनों की वापसी ही इसका एकमात्र समाधान है। किसी प्रकार का पैबंद इसके जनविरोधी चरित्र को नहीं बदल सकता है।

एसकेएम ने प्रधानमंत्री से साफ शब्दों में कहा है कि महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, किसानों और ग्रामीण भारत के अन्य लोगों सहित देश के हाशिये पर रहने वाले समुदायों को सच्चा सम्मान तभी मिलेगा जब उनके हितों की वास्तव में रक्षा की जाएगी। इसके लिए सरकार को तीन किसान विरोधी कानूनों और चार मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को रद्द करने और ईंधन की कीमतों को कम से कम आधा करने के अलावा सभी किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांगो पर अमल करना चाहिए। अन्यथा बचाव के लिए खोखले शब्द अर्थहीन हैं।

22 जुलाई से संसद विरोध मार्च, जारी होगा आईडी कार्ड

22 जुलाई से 9 अगस्त तक, संसद के प्रत्येक कार्य दिवस के दिन, 200 किसान कार्यकर्ता और नेता एसकेएम द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप शांतिपूर्ण तरीके से संसद भवन की ओर मार्च करेंगे। प्रदर्शनकारियों के दैनिक जत्थे में दिल्ली की सीमाओं के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों से, विभिन्न संगठनों से चुने गए किसान नेता और कार्यकर्ता शामिल होंगे।

इसी के साथ 26 जुलाई और 9 अगस्त को महिला किसान नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा विशेष संसद विरोध मार्च निकाला जायेगा। महिलाएं किसानों की आजीविका और भविष्य के लिए इस लंबे और ऐतिहासिक संघर्ष में सबसे आगे रहीं हैं और विशेष मार्च में महिलाओं की अद्वितीय और यादगार भूमिका को याद किया जाएगा।

एसकेएम द्वारा मार्च में शामिल होने वाले किसानों को आईडी कार्ड जारी किया जायेगा।

उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन मंगलवार 20 जुलाई को 236वें दिन में प्रवेश कर गया है।

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