बेरोजगारी भयावह, लेकिन 60 लाख से अधिक स्वीकृत पद पर भर्ती नहीं

केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा स्वीकृत पदों पर भी भर्ती नहीं

मोदी सरकार के कार्यकाल में जहाँ एक और बेरोजगारी इतनी अधिक हैं, कोई नई नौकरिया नहीं हैं, वहीं दूसरी और जो सरकारी पद पहले से स्वीकृत हैं उन पर भी नियुक्ति नहीं हो रही हैं। केंद्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के आंकड़ों पर किये गए अध्ययन से पता चलता है कि रिक्त पदों कि संख्या 60 लाख से अधिक है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य सरकारों का रवैया बहुत ही उदासीनता वाला है, नौकरी देने कि बजाय सारा ध्यान इस और है कि कैसे आंकड़ों को छुपाया जाए। हमने जब केंद्र सरकार और राज्यों के अलग-अलग विभागों में खाली पड़े पदों की स्थिति जानने के लिए आंकड़ों का अध्ययन किया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

देश में करोड़ों युवा काम न मिल पाने के कारण रोजगार को लेकर हताश हैं। वहीं जब देश में बेरोजगारी जब अपने चरम पर है तब इस तरह से बड़ी संख्या में पदों का खाली होना निराशानजनक है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य सरकारें रोजगार को लेकर कितना चिंतित है उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि रिक्त पदों कि संख्या में लगातार वर्ष-दर-वर्ष बढ़ोत्तरी हो रही है, परन्तु इसके बावजूद इन पदों पर नियुक्ति करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे हैं।

ऑल इंडिया बैंक इंप्लाइज एसोसिएशन (AIBEA) के महासचिव सी.एच. वेंकटचलम कहते हैं कि बैंकों में दो लाख से अधिक क्लास-4, क्लास-3 और ऑफिसर कैडर के पद रिक्त हैं, जिनकों बैंक भरना नहीं चाहते हैं। इसके साथ ही बैंक, कम वेतन पर कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्स के माध्यम से कर्मचारी रखकर उनसे स्थायी कर्मचारियों की तरह ही काम ले रहे हैं। वहीं सरकार दूसरी तरफ सरकारी संस्थानों में दक्षता और निपुणता की बात करती हैं परन्तु वही जब रेगुलर कर्मचारियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। ऐसे में एफिशिएंसी कैसे बेहतर हो सकती है।

सी.एच. वेंकटचलम आगे कहते हैं कि कर्मचारियों के ऊपर काम का अधिक बोझ होने के कारण फ़्रस्ट्रेशन, स्ट्रेस एंड मेंटली प्रेशर में अपने काम को समय से खत्म नहीं कर पाते हैं। वे बताते हैं कि अभी बैंकों में बिज़नेस पहले के मुकाबले काफी बढ़ गया हैं जिसके कारण कर्मचारियों के काम में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है। बहुत सी सरकारी योजनाएं बैंको में माध्यम से ही कार्यान्वित होती हैं। ऐसे में नियमित और स्थायी कर्मचारियों का होना अधिक बेहतर होता हैं। इसलिए यह ज़रूरी है कि जल्द ही बैंको में खाली पड़े 2 लाख से अधिक पदों को भरा जाए ताकि कर्मचारी एफिशिएंसी के साथ काम कर पाएं।

कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स के महासचिव आर.एन. पाराशर कहते हैं कि केंद्र सरकार सभी विभागों, विभिन्न सार्वजनिक उपक्रमों में, ऑटोनोमस बॉडीज जैसे कि आईआईटी, आईआईएम, ISRO, बहुत से साइंटिफिक रिसर्च इंस्टिट्यूट में, बैंकों में कुल मिलाकर लगभग 24  लाख के करीब पद खाली पड़े हुए हैं, प्रत्येक विभाग में 30 से 35 प्रतिशत पोस्ट खाली हैं। किसी-किसी विभाग में तो 40 से 50 प्रतिशत तक भी पोस्ट खाली पड़ी हुई हैं। पब्लिक सेक्टर को सरकार लगातार बेचने पर आतुर है।

