इलाहाबाद में 34 डॉक्टरों की मौत, संक्रमित होने पर नहीं मिल पाया समुचित इलाज

जहाँ पाँच दशक तक पढ़ाया वहीं नहीं मिल सका वेंटिलेटर

वैश्विक महामारी कोरोना की दूसरी लहर ने मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के लिए भी खतरा पैद कर दिया है। कोरोना योद्धा खुद जिंदगी की जंग हार रहे हैं। देश-समाज के लिए कितना घातक रहा कोरोना इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने अकेले प्रयागराज में 30 डॉक्टरों की जान ले ली। इनमें कई राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर डॉक्टर भी शामिल हैं। चार डॉक्टरों की मौत अन्य बीमारियों की वजह से हुई।

इन डॉक्टरों को कोविड की वजह से समय पर समुचित इलाज नहीं मिल पाया और उनकी मौत हो गई। इस तरह यदि देखा जाए तो शहर ने 34 ऐसे डॉक्टरों को खोया है, जिनकी भरपाई कई दशकों तक नहीं की जा सकती। मरने वाले 28 डॉक्टर मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से ही पढ़े थे। इनमें प्रथम बैच (1961) के मशहूर डॉक्टर मिलन मुखर्जी भी शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में चिकित्सकों को खोने के बाद इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन के कई सदस्यों ने प्रैक्टिस बंद कर रखी है।

डॉक्टर रमा मिश्रा (80) प्रयागराज की चर्चित महिला रोग विशेषज्ञ हैं। वह प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (एमएलएनएमसी) में प्रोफेसर और गायनी की विभागाध्यक्ष भी रही हैं। स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल इसी मेडिकल कॉलेज से संबद्ध है। वह खुद व उनके पति डॉक्टर जेके मिश्रा 13 अप्रैल 2021 को कोरोना संक्रमित होने के बाद स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल में भर्ती हुए थे। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस स्वरूप रानी नेहरू मेडिकल कॉलेज में डॉ. जेके मिश्रा ने अपने जीवन के पांच दशक दिए, उनके द्वारा पढ़ाए हुए तमाम डॉक्टर इसी अस्पताल में हैं। लेकिन उन्हें एक वेंटिलेटर तक मुहैया नहीं हो सका। डॉ. रमा मिश्रा बताती हैं कि डॉक्टर जेके मिश्रा स्वरूप रानी नेहरू चिकित्सालय के सबसे पहले हाउस सर्जन थे और बाद में सर्जरी विभाग के अध्यक्ष बने। डॉ. रमा मिश्रा खुद डॉक्टर होते हुए भी अपने पति को बचा न सकीं और 16 अप्रैल को उनकी कोरोना से मौत हो गई। डॉ. रमा ने अस्पताल को राम भरोसे बताया था और कहा था कि कोविड पेशेंट्स की समुचित देखभाल नहीं हो रही है। उन्होंने अपने पति की मौत के पीछे डॉक्टरों की लापरवाही को कारण बताया था।

क्रूर कोरोना ने जिन 28 डॉक्टरों को हमसे छीन लिया उनमें से सभी मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (एमएलएनएमसी) के एल्युमिनाई रहे हैं। दिवंगत होने वाले चिकित्सकों में इनमें प्रथम बैच (1961) से लेकर 2014 बैच के डॉक्टर शामिल रहे हैं। यानी डॉक्टरों की तीन पीढ़ियां कोरोना की क्रूरता की शिकार हुईं। इनमें से दो डॉक्टर प्रोफेसर जेके मिश्रा व प्रोफेसर एके बजाज यहीं पर कई दशकों तक फैकल्टी रहे हैं। जेके मिश्रा मेडिकल कॉलेज के पहले इन हाउस सर्जन रहे। उनका देश में सर्जरी के क्षेत्र में सम्मान से नाम लिया जाता है। इसी तरह डरमैटोलॉजी के क्षेत्र में डॉ. एके बजाज की कोई सानी नहीं थी। इनमें चार ऐसे एल्युमिनाई रहे हैं जिनकी नॉन कोविड में डेथ हुई हैं। इनमें 1964 बैच के डॉ. एमए हक, प्रो. पीसी पांडेय, प्रो. बलदेव राज व प्रो. वीना मिश्रा शामिल हैं।

कोरोना के क्रूर चक्र ने शहर से कई नामचीन युवा डॉक्टरों को हमसे छीन लिया। इनमें चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ. सुदीप वर्मा व डॉ. भरत आरोरा प्रमुख हैं। डॉ. भरत अरोरा शहर के माने-जाने फीजिशयन थे। इसी तरह डॉ. सुदीप वर्मा की स्किन रोग में अच्छी पकड़ थी। काफी कम समय में उन्होंने अपना एक नया मुकाम हासिल किया था। डॉ. सुदीप संघ से भी जुड़े हुए थे। चाहे राम मंदिर के लिए चंदे की बात हो या कहीं धर्म-कर्म में दान देने की वो कभी पीछे नहीं रहते थे। सामाजिक कार्यों में उनकी विशेष रुचि रहती थी। इसी तरह डॉ विवेक यादव, डॉ. अनुज मौर्या, डॉ. अनिल सरोज, डॉ. शु़भ्रा फिलिप, डॉ. गनेण पीडी जैसे युवा चिकिस्कों का जाना सभी को खल गया।

ये हैं अलविदा कहने वाले एमएलएनएमसी के एल्युमिनाई

डॉ. मिलन मुखर्जी (1961-प्रथम बैच)।

डॉ. रजनी गोयल (1964 बैच)

डॉ. दिवाकर शर्मा (1968 बैच)

डॉ. पीके बनर्जी (1964 बैच)

डॉ. स्वयं प्रकाश शुक्ला (1966 बैच)

डॉ. माधुरी सिंह (1967 बैच)

प्रो. विनोद कुमार (1969 बैच)

डॉ. श्याम नारायण (1969 बैच)

प्रो. पीसी मिश्रा (1970 बैच)

डॉ. एसपी द्विवेद्वी (1973 बैच)

डॉ. एमवी सिंह (1976 बैच)।

डॉ. विष्णु गोयल (1977 बैच)

डॉ. कमलेश कुमार केसरवानी (1977 बैच)

डॉ. लिलत जैन (1978 बैच)

डॉ. अनंत शुक्ला (1978 बैच)

डॉ. जेपी चतुर्वेदी (1978 बैच)

डॉ. संदीप रत्ना (1978 बैच)

डॉ. नीरज शर्मा (1982 बैच)

डॉ. संजय पांडेय (1983 बैच)

डॉ. अनुपम जायसवाल (1983 बैच)

डॉ. आनंद के टंडन (1983 बैच)

डॉ. गनेश पीडी (1984 बैच)

डॉ. शुभ्रा फिलिप (1985 बैच)

डॉ. भरत अरोरा (1990 बैच)

डॉ. अनिल सरोज (1991 बैच)

डॉ. सुदीप वर्मा (1999 बैच)

डॉ. अनुज मौर्या (2012 बैच)

डॉ. विवेक यादव (2014 बैच)

दैनिक भास्कर से साभार

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