पीएम केयर फंड और वेंटिलेटर खरीद में धांधली

कोविड के बहाने घपले की कहानी-2

पूरे देश में ऑक्सीजन व वेंटिलेटर्स को लेकर त्राहि-त्राहि मची है। एक साल पहले भी यही किल्लत थी। इस बीच पीएम केयर फंड बना, देश में वेंटिलेटर्स बनाने की कवायद हुई, खूब पैसा खर्च हुआ, लेकिन हालत फिर भी बदतर हैं। एक साल में असल में क्या हुआ? …कोविड के नाम पर जारी खेल की दूसरी किस्त वेंटिलेटर्स खरीद घोटाला…

पिछले साल देश में कोरोना के मामले बढ़े तो एक बात साफ़ हो चुकी थी कि कोविड-19 से संक्रमित लोगों को साँस लेने में परेशानी हो रही है और देश में वेंटिलेटर की बड़ी कमी है। आज कोरोना की दूसरी लहर आने पर भी कमोबेश वही स्थिति है।

साल 2020 में देश में वेंटिलेटर्स की संख्या का कोई सरकारी आँकड़ा उपलब्ध नहीं था लेकिन सरकारी अस्पतालों में कुल आईसीयू बेड के हिसाब से अंदाज़न देश में 18 से 20 हज़ार वेंटिलेटर्स उपलब्ध थे। स्पष्ट था कि भारत में कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए दो लाख वेंटिलेटरों की ज़रूरत हो सकती है।

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पीएम केयर फंड में जुटी भारी रक़म

कोविड-19 के बहाने 27 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने ‘पीएम केयर्स फंड’ का ऐलान किया। बावजूद इसके कि ‘प्रधानमंत्री राहत कोष’ पहले से मौजूद है। ख़ुद प्रधानमंत्री ने देशवासियों से इसमें सहयोग देने के लिए कहा। इस फंड के लिए पैसे देने वालों को कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉनस्बिलिटी (सीएसआर) के तहत टैक्स में छूट की सुविधा दी गई।

जानी-मानी हस्तियों व औद्योगिक घरानों ने इसमें बड़ी रकम दान की, तमाम नौकरी पेशा लोगों तक के वेतन का कुछ हिस्सा काटकर पीएम केयर्स में डोनेट किया गया। हालाँकि इस फ़ंड में कितने पैसे जुटे और उन पैसों का क्या हुआ इसकी जानकारी नहीं मिल सकती क्योंकि सरकार ने इस फंड को काफ़ी आलोचना के बावजूद सूचना के अधिकार संबंधी आरटीआई एक्ट के दायरे से बाहर रखा है।

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महज 30,000 वेंटिलेटर्स ख़रीदे गए

18 मई 2020 को प्रधानमंत्री के सलाहकार भास्कर कुल्बे ने स्वास्थ्य मंत्रालय को लिखे एक ख़त में पीएम केयर्स फ़ंड से दो हज़ार करोड़ की रक़म से 50 हज़ार ’मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स का ऑर्डर दिए जाने की जानकारी दी थी। इस बीच स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मार्च महीने के अंत में ही वेंटिलेटर ख़रीदने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। 5 मार्च 2020 को स्वास्थ्य मंत्रालय के उद्यम एचएलएल ने वेंटिलेटर्स की सप्लाई के लिए टेंडर निकाला।

7 सितंबर, 2020 के आरटीआई आवेदन के जवाब में एचएलएल ने बताया कि बीईएल ने 24332, एग्वा ने 5000, अलाइड मेडिकल ने 350 और बीपीएल के 13 वेंटिलेटरों की सप्लाई की है। इसके बाद से वेंटिलेटर सप्लाई नहीं किए गए हैं। एक साल बाद 29695 वेंटिलेटरों की सप्लाई हुई है, जबकि ज़रूरत डेढ़ लाख से अधिक वेंटिलेटरों की थी।

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वेंटिलेटर्स की कीमत में 8 गुने का अंतर

आरटीआई के जवाब से निकल कर सामने आती है कि एक ही सरकारी टेंडर में एक ही तरह के स्पेसिफिकेशन वाली अलग-अलग कंपनी के वेंटिलेटर्स की क़ीमत में भारी अंतर है। अलाइड मेडिकल के एक वेंटिलेटर की क़ीमत 8.62 लाख है और एग्वा के एक वेंटिलेटर की क़ीमत 1.66 लाख है, यानी कीमत में सात-आठ गुना तक का अंतर है।

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बगैर तजुर्बे वाली कंपनी को बम्पर ऑर्डर

नोएडा स्थित एग्वा हेल्थकेयर जिसे नीति आयोग ने ख़ासा प्रचार-प्रसार दिया, के पास वेंटिलेटर बनाने का कोई तजुर्बा नहीं था लेकिन उसे 10 हज़ार वेंटिलेटर का ऑर्डर दिया गया। उसने अब तक सिर्फ़ 5 हज़ार वेंटिलेटर ही डिलीवर किए हैं। एग्वा ने कार बनाने वाली कंपनी मारुति की मदद से वेंटिलेटर बनाए।

’हाफपोस्ट इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सरकार की ओर से बनाई गई टेक्निकल इवैल्युएशन कमेटी द्वारा 16 मई 2020 को दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में ट्रायल के बाद एग्वा वैंटिलेटर के बारे में कहा गया कि वह रेस्पीरेट्री पैरामीटर बनाए नहीं रख पा रहे हैं।

कोरोना लहर कमजोर, ऑर्डर कैंसिल

ट्रिविट्रॉन के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. जीएसके वेलू ने बीबीसी को बताया कि कंपनी को 4000 बेसिक मॉडल और 2000 हाफ एंड मॉडल बनाने को मिला। बनने के बाद जब तक ट्रायल पूरे हुए तब तक कोरोना की पहली लहर थोड़ी कम होने लगी थी और कहा गया कि वेंटिलेटर की ज़रूरत नहीं है। लेकिन दूसरी लहर आने के बाद दो सप्ताह पहले ऑर्डर मिला और 1000 वेंटिलेटर गुजरात सहित कुछ राज्य सरकारों को भेजा गया।

धूल फांकते वेंटीलेटर

बीबीसी ने बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में पीएम केयर्स फंड के तहत मिले वेंटिलेटर्स का हाल जानने के लिए कुछ अस्पतालों से संपर्क किया। ज़्यादातर अस्पतालों से पता चला कि या तो ये वेंटिलेटर अब तक इंस्टॉल ही नहीं हुए हैं, या स्टाफ़ की ज़रूरी ट्रेनिंग नहीं हुई है। जहां इंस्टॉल हो गए हैं और स्टाफ़ भी है, वहाँ डॉक्टरों को इसमें ऑक्सीजन को लेकर समस्याएँ आ रही हैं।

क्वालिटी का कोई मानक नहीं

जब भारत में कोरोना के कारण देसी कंपनियों को वेंटिलेटर बनाने का काम दिया गया तब तक देश में वेंटिलेटर्स के लिए कोई संस्थागत नियम नहीं थे। इसी बीच गुजरात में ज्योति सीएनसी कंपनी के धमन-1 वेंटिलेटर की क्वालिटी को लेकर सवाल उठे, क्योंकि बिना सर्टिफिकेट के अच्छे वेंटिलेटर और खराब वेंटिलेटर का अंतर पता लगाना एक मुश्किल काम साबित होता जा रहा था।

बाद में कथित तौर पर मानक बने, लेकिन ना तो इसका पालन हुआ, ना ही किसी कम्पनी ने इसके लिए आवेदन किया। सवाल ये है कि भारत में बनने वाले ये वेंटिलेