लॉकडाउन में केंद्र सहित दिल्ली, यूपी और हरियाणा सरकार प्रवासी मजदूरों को राशन और ट्रांसपोर्ट सुविधा उपलब्ध कराए: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कोविड-19 की वजह से लगे लॉकडाउन में फंसे प्रवासी मजदूरों की परेशानी और कष्ट से जुड़ी एक याचिका पर आज स्वत: संज्ञान सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली तथा हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों को सूखा राशन प्रदान करने का आवश्यक दिशा निर्देश पारित किया। मामले की अगली सुनवाई 24 मई को रखी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत योजना हो या राशन वितरण की अन्य कोई योजना हो, केंद्र सरकार और एनसीआर क्षेत्र में शामिल राज्य सरकारों द्वारा प्रवासी मजदूरों को तत्काल मई 2021 से सूखा राशन प्रदान किया जाए।

8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को राशन उपलब्ध कराना केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। पिछले वर्ष मई और जून, 2 महीने राशन उपलब्ध कराने के बाद यह योजना बंद कर दी गई थी। भारत सरकार के खाद्य आपूर्ति एवं वितरण विभाग के अनुसार पिछले वर्ष आत्मनिर्भर भारत योजना के तहत प्रवासी मजदूरों को सिर्फ़ 33% गेहूं और 56% दाल उपलब्ध कराया गया था।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण और एमआर शाह की खंडपीठ ने एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज, हर्ष मंदर और जगदीप छोकर द्वारा कोरोना महामारी की दूसरी लहर को लेकर विभिन्न राज्यों द्वारा घोषित लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रमिकों की परेशानी और कष्ट को लेकर दायर इस याचिका पर आज सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को कई दिशा निर्देश जारी किए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सूखा राशन प्रदान करते समय राज्यों के अधिकारियों को उन प्रवासी मजदूरों से पहचान पत्र लेने पर जोर नहीं दिया जाएगा और फंसे हुए प्रवासी मजदूरों द्वारा किए गए स्व-घोषणा के आधार पर उन्हें सूखा राशन दिया जाए।

फंसे हुए प्रवासी श्रमिकों और उनके परिवार वालों के लिए भोजन की व्यवस्था करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीटी दिल्ली, यूपी और हरियाणा राज्यों को फंसे हुए प्रवासी कामगारों और उनके परिवारों के लिए एनसीआर में जानी पहचानी जगह पर सामुदायिक रसोई स्थापित करने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उन्हें दिन में दो बार भोजन उपलब्ध कराया जाए।

कोर्ट ने एनसीटी दिल्ली, यूपी और हरियाणा सरकारों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है कि एनसीआर में जो फंसे हुए प्रवासी कामगार अपने घर वापस जाना चाहते हैं, उन्हें पर्याप्त परिवहन सुविधा उपलब्ध कराया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने दिनांक 09.06.2020 को दिए गए अपने आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें उन प्रवासी श्रमिकों को राहत देने के लिए दिशा-निर्देश दिए गए थे, जो अपने पैतृक गाँवों में लौट आए थे। इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवासी श्रमिकों को 15 दिन के अंदर उनके घर पहुंचाने और प्रत्येक प्रवासी मजदूर को उसकी दक्षता के अनुसार रोजगार उपलब्ध कराते हुए उसके पुनर्वास की योजना बनाने के आदेश दिए थे।

यही नहीं, दिनांक 01.09.2020 को पारित अपने आदेश के संदर्भ में, उच्चतम न्यायालय ने राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों को अपना जवाब पेश करने और इन उपरोक्त मुद्दों पर उनके द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य सरकारों ने इन मुद्दों पर अभी तक सही तरीके से अपना जवाब भी पेश नहीं किया है।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से एडवोकेट प्रशांत भूषण हाजिर हुए। सुप्रीम कोर्ट ने जब प्रवासी मजदूरों की परेशानी और कष्ट को लेकर चिंता जताई और यह टिप्पणी की वह प्रवासी मजदूरों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और सस्ता परिवहन विकल्प उपलब्ध कराने को लेकर कोई अंतरिम आदेश जारी करेगा तो केंद्र सरकार की तरफ से सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध किया।

अभी हाल ही में 13 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनजर प्रत्येक राज्य सरकार को उनके राज्य में उपस्थित प्रवासी मजदूरों की संतानों की संख्या सुनिश्चित करने और उनके कल्याण के लिए लागू की गई योजनाओं और उनको दी जाने वाली सुविधाओं की सूचना मांगी थी।

