9 महीने से जेल में बंद 84 साल के फादर स्टेन स्वामी की अस्पताल में मौत

भीमा कोरेगांव केस में झूठे आरोपों में पिछले 9 महीने से जेल में बंद एक्टिविस्ट फादर स्टेन स्वामी का मुंबई के होली फैमिली अस्पताल में देहांत हो गया।

84 साल के स्टेन स्वामी को 30 मई को बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर ही मुंबई के होली फैमिली अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लंबे इलाज के बाद भी उनकी तबीयत में सुधार नहीं आ रहा था। रविवार से उन्हें वेंटीलेटर सपोर्ट पर रखा गया था।

आज दोपहर मुंबई हाई कोर्ट में उनकी जमानत पर सुनवाई के दौरान उनके वकील ने उनके देहांत की खबर दी। इसी साल हाईकोर्ट ने उनकी जमानत की याचिका दायर की गई थी। एनआईए लगातार स्टेन स्वामी की ज़मानत का विरोध कर रही थी।

स्टेन स्वामी लगातार कह रहे थे कि उनका स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जाए। मगर जेल प्रशासन और सरकार लगातार उनके बिगड़ती हालत को नजरंदाज कर रहे थे। मई महीने में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां सही देखभाल ना होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

भीमा कोरेगांव मामले में फादर स्टेन स्वामी को एनआईए ने 20 अक्टूबर 2020 को यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया था और उन्हें तालोजा जेल अस्पताल में बन्द रखा गया था। स्वामी ने मार्च में जमानत याचिका लगाई थी और अदालत से कहा था कि उनके लेखन और आदिवासियों के बीच उनके अधिकारों के लिए उनके काम करने की वजह से उन्हें एनआईए द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने स्टेन स्वामी को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के महाराष्ट्र सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया था और अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दिया कि उनकी उचित चिकित्सा देखभाल और उपचार के लिए हर संभव प्रयास किया जाए।

झारखंड में करीब 3 दशक तक जनजातियों और आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता स्टेन स्वामी, पार्किंसंस रोग से पीड़ित थे और मई में कोविड पॉजिटिव पाए गए थे तब बॉम्बे हाईकोर्ट ने जेल अधिकारियों को उन्हें अस्पताल में स्थानांतरित करने का आदेश दिया था। उनकी हालत में सुधार नहीं होने पर अदालत ने 17 जून को उनके अस्पताल में रहने की अवधि 5 जुलाई तक बढ़ा दी थी।

शनिवार को, स्टेन स्वामी ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43 डी (5) को चुनौती देते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया था, जिसमें कहा गया था कि यह धारा कानून के तहत किसी भी आरोपी के लिए जमानत पाने के लिए एक “दुर्गम रूकावट” पैदा करती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि धारा संविधान में अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत निहित अभियुक्तों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

भारतीय समाज, सरकार और न्यायपालिका के लिए यह शर्म की बात है कि एक 84 साल के सामाजिक कार्यकर्ता पर आतंकवाद का झूठा आरोप लगाया जाता है। फ़िर उन्हें बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया जाता है जहां लगभग साल भर के बाद भी चार्जशीट या मामले से जुड़ा एक पन्ना भी कोर्ट में पेश नहीं किया जाता। उनको जेल में प्रताड़ित किया जाता है। हम जेल में उन्हें मरते हुए देखते हैं। यही इस महान सभ्यता वाले, संघी मुखौटे वाले महान राष्ट्र की महान संस्कृति। क्या यही नींव है हमारे विश्व गुरु होने की ? फादर स्टेन स्वामी की मौत नहीं हुई है उनकी सांस्थानिक हत्या हुई है। फादर स्टेन स्वामी जैसे लोग मरते नहीं है, वे आने वाली पीढ़ी के संघर्षों में मौजूद रहते हैं और विचार के रूप में जिंदा रहते हैं।

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