देश में बेलगाम बेरोजगारी: सिर्फ़ अप्रैल में 75 लाख लोगों की नौकरी गई

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनमी के अनुसार अप्रैल के महीने में करीब 75 लाख नौकरियां गई हैं।

शहरों में बेरोजगारी की दर ग्रामीण इलाकों के मुकाबले ज्यादा है। ईपीएफओ यानी पीएफ अकाउंट के खुलने और बंद होने के आधार पर देखें तो दिसंबर 2019 में 67 लाख और दिसंबर 2020 में 70 लाख पीएफ अकाउंट बंद किए गए थे। आंकड़ा विशेषज्ञ बताते हैं कि सबसे ज्यादा नौकरी 20 से 29 साल के लोगों की गई है। वही देश के अंदर गरीबी और ज्यादा बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में 20% और ग्रामीण क्षेत्रों में 15% तक लोग गरीबी की परिभाषा में आए हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान देश की मेहनतकश आबादी पर बेरोजगारी के साथ-साथ महंगाई की दोहरी मार पड़ी।

हीरो, मारुति जैसी कंपनियां 20 से 23 साल तक की ठेके पर ताकि असेंबली लाइन पर तेजी से काम करवाया जा सके। मारूति, हीरो, टाटा मोटर्स जैसी कंपनियां 7 महीने से लेकर 2 साल तक के लिए दसवीं पास या आईटीआई मज़दूरों की भर्ती करती हैं। अब हर दो साल में उसकी नौकरी गंवाने और मिलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है और बेरोजगारी के आंकड़ें बदलते रहते हैं। यहां मुनाफे को बढ़ाने की थियोरी जॉब लॉस या नौकरी जाने की वजह है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर युवाओं का खून चूस कर हीं मुनाफा कमा रहा है।

नवीनतम सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में वेतनभोगी नौकरियों में 2020-21 में 9.8 मिलियन की कमी आईं।  भारत में 2019-20 में कुल 85.9 मिलियन वेतनभोगी नौकरियां थीं, जो मार्च 2021 के अंत तक कम होकर 76.2 मिलियन हो गईं।

असंगठित क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित

लॉक डाउन के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर हुए हैं। जिस तरह शहरों में दूरदराज के इलाकों और गांव में संक्रमण फैला है उससे दिहाड़ी पर रोजी रोटी कमाने वालों पर काफी असर पड़ा है

निजी निर्माण कार्यों पर रोक है और खेती के बाद निर्माण क्षेत्र में ज्यादा असंगठित मज़दूर काम करते हैं। यहां भी बेलदारी करने वालों यानि निर्माण सामग्री ढोने वालों की संख्या ज्यादा है और इसमें भी महिलाओं की संख्या ज्यादा होती है जो आमतौर पर किसी मिस्त्री या ठेकेदार के नीचे काम करते हैं। यहां भुखमरी की कगार पर लोग बंधुआ मज़दूरी करने के लिए तैयार हो रहे हैं।
 
घरेलू कामगारों की भी एक बड़ी संख्या है। मार्च 2020 में लगे लॉकडाउन के दौरान घरेलू कामगारों को कोरोना वायरस के संक्रमण का वाहक मानते हुए इनके साथ भेदभाव किया गया और उसके बाद उन्हें घरों में काम मिलना बंद हुआ। घरों में साफ़ सफाई  करने वालों, गाड़ी रिपेयरिंग की दुकान में काम करने वालों, ड्राइवरों, सभी लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

छंटनी – बंदी और वीआरएस से जूझते संगठित क्षेत्र के कर्मचारी

औद्योगिक क्षेत्रों में दोहरी मार पड़ी है जहां एक तरफ कैजुअल और ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की संख्या में भारी कटौती हुई है वही वेतन से जुड़े ओवरटाइम एलाउंस, प्रॉडक्शन इंसेंटिव्स में भारी कटौती हुई है। गारमेंट जैसे संगठित उद्योग का तमाम कार्य बल भी असंगठित है। यहां किसी महीने काम ज्यादा होता है तो किसी महीने काम नहीं होता। स्थिति यह है कि नीमराना और बावल के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर या ऑटोमोबाइल सेक्टर में काम करने वाला मजदूर पिछले साल कापसहेड़ा के गारमेंट सेक्टर में काम कर रहा था और अब वहां भी नौकरी जाने के बाद दिहाड़ी मजदूरी कर रहा है या कहीं रेहडी पटरी लगा रहा है। यानी उसको संगठित क्षेत्र से असंगठित क्षेत्र में ढकेल दिया गया है और उसकी वेतन, बोनस, पीएफ, ईएसआई, मेडीक्लेम की सुविधाएं छीन ली गई हैं। इसको केंद्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का नाम दिया है।