पिछले वर्ष भी कोविड-19 महामारी के वक्त मोदी सरकार द्वारा अचानक घोषित लॉकडाउन की वजह से प्रवासी मजदूरों को अमानवीय संकट का सामना करना पड़ा था। उस वक्त भी याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में राहत के लिए याचिका दायर करनी पड़ी थी। केंद्र और राज्य सरकार उस भीषण आपदा के वक्त भी हाथ पर हाथ धरकर बैठी थी। केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में झूठे हलफनामे तक दायर किए गए थे।

अब कोरोना के दूसरी लहर के वक्त भी विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा लॉक डाउन की तो घोषणा कर दी गई है मगर प्रवासी मजदूरों की रोजी रोटी की सुरक्षा को लेकर कोई घोषणा नहीं की गई, ना ही उन्हें दो वक्त का भोजन कराने के लिए कोई पुख्ता कदम उठाया गया।

कई राज्य सरकारों द्वारा औद्योगिक इकाइयों का उत्पादन जारी रखने के लिए प्रवासी मजदूरों को औद्योगिक इकाइयों की जिम्मेदारी पर रोककर रखने तक के आदेश जारी कर दिए गए हैं।

आम जनता को राहत दिलाने में चुनी हुई सरकारों के नाकाम रहने पर सिविल सोसाइटी को मजदूरों और मेहनतकश जनता के पक्ष में अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस अंतरिम आदेश को केंद्र और राज्य सरकारें धरातल पर किस प्रकार लागू करती है। पूरी उम्मीद है इस बार भी विभिन्न योजनाओं को लागू करने के नाम पर लीपापोती की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा ज़ारी दिशा निर्देश के मुख्य अंश इस प्रकार हैं-

(1) राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रवासी श्रमिकों को आत्मनिर्भर भारत योजना या किसी अन्य योजना के तहत केन्द्र सरकार, एनसीटी दिल्ली , यूपी राज्य और हरियाणा राज्य द्वारा सूखा राशन प्रदान किया जाए और योजना मई, 2021 से प्रभावी होगी। सूखा राशन प्रदान करते समय राज्यों के अधिकारी उन प्रवासी मजदूरों से जिनके पास उस समय पहचान पत्र नहीं है, उनसे पहचान पत्र मांगने पर जोर नहीं देंगे और फंसे हुए प्रवासी मजदूरों द्वारा यह तथ्य बताने पर उन्हें सूखा राशन दिया जाए।

(2) एनसीटी दिल्ली, यूपी राज्य और हरियाणा राज्य (एनसीआर में शामिल जिलों के लिए) यह सुनिश्चित करेंगे कि जो फंसे हुए प्रवासी मजदूर अपने घर वापस लौटना चाहते हैं (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में) उनको पर्याप्त परिवहन सुविधा प्रदान किया जाए। जिला प्रशासन पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर ऐसे फंसे हुए प्रवासी मजदूरों की पहचान कर सकता है और सड़क परिवहन या ट्रेन द्वारा उनको परिवहन की सुविधा प्रदान कर सकता है। प्रवासी मजदूरों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार रेल मंत्रालय को ज़रूरी और पर्याप्त उपाय करने के दिशा निर्देश जारी कर सकती है।

(3) एनसीटी दिल्ली, उत्तर प्रदेश राज्य और हरियाणा राज्य (एनसीआर में शामिल जिलों के लिए), फंसे हुए प्रवासी मजदूरों के लिए अच्छी तरह से पूर्व चिन्हित स्थानों (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में) पर सामुदायिक रसोई खोलेगी ताकि फंसे हुए प्रवासी मज़दूरों और उनके परिवार के सदस्यों को दिन में दो बार भोजन मिल सके।

(4) दिनांक 01.09.2020 को पारित आदेश के संदर्भ में, उच्चतम न्यायालय ने राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों को अपना जवाब पेश करने और इन उपरोक्त मुद्दों पर उनके द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश राज्यों ने उपरोक्त मुद्दों पर अपना सही जवाब पेश नहीं किया है और यदि जवाब दायर किया भी है तो वह अधूरा है। इसलिए, अंतिम अवसर के तौर पर, हम एनसीटी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र और उड़ीसा राज्य को उपरोक्त मुद्दों पर अपना विशिष्ट जवाब देने के लिए 10 दिन का अतिरिक्त समय देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों की मूल प्रति नीचे संलग्न है।

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