कविताएँ इस सप्ताह : वाह रे बिल्ला-रंगा !

शववाहिनी गंगा / पारुल खख्खर

(गुजराती से अनुवाद : इलियास शेख)

एक-साथ सब मुर्दे बोले ‘सब कुछ चंगा-चंगा’,
सा’ब, तुम्हारे रामराज में शववाहिनी गंगा.

ख़तम हुए श्मशान तुम्हारे,
ख़तम काष्ठ की बोरी;
थके हमारे कंधे सारे,
आंखें रह गयीं कोरी;
दर-दर जाकर यमदूत खेलें–
मौत का नाच बेढंगा.
सा’ब, तुम्हारे रामराज में शववाहिनी गंगा.

नित्य निरंतर जलती चिताएं
राहत मांगें पल-भर;
नित्य निरंतर टूटती चूड़ियां,
कुटती छाती घर-घर;
देख लपटों को फ़िडल बजाते–
वाह रे ‘बिल्ला-रंगा’!
सा’ब, तुम्हारे रामराज में शववाहिनी गंगा.

सा’ब, तुम्हारे दिव्य वस्त्र,
दिव्यत् तुम्हारी ज्योति;
काश, असलियत लोग समझते,
हो तुम पत्थर, ना मोती;
हो हिम्मत तो आके बोलो–
‘मेरा साहब नंगा’.
सा’ब, तुम्हारे रामराज में शववाहिनी गंगा.


लाशें / राजेश मल्ल

नदियों में डूबती-उतरती लाशें,
धरती से हाथ भर ऊपर
बार बार उठ खड़ी होती लाशें,
अंगारों के बीच तड़पती हैं लाशें,
भठ्ठियों की लोहे की दीवारों को पिघला देती लाशें।
हर झूठ से परदा उठा देती हैं लाशें।
बार बार इंकार करती हैं कि वे नहीं हैं सिर्फ लाशें।
बता रही हैं कि वे आंकड़े तो बिल्कुल नहीं हैं।
बता रही हैं कि वे अभी मरी नहीं हैं।
नहीं हुईं हैं वे मुक्त न उनसे यह महा देश।
और इतना जल्दी हम मुक्त नहीं होने देंगे
कहती हैं लाशें।
हवा के हल्के झोंके और बारिश की धार के साथ
क्लास के बच्चों की तरह हाथ उठाकर करतीं हैं सवाल लाशें।
आप के पास सुनने का समय हो और आप बात कर सकते हों
तो बहुत-बहुत कहना चाहतीं हैं लाशें।
बता रही हैं कि एक- एक की अलग-अलग
एक- एक मुक्कमल दुनिया थी।
बता रही हैं कि उनके सपने थे
और बहुत बहुत योजनाएं थीं।
बता रही हैं उनके ढेर सारे रिश्ते थे
जमीन से , रास्तों से, सूखे और हरियाली से।
गांव से, घर से तथा खेत – खलिहान से।
उनका घर था, घर में गूंजा करती थी किलकारियां।
और गाढ़े और चटक रंगों से सराबोर था उनका जीवन।
सांस टूटने से ठीक पहले भरपूर आस थी जीवन की।
और यहां जबकि बहुत भीड़ और उमस है तो
थोड़ी देर रुक कर बात करना चाहतीं हैं लाशें।


कलन्दर / अनिल कार्की

मूर्तियां चुप है

अट्टहास करते हैं
वे विशाल स्टेडियम
जिनके नाम रखे गए

वे शहर लाशों से पटे पड़े है
जिनके नाम बदले गए

धीमे धीमे चल रही है मौतें
उन सड़कों पर
जिन्हें हर मौसम सदाबहार कहा गया

उन गलियों चौराहों से
सारे रंग उड़ गए
जिनके गले मे हक़ीम के शागिर्दों ने
डाली थी नए नामों की तख़्ती

उन हथियारों को
मार गया लकवा
जिन पर बजीर-ए-दिफ़ा लटकाया करते थे
नज़र न लगने के टोटके

जिन्हें साफ रखने की सौगंध उठायी गयी
उन नदियों का क्या हुआ?
हम किस जादू के इंतिजार में है?

नई नक़्क़ाशी पाने को बेताब हुई जाती है संसद

संसद सब संभाल लेगी
कलन्दर चुटकी बजायेगा
मौसम बदल देगा


हाथ उठा के टोको भाई / बोधिसत्व

पूरा मुल्क मसान हुआ है
चिता कब्र घमसान हुआ है
औघड़ का सामान हुआ है
जोकर कोई प्रधान हुआ है!

गलत कहूं तो रोको भाई।
हाथ उठा के टोको भाई।

अपने लिए विमान ले रहा
जनता को शमशान दे रहा
लोगों के दुख पर हंसता है
मालिक ये हैवान हुआ है

गलत कहूं तो रोको भाई।
हाथ उठा के टोको भाई।

अच्छे दिन का दे के छौंका
खोज रहा विपदा में मौका
मार रहा है बिना दवाई
मौन मूक है निपट कसाई
भंडुओं का भगवान हुआ है

गलत कहूं तो रोको भाई।
हाथ उठा के टोको भाई।

काज नहीं है काम नहीं है
हाहा है आराम नहीं है
अपने सुख का महल बनाए
जनता को पैदल चलवाए
कायर एक विधान हुआ है

गलत कहूं तो रोको भाई।
हाथ उठा के टोको भाई।


कहो नरेन्दर, मज़ा आ रहा है..? / आशु मिश्रा

इलाबाद परियाग हो गया,
और बनारस बना क्योटा..!
धनीराम का खेत बिक गया,
ना थार बचा, ना लोटा..!
देश हमारा, कहां जा रहा है..?
कहो नरेन्दर, मजा आ रहा है..?

टूटी चप्पल पहन के मनसुख,
बोरा उठा रहा है..!
और हमारा देसी नीरो,
देखो बंशी बजा रहा है..!
देश हमारा, कहां जा रहा है..?
कहो नरेन्दर, मजा आ रहा है..?

डॉलर सर पै पांव जमाये,
मुंह के बल पड़ा रुपइया..!
और भक्त चिल्लाय रहे हैं,
जय गंगा, जय गइया..!
देश हमारा, कहां जा रहा है..?
कहो नरेन्दर, मजा आ रहा है..?

जो गंगा के लिए लड़ा,
वो जीवन गंवा रहा है..!
और इधर मन-मौजी,
मन की बातें सुना रहा है..!
देश हमारा, कहाँ जा रहा..?
कहो नरेन्दर, मजा आ रहा है..?



भूली-बिसरी ख़बरे

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