लॉकडाउन के आसपास ही होंडा मोटरसाइकिल, होंडा कार, हीरो मोटरसाइकिल, टोयोटा किर्लोस्कर मोटर, जनरल मोटर्स, टाटा मोटर्स, माइको बॉस ने वीआरएस स्कीम के जरिए स्थाई कर्मचारियों की संख्या कम की। इस तरह ऑटोमोबाइल उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों को दो फायदे हुए एक तो स्थाई कर्मचारियों की जगह ठेका कर्मचारियों की नियुक्ति की जा सकेगी दूसरा यूनियन के जरिए सामूहिक वेतन समझौता नहीं करना पड़ेगा। जहां वीआरएस लागू नहीं किया जा सकता था वहां श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए अवैध छंटनी की गई और उसके बाद वहां अपरेंटिस और ठेका मजदूर को भर्ती कर उसको रोजगार सृजन का नाम दिया गया।

कोविड 19 महामारी और आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने से पिछले लॉकडाउन के दौरान करीब 13 करोड लोगों की नौकरीयां गई थी। इनमें से करीब 75% लोग दिहाड़ी मजदूरी करने वाले थे या दूसरे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत थे। ग्रामीण क्षेत्रों में दोहरी मार पड़ी। एक तरफ तो शहर में नौकरी गंवाने के बाद लोग घर वापस लौटे वहीं दूसरी तरफ कोविड के संक्रमण का फैलाव हुआ।

वहीं मनरेगा में काम करने वालों की संख्या बढ़ने लगी। मगर मनरेगा में स्वीकृत प्रोजेक्ट का सिर्फ़ 12 प्रतिशत काम हुआ और मनरेगा सिर्फ ग्रामीण क्षेत्र में आदमी को जिंदा रखने लायक रोजगार उपलब्ध कराती है। मनरेगा में ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वीकृत न्यूनतम मजदूरी सभी कम मजदूरी दी जाती है। फिलहाल यह ₹200 के आसपास है। शहर में मजदूरों को जिंदा रखने के लिए इंदिरा रसोई और अन्नपूर्णा रसोई जैसी योजनाएं हैं जहां ₹8 में चार रोटी और सब्जी देकर दिहाड़ी के लिए मजदूरों की सेना तैयार की जाती है। 23 करोड़ लोगों को न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलती है।

महामारी के दौरान बढ़ती मंहगाई

एक और पहलू जो निजि व्यक्ति से लेकर बड़ी फर्म को नुकसान पहुंचा रहा है, वह है लागत में वृद्धि। खाने पीने की चीजों और गैस, पेट्रोल, डीजल की कीमतों में लगातार 10 महीनों तक बेलगाम बढ़ोत्तरी हुई है। जिस वजह से परिवहन खर्च बढ़ा और इसके साथ महंगाई दर भी बढ़ी है। अप्रैल में सरसों तेल 200 रुपए लीटर मिल रहा है और पेट्रोल क़रीब 100 रुपए लीटर मिल रहा है। बंगाल, केरल, तमिलनाडु, आसाम के विधानसभा चुनाव नतीजों के आने के साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पिछले 1 सप्ताह से लगातार वृद्धि हो रही है।

ख़ैर, मोदी जी का 20 हज़ार करोड़ का आलीशान सेंट्रल विस्ट्रा महल योजना प्राथमिकता के साथ ज़ारी है।

मोदी सरकार की नाकामी

ज़रूरत थी कि सरकार संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र में नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुविधा सुरक्षा , खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा को सुनिश्चित करते हुए नीति निर्धारित करती जिससे वर्तमान संकट से लड़ने के साथ साथ भविष्य की भी सुरक्षा रहती ।

मगर मोदीजी नोटबंदी और जीएसटी के तुगलकी फैसले के जरिए जनता की पहले ही कमर तोड़ चुके थे और उसके ठीक बाद कोविड-19 महामारी के दौरान ही मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों और कृषि कानूनों में संशोधन लाकर ठीक इसके विपरीत अपने देश की मेहनतकश जनता को खुले बाज़ार में असुरक्षित छोड़ दिया गया।

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