कविताएँ इस सप्ताह : यदि तुम नहीं मांगोगे न्याय !

यदि तुम नहीं मांगोगे न्याय / कुमार अंबज

यह विषयों का अकाल नहीं है
यह उन बुनियादी चीजों के बारे में है जिन्हें
थक कर या खीझ कर रद्दी की टोकरी में नहीं डाला जा सकता
जैसे कि न्याय-
जो बार-बार मांगने पर ही मिल पाता है थोड़ा-बहुत
और न मांगने से कुछ नहीं, सिर्फ अन्याय मिलता है
मुश्किल यह भी है कि यदि तुम नहीं मांगोगे
तो वह समर्थ आदमी अपने लिये मांगेगा न्याय
और तब सब मजलूमों पर होगा ही अन्या़य
कि जब कोई शक्तिशाली या अमीर या सत्ताधारी
लगाता है न्याय की गुहार तो दरअसल वह
एक वृहत, ग्लोबल और विराट अन्याय के लिए ही
याचिका लगा रहा होता है.


ग़ज़ल / महेन्द्र नेह

घुट गया दम किन्तु जिनको मिल नहीं पाई हवा
ज्वर में वो तपते रहे हासिल न हो पाई दवा

क्या हुआ कैसे हुआ इस प्रश्न पर सब मौन हैं
ज़िन्दगी उनकी क्यों आखिर बन गई अंधा कुआ

वे नहीं थे एक- दो , लाखों – हज़ारों लोग थे
लाश बन कर गिर पड़े इस सभ्यता का क्या हुआ

था बहुत सामान घर में पेट भरने के लिए
किन्तु चूल्हा जल न पाया चढ़ नहीं पाया तवा

कारखाने बंद थे सब चिमनियाँ खामोश थीं
फिर भी जाने कैसे घर में भर गया काला धुँआ

मंदिरों में मस्जिदों में कोई कोलाहल न था
राज- भवनों में मगर बजती रही थीं घंटियाँ

घिर गए थे रोम वासी आग की लपटों के बीच
नीरो तब भी नित नए उत्सव मनाता ही रहा


मसख़रे की कलाएँ / अदनान कफ़ील दरवेश

उसे चौसठ नहीं छप्पन कलाएँ आती हैं
जी हाँ !
और उसका छप्पन आपके चौसठ से भी ज़्यादा है
कहो मियाँ, गड़बड़ा गयी न तुम्हारी रियाज़ी !

जब आप चिल्लाइयेगा आड़ू-आड़ू
वो कहेगा झाड़ू-झाड़ू
आप चीख़ेंगे आग-आग
वो निकाल रहा होगा साबुन का झाग

आप तो बस उसकी अदाओं पे ही मुग्ध होइए
वो सदी का सबसे बड़ा मसख़रा है
वो अभी फफक-फफक कर रो देगा
वो अदा से उछलेगा और हत्या कर देगा।


बेवकूफ सरकार / विष्णु नागर

सरकार अच्छी तरह जानती है
कि उसकी सबसे सच्ची
सबसे खतरनाक
दुश्मन है- जनता

जो इतनी साहसी हो कि
हथियार नहीं रखती
शरस्त्राण नहीं पहनती
मगर लड़ना भी नहीं छोड़ती
उससे बड़ा दुश्मन और कौन हो सकता है

यह ऐसा दुश्मन है
जो कभी खत्म नहीं किया जा सका
जिसका जीना भी जरूरी है
मरना भी जरूरी
ऐसे दुश्मन को दोस्त बना कर
मारने का तरीका
कभी पूरी तरह कामयाब नहीं हुआ

सरकार अपने ऐसे दुश्मन से हार भी नहीं मान सकती
सबसे चतुर सरकार उसे योजनाओं से मारती है
सबसे बेवकूफ सरकार उसे मारते हुए यह
बताना नहीं भूलती कि देख हम तुझे मार रहे हैं।


इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता / प्रभात

ये कागज़ का ज़माना
और आंकड़ों का समाज।
इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता,
तुम्हारी मौत से, तुम्हारे दर्द से।

इनके लिए तुम सिर्फ आंकड़े हो
कभी चुनावी आंकड़े,
तुम्हारे वजूद को नकारती सरकारी आंकड़े
टीआरपी या टीवी डिबेट्स के आंकड़े
न्यूजरूम के झूठे सैंपल सेट्स के आंकड़े।

इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता
कि तुम भूख से मर जाओ
या सड़क पर मदद की गुहार लगाते,
सर्दी या धूप से मर जाओ

इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता
कि तुम सरहद पर ख़ाक हो जाओ
या बंजर जमीन में दफ़न
और डूबती फ़सल में राख हो जाओ।

इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता
तुम शोषण से दम तोड़ दो
या बिना दुनियां देखे
कुपोषण से जहां छोड़ दो।

क्योंकि जड़ हो चुके इस समाज के लिए,
तुम सिर्फ़ आंकड़े हो,
इन्हें फ़र्क नहीं पड़ता
तुम्हारे होने या न होने से।



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