पुलिस की तिकड़म काम ना आई, नताशा, देवांगना, आसिफ की हुई रिहाई

पुलिस की बहानेबाजी पर अदालत ने लगाई फटकार

दिल्ली की एक अदालत द्वारा तत्काल रिहा करने के आदेश के बाद छात्र कार्यकर्ता नताशा नरवाल, देवांगना कलीता और आसिफ इकबाल तन्हा आज शाम 7.30 पर जेल से बाहर आ गए। फर्जी आरोपों में कैद रहे तीनों कार्यकर्ताओं को मंगलवार सुबह दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी। लेकिन उलझाने के लिए दिल्ली पुलिस ने रिहाई के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।

इनको ज़मानत मिले 36 घंटे से अधिक हो जाने के बावजूद दिल्ली पुलिस इन्हें औपचारिकताओं का बहाना बनाकर रिहा नहीं कर रही थी।

इसके बाद तीनों ने जेल से तुरंत रिहाई का अनुरोध करते हुए बृहस्पतिवार को उच्च न्यायालय का रुख किया। जिस पर सुनवाई करने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत से तीनों छात्रों की रिहाई के मामले पर गौर करने को कहा, और हुए निचली आदलत ने तुरंत रिहाई का आदेश दिया।

उल्लेखनीय है कि पिछले साल फरवरी में दिल्ली दंगों फर्जी आरोपी बनाकर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) कानून के तहत मई 2020 में गिरफ्तार किया गया था। इन्हें उनके पते और जमानतदारों से जुड़ी जानकारी पूर्ण न होने का हवाला देते हुए समय पर जेल से रिहा नहीं किया गया था।

पुलिस की बहानेबाजी

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़ छात्रों ने कहा कि सभी जमानतदार अपनी अग्रिम आयु/पेशेवर दायित्वों के बावजूद, 15 और 16 जून को दोपहर 12 बजे से शाम 5.00 बजे तक शारीरिक रूप से उपस्थित थे। आवेदक की सभी जमानतें और उनके बॉन्ड और उनकी FD को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष रखा गया है।

इसके बाद भी ज़मानत नहीं मिली, जिसके बाद इन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के समक्ष दायर अत्यावश्यक आवेदनों में उन्होंने तर्क दिया है कि हाईकोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने के बावजूद उनकी रिहाई के आदेशों को स्थगित करने की निचली अदालत की कार्रवाई उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

सच यह है कि अदलतों से ज़मानत मिलने के बाद भी दिल्ली पुलिस कोई न कोई अड़चन लगा कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही थी कि इनकी रिहाई न हो सके। इस बार भी वो यही प्रयास करती दिख रही है, लेकिन लगता है इस बार वो इसमें कामयाब नहीं होगी।

इस बीच, पुलिस ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाकर दिल्ली हाईकोर्ट के जमानत आदेश पर तत्काल रोक लगाने का अनुरोध किया।

निचली अदालत ने लगाई फटकार

कड़कड़डूमा अदालत में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश रविंदर बेदी ने पते और जमानतदारों के सत्यापन में देरी को लेकर पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा, ‘मैं कहूंगी कि यह अपने आप में एक उचित कारण नहीं हो सकता है कि जब तक इस तरह की रिपोर्ट दाखिल नहीं हो जाती, तब तक आरोपी को जेल में रखा जाए।‘

अभियुक्तों के वकील द्वारा दाखिल हलफनामे को ध्यान में रखते हुए अदालत ने तिहाड़ जेल के अधीक्षक को उनकी तत्काल रिहाई के लिए वारंट भेजा। इस हलफनामे कहा गया था कि उनका मुवक्किल राष्ट्रीय राजधानी के अधिकार क्षेत्र को नहीं छोड़ेगा।

अदालत ने उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का हवाला दिया, जिसमें उसने कहा था कि एक बार जब कैद में रखे गए लोगों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया गया है और मुचलके के साथ जमानतदारों को प्रस्तुत किया गया है, तो उन्हें ‘एक मिनट के लिए भी’ सलाखों के पीछे नहीं रहना चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा, ‘यह देखा गया कि राज्य को न्यूनतम संभव समय के भीतर इस तरह की सत्यापन प्रक्रिया के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को सुनिश्चित करना चाहिए और ऐसा कोई कारण नहीं हो सकता है, जो ऐसे व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करने के लिए पर्याप्त हो।‘

जमानत देते समय हाईकोर्ट की टिप्पणी

15 जून को दिल्ली उच्च न्यायालय ने तीनों को जमानत देते हुए कहा था कि राज्य ने प्रदर्शन के अधिकार और आतंकी गतिविधि के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है तथा यदि इस तरह की मानसिकता मजबूत होती है तो यह ‘‘लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन होगा।’’

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस एजे भंभानी की पीठ ने नताशा और देवांगना को जमानत देते हए कहा था, ‘हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि असहमति की आवाज को दबाने की जल्दबाजी में सरकार ने विरोध के संवैधानिक अधिकार और आतंकवादी गतिविधियों के अंतर को खत्म-सा कर दिया है। अगर यह मानसिकता जोर पकड़ती है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा।‘

क्या थे आरोप

24 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्व दिल्ली में संशोधित नागरिकता कानून के समर्थकों और विरोधियों के बीच हिंसा भड़क गई थी, जिसने सांप्रदायिक टकराव का रूप ले लिया था। हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी तथा करीब 200 लोग घायल हो गए थे। इन तीनों पर इनका मुख्य ‘‘साजिशकर्ता’’ होने का आरोप है।

दिल्ली पुलिस द्वारा दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में दर्ज प्राथमिकी 59/2020 में कुल 15 लोगों को नामजद किया गया था। इनमें तन्हा, नरवाल और कलिता, गुलफिशा फातिमा, इशरत जहां, सफूर ज़रगर, मीरन हैदर, खालिद सैफी, शिफू-उर-रहमान और कई अन्य कार्यकर्ता भी शामिल है।

पुलिस ने दावा किया कि तन्हा ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को अंजाम देने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। हालाँकि अदलात में पुलिस के सारे तर्क धराशाही हो गए हैं। एफआईआर 59 के तहत अब तक कुल पंद्रह लोगों को जमानत मिल चुकी है।

यह गौरतलब है कि सार्वजनिक तौर पर भड़काऊ भाषण देने वाले और हिंसा के लिए उकसाने वाले कपिल मिश्र जैसे कई दक्षिणपंथी भाजपा नेताओं पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

सीएए विरोधी आंदोलन के समर्थक हैं

नताशा नरवाल और देवांगना कलीता जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की छात्राएं हैं और पिंजरा तोड़ संगठन की सदस्य हैं, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी हॉस्टलों में महिलाओं के लिए भेदभावपूर्ण कर्फ्यू टाइमिंग और के विरोध में बिगुल बजाए हुए है।

वहीं, तन्हा जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र हैं। इन सभी पर पुलिस ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए सांप्रदायिक हिंसा के लिए साजिश रचने का आरोप लगाया है।

ये सभी विवादित सीएए और एनआरसी कानून के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन के समर्थक और सक्रिय भागीदार रहे हैं। कई अधिकार कार्यकर्ताओं, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह मामला विवादित सीएए और एनआरसी कानून का विरोध करने वालों को निशाना बनाने का एक तरीका है।

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