राज्यों में खाली पदों को लेकर तो मोदी सरकार बिलकुल चुप है और राज्य की रिक्तियों की संख्या घोषित करने से इनकार करती है, क्योंकि उसका मानना है कि यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। अकेले उत्तर प्रदेश में राज्य बजट दस्तावेजों के अनुसार 13 लाख पद स्वीकृत हैं जिनमें 4 लाख से अधिक खाली हैं।

कोरोना महामारी ने यह साबित कर दिया है कि केवल सरकारी तंत्र ही मजबूती से इस त्रासदी के दौरान लड़ाई लड़ रहा था और उसमें भी ख़ासकर एसेंशियल सर्विसेज सेक्टर जिसमें स्वास्थ्य, पुलिस, बैंक लगातार जनता को सुविधाएं मुहैया करवा रहे थे परन्तु प्राइवेट सेक्टर तो कहीं दिखाई भी नहीं दे रहा था, या जो था भी वो बस अपना मुनाफ़ा कमाने में लगा हुआ था जिस कारण से बहुसंख्यक आम लोगों के लिए प्राइवेट सेक्टर पहुंच से बहुत दूर था, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र में कर्मचारियों और सुविधाओं की कमी से वे दर दर भटकते हुए दिखाई दिए।

शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख क्षेत्रों से सबसे चौंकाने वाले जो रिक्त पदों के आंकड़े हैं उनका सबसे बड़ा कारण बहुत ही कम फंडिंग और फंड कटौती है जिसके कारण लाखों शिक्षक स्कूलों और कॉलेजों से गायब हैं, और यहां तक कि प्रतिष्ठित संस्थानों से भी, IIM और IIT | इसके साथ ही मोदी शासन के दौरान पढ़ाई-सीखने के स्तर में गिरावट आई है, जिसको  विस्तृत रूप से ‘असर’ (शिक्षा रिपोर्ट की वार्षिक स्थिति) में देख सकते हैं। शिक्षा प्रणाली की यह कमी भारत के भविष्य को एक बड़े अंधेरे में डाल रही है।

सरकारी पदों पर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट दीपा सिन्हा कहती हैं कि अभी जो देश के हालत हैं उसमे खाली पड़े पदों को भरना बहुत बढ़िया कदम होगा क्योकि अभी Demand Deficit है। लोगों के पास नौकरिया नहीं हैं, यह जो पद खाली हैं इनमे हर स्तर के कर्मचारी होंगे और यह ऐसे लोग हैं, यदि इनके हाथ में पैसे आएंगे तो ये लोग खर्च भी करते हैं और यह लोग जो चीजे खरीदते हैं वो कोई बहुत महंगी या इम्पोर्टेड चीजे नहीं होती बल्कि लोकल चीजे होती हैं जिससे और भी रोजगार बढ़ेंगे और इकॉनमी को बूस्ट मिलेगा।

भारत की जनवादी नौजवान सभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रीति शेखर कहती हैं कि इतनी बड़ी संख्या में जब लोग बेरोजगार हैं तब इतने ज्यादा पद का खाली होना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। वे बेरोजगारी को एक महामारी (Epidemic) कि तरह बताती हैं। उनका कहना है कि समाज का कोई ऐसा तबका नहीं हैं जो इससे अछूता हो। प्रीति शेखर कहती हैं पदों का ऐसे खाली रहना कोई नई चीज नहीं है बल्कि 1990-91 से देश में नई इकनोमिक पॉलिसी आयी है तब से सरकारें ऐसा मानने लगी हैं कि ज्यादा लोगों को रेगुलर तौर पर रखने कि जरूरत नहीं हैं और सभी सरकारों ने लोगों को कम करना शुरू किया, और ये खाली पद उन्ही नवउदारवादी नीतियों का हिस्सा हैं।

देश में हमारे जो स्वीकृत पद हैं वे पहले से ही कम हैं। यदि हम इनको पूरी तरह से भर भी देंगे तब भी यह अंतर्राष्ट्रीय मानकों से कहीं कम ही होंगे। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को तत्काल खाली पदों को भरना चाहिए और इसके साथ ही स्वीकृत पदों को वास्तविक जरूरत के आधार पर बढ़ाया जाना चाहिए। सरकार को जो सालों से अभी तक कर लेना चाहिए था बस वही करना है कि उसे जनता के प्रति अपनी प्राथमिक ड्यूटी पूरी करनी है।

न्यूजक्लिक से साभार

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