सुधा भारद्वाज और अन्य के खिलाफ दायर चार्जशीट पर जज वड़ाने को संज्ञान लेने अधिकार नहीं

हाईकोर्ट में दायर याचिका में एनआईए पर सवाल गंभीर

मुंबईः राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गुरुवार को बॉम्बे हाईकोर्ट को बताया कि एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में कार्यकर्ता एवं वकील सुधा भारद्वाज की हिरासत अवधि बढ़ाना और निचली अदालत द्वारा पुणे पुलिस को 2018 में चार्जशीट दायर करने के लिए 90 दिनों की समयसीमा बढ़ाने की मंजूरी देने का फैसला वैध और उचित था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, सुधा भारद्वाज के वकीलों का कहना है कि निचली अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश केडी वडाने को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत अपराधों के संबंध में मामलों की सुनवाई करने के लिए नामित नहीं थे.

बीते छह जुलाई को सुधा भारद्वाज ने अपने वकील के जरिये बॉम्बे उच्च न्यायालय को बताया था कि 2018 में उनकी गिरफ्तारी के बाद जिस न्यायाधीश (केडी वडाने) ने उन्हें हिरासत में भेज दिया था, उन्होंने एक विशेष न्यायाधीश होने का ‘दिखावा’ किया था और उनके द्वारा जारी किए गए आदेश के कारण उन्हें और अन्य आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा.

हालांकि, एनआईए का कहना है कि जज वडाने कानून के तहत सक्षम थे, क्योंकि विशेष न्यायाधीश सत्र न्यायाधीशों से अलग नहीं होते.एनआईए के वकील का कहना है कि राष्ट्रीय एकता से जुड़े संवेदनशील मामलों में मामले का तीव्र निपटान जरूरी था और पुणे पुलिस के आवेदन पर जज का आदेश सही था.

हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश मुख्य सार्वजनिक अभियोजक अरुणा पई से उन दस्तावेजों और रिकॉर्ड को पेश करने को कहा है, जिनसे पता चले कि भारद्वाज और अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ पुणे पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट पर संज्ञान लेने वाले जज वडाने के पास ऐसा करने का अधिकार था.

हाईकोर्ट ने पई से उन दस्तावेजों को भी पेश करने को कहा, जिनसे पता चल सके कि मुख्य जिला न्यायाधीश ने मामले की सुनवाई के लिए न्यायाधीश वडने को शक्तियां दी हैं.

मालूम हो कि जस्टिस एसएश शिंदे और जस्टिस एनजे जामदार की पीठ भारद्वाज की डिफॉल्ट जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी.सुधा भारद्वाज को अगस्त 2018 में गिरफ्तार किया गया था और वह फिलहाल मुंबई में भायकला जेल में बंद हैं.

एनआईए की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने अदालत को बताया कि वह इस बात से सहमत नहीं हैं कि केवल एक अधिसूचित विशेष न्यायाधीश ही मामले का संज्ञान ले सकता है, क्योंकि अपराध गंभीर है और राष्ट्रीय एकता से जुड़े हुए हैं.

सिंह ने कहा, ‘इस मामले में अपराधों की जांच यूएपीए के तहत की जा रही है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित हैं और उन्हें गंभीर अपराध माना जाता है. एनआईए अधिनियम का उद्देश्य अपराधी को दंडित करना है और मामले का शीघ्र निपटान होना चाहिए. राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर कुछ भी नहीं है. विशेष जज, सत्र जजों से अलग नहीं होते.’

मालूम हो कि 15 जुलाई को सुधा भारद्वाज की याचिका के साथ हाईकोर्ट आठ अन्य सह-आरोपियों की याचिकाओं पर भी सुनवाई करेगा. इन आरोपियों ने भी डिफॉल्ट जमानत याचिका रद्द करने के पुणे की सत्र अदालत के जून 2019 के फैसले को चुनौती दी है.

इन आठ आरोपियों में सुधीर धावले, महेश राउत, वर्नोन गॉन्जाल्विस, अरुण फरेरा, रोना विल्सन, शोमा सेन, सुरेंद्र गाडलिंग और वरवरा राव शामिल हैं.बता दें कि बॉम्बे हाईकोर्ट मामले पर दोबारा 15 जुलाई को सुनवाई करेगा.

द वायर से साभार

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