पर्यावरण दिवस : मेहनतकश जनता का पर्यावरण के साथ गहरा रिश्ता है

पर्यावरण के महत्व व विनाश पर चर्चा, संरक्षण का संकल्प

जयपुर। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण दिवस पर 5 जून को क्रांतिकारी नौजवान सभा की ओर से जयपुर की विभिन्न बस्तियों में युवाओं और बच्चों के साथ पर्यावरण के मुद्दे लेकर सभा हुई, पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेकर पौध रोपे गए और जीवन, पर्यावरण, उसके विनाश के कारणों व प्रभाव आदि को बेहद सरल तरीके से बताया गया।

कार्यक्रम के तहत जयपुर के सेंट्रल पार्क प्रताप नगर और काली कमली बाग, इंदिरा नगर बस्ती, झालाना में युवाओं और बच्चों के साथ पर्यावरण के मुद्दे लेकर सभा की गई।

इंदिरा नगर बस्ती पहाड़ी इलाके में आती है, बस्ती की तमाम मेहनतकश जनता का पर्यावरण के साथ और गहरा रिश्ता देखने को मिला।

युवाओं से पृथ्वी पर मानव जीवन और गैर-मानव जीवन यानी तमाम सजीव जीवन के लिए अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संतुलन को असंतुलित करने वाले मानव क्रियाकलाप एवं प्राकृतिक आपदाओं के कारण पर विचार किया।

न्यायपूर्ण पर्यावरण संरक्षण के साथ साथ विकास व अतिउपभोक्तावाद की आड़ में मुनाफा कमाने वाले पूँजीपतियों और दलाल सरकारों की मंशा और नीतियों पर सवाल उठाए गए।

साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लिया और हर एक की भुमिका समझते हुए वृक्ष लगाए गए। इस अवसर पर क्रांतिकारी नौजवान सभा की जयपुर इकाई द्वारा जीवन में पर्यावरण का महत्व, उसके विनाश के कारणों, उससे प्रभाव आदि को बेहद सरल तरीके से बताने वाला पर्चा निकाला गया।

क्रांतिकारी नौजवान सभा (KNS) द्वारा जारी पर्चा-

क्यों सजीव जीवन (मानव और जानवर) केवल पृथ्वी पर ही हैं? 

हम देख पाते है कि पृथ्वी पर मानव व जानवर जीवन का संभव होना यहाँ पर पर्यावरण की संतुलित स्थिति पर निर्भर कर रहा है। सभी प्राकृतिक संसधान मानव जीवन को संभव बनाते हैं। जल, जंगल, जमीन, जलवायु आदि की उपलब्धता को संतुलित और इसके उचित उपयोग की उचित समझ बनाने के लिए ही हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

हाल ही में भारत देश ने अरब सागर मे उठे ताऊते चक्रवात और बंगाल की खाड़ी मे उठे यास चक्रवात को झेला और अब एक और चक्रवात आने वाला है। इन चक्रवातों से सबसे ज्यादा विस्थापन की समस्या देखने मिलती है, जिससे घरों, फसलों और आर्थिक नुकसान की मार जनता पर पड़ती है। हमारे देश की कुल आबादी मे से 14 प्रतिशत लोग सागर तटों के आसपास रहते हैं।

जर्मनवाच नामक संस्था द्वारा प्रकाशित ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स – 2021 के अनुसार चरम मौसम, यानि चक्रवात, बाढ़ और अत्यधिक गर्मी के कारण वर्ष 2019 के दौरान दुनिया में सबसे अधिक मौतें और सबसे अधिक आर्थिक नुकसान भारत में हुआ है।

कुछ वर्ष पहले तक अरब सागर का सतही तापमान 28 डिग्री सेल्सियस रहता था, वर्तमान समय मे यह तापमान 31 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुँच चुका है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रोपिकल मेटेरेयोलोजी मे कार्यरत जलवायु विशेषक रोक्सी मैथ्यू कोल के अनुसार महासागरों के सतही तापमान बढ़ने के कारण चक्रवातों  की संख्या और भी बढ़ रही है और तापमान बढ़ने का कारण ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती मात्रा है, जो वायुमंडल को लगातार गरम करती है।

करंट साइन्स मे प्रकाशित लेख के अनुसार बंगाल की खाड़ी चक्रवातों के आवर्ती पिछले 10 वर्षो के दौरान दुगुनी बढ़ चुकी है।

आखिर क्यों पृथ्वी पर हम नहीं रह पायेंगे?  

सभी तरह की आपदाएं जो पर्यावरण के संतुलन को तबाह करती हैं और मानव और गैर मानव जीवन को मुश्किल बनाती है, यह जलवायु मे परिवर्तन की बदौलत प्रभावित होती है। और जलवायु परिवर्तन या बदलाव प्राकृतिक कारणों और मानव क्रियाकलापो पर निर्भर करता है।

प्राकृतिक कारणों मे ज्वालमुखी, कक्षीयपरिवर्तन, भूस्खलन आदि शामिल है और मानव क्रियाकलापों मे औद्योगिक क्रांति का इसमे सबसे बढ़ा हाथ है – जिससे अधिक मात्रा मे कोयला, पेट्रोलियम गैसों, फोसिल फ़ूएल्स आदि का अंधाधुंध इस्तेमाल,  ग्रीन हाउस गैसों का  बढ़ना, तमाम प्राकृतिक संसाधन – जल-जंगल-जमीन-खनीज़ आदि का बेहिसाब उपयोग और अतिउपभोक्तावाद (यानि कि गैरज़रूरी और अल्पकालिक संसाधनों का अतिउत्पादन)।

किस पर कितना और क्या असर?

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से मानव जाति तो पतन की तरफ बढ़ती ही बढ़ती है, साथ की साथ जनवारों मे भी जलवायु परिवर्तन से विस्थापन का दौर आता है, जिससे जानवर का जानवर के साथ नए संपर्क से और फिर जानवर का मानव के साथ संपर्क से नयी बीमारियों, किटाणु आदि सजीव जीवन को नष्ट करने मे सहायक बन रहे हैं, जैसे – कोरोना। कई प्रजातियाँ ख़त्म हो चुकी है और ख़त्म होने की कगार पर हैं।

पूँजीवादी दौर मे पर्यावरण मे असंतुलन की मार कोई सबसे ज्यादा झेलता है तो वो है मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास,  तमाम मेहनतकश जनता और हम और आप जैसे लोग; क्यूंकि यह तमाम जनता संसाधनों के असमान उपलब्धता की शिकार है। बल्कि इसके विपरीत पूँजीपति वर्ग और इनकी पिट्टू पार्टियाँ संसाधनों पर कब्ज़ा किए हुये है और मुनाफे की आड़ मे पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थय, नियम-कानून आदि पर हाथ ऊपर कर चुकी हैं।

पर्यावरण संरक्षण पर दुनिया भर के देशों ने जिन संधियों पर हस्ताक्षर किए हैं, उन संधियों को देशों के पूँजीपति मानने को तैयार नहीं हैं। अमीर विकसित देश गरीब विकासशील देशों पर भार डाल रहे हैं। सरकारें अमीरों के मुनाफे को बचाने के लिए आम लोगों और मज़दूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और जीवन के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। आम जनता और छोटे धंधे चलाने वालों पर इसका सारा बोझ डाला जा रहा है। इससे न्यायपूर्ण पर्यावरण संरक्षण के सवाल भी उठते हैं।

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