इस सप्ताह : देवेंद्र कुमार बंगाली की कविताएं !

हिंदी के विलक्षण कवि देवेंद्र कुमार बंगाली ( 18 जुलाई 33-18जून 1991) बुद्ध भूमि कसया कुशीनगर में पैदा हुए थे। उनके लिखने की शुरूवात गीतों से हुई थी उसके बाद उन्होंने कविता की दुनिया में प्रस्थान किया। उन्होंने गीतों को नए शब्द और बिम्ब दिए। लोक लय और स्थानीयता उनकी कविताओं में दिखाई देती है। उनके कहने का अंदाज जुदा था जो उनको उनके समकालीनों से उन्हें अलग करता है लेकिन उनकी कीर्ति अपने शहर तक महदूद रही ,आलोचकों की कृपा दृष्टि उन पर नही पड़ी।

देवेंद्र कुमार अपने मूल नाम से ज्यादा उपनाम बंगाली से ज्यादा मशहूर हुए। कवि केदारनाथ सिंह के लिए वे मुनिवर थे। वे धूमिल और केदारनाथ सिंह की पीढ़ी के कवि थे। धूमिल ने उनके बारे में कहा था कि जो मैं सोचता हूं, उसे तुम लिख लेते हो। उनकी कविताओं में केवल लोकछबियां नही प्रतिरोध के गहरे स्वर हैं।

गोरखपुर के प्रवास में मुझे उनसे जो सान्निध्य और प्रेम मिला, वह मेरे लिए थाती है। वे अच्छे कवि के साथ एक अच्छे और संवेदनशील मनुष्य थे। दलित होने के बावजूद उन्होंने उसका लाभ नही उठाया। उनका जीवन सुखी नही थी ,बेटे की मृत्यु के बाद वे टूट गए थे, इसके बाद भी कविता की धारा उनके भीतर बहती रही।
देवेंद्र कुमार ने पशु पक्षियों और वन्यजीवों पर अनोखी कविताये लिखी हैं, हिंदी में इस तरह के विरले कवि है। उनकी जन्मतिथि पर उन्हें याद करते हुए, उनकी कुछ कविताओं के अंश देखे –

स्वप्निल श्रीवास्तव की फेसबुक वॉल से साभार

1 – भैसा

गांव और शहर के सीवान पर
खड़ा है एक मोटा भैसा
उसके कान कटे हुए हैं
उसकी सींग में लाल धागा
गले मे पीला पताका बंधा है
उसकी पीठ पर जगह जगह
छड़ों के निशान है
लगता है अभी अभी दाग़ कर
छोड़ा गया है


2 – सूअर

उसके पूरे शरीर में
या तो पीठ ही पीठ है
या फिर सिर है
गर्दन कहां है?

एक दिन मैंने उससे पूछा
पहले तो वह गुर्राया पूंछ पटका
आसमान में फुटबॉल की तरह उछला
फिर आंख मटकाते तोंद सहलाते
भचकते हुए बोला –
मैं ही वह महावराह हूँ
जिसने पृथ्वी का उद्धार किया था
मुझसे क़द्दावर यहां कोई है ?


3 – कुत्ता

लान की हरी दूब पर
वह टहलता रहा टहलता रहा
और उचक कर गद्दीदार कुर्सी पर
बैठ गया
जहां तहां फाइलों को उलटा पलटा
और बोला -तफ़सीस में आया हूँ
मैं ही इस शहर का कोतवाल हूँ
….
वह कुछ दूर तक कार के पीछे पीछे दौड़ा
अगल बगल झांक कर
जीभ को पगड़ी की तरह हवा में उछाला
दुम हिलाया फिर थककर जमीन पर पूंछ बिछा कर / चित्त लेट गया और बोला-
..मैं कोई कुत्ता हूँ जो जूठे पत्तलों पर जाऊं!
दिन को दरबार में हाजिर करूँ !
रात का पता लगाऊं ।


4 – साँप

पुरानी हवेली को छोड़कर
जब वह जंगल की ओर खिसकता है
तो उसके रास्ते में लगे ईंटों के भट्ठे
लाल हो जाते हैं
बिना लकड़ी कोयला आग से पककर
लाल हो जाते हैं
और वह विशाल दुर्ग राज पाट
जिसकी नींव के नीचे रहता था
बुझ कर कोयला राख बन जाता है।


5 – भेड़िया

रात के उन्ही उन्ही पहरों में
जिसमें नींद अपनी जवानी पर होती है
वह आता है
और बगल में सोए हुए बच्चों को
उठा ले जाता है

इससे पहले कि
लोग उसे जाने-सुने देखे
एक को छोड़ वह
दूसरे गांव की ओर मुड़ चुका होता है।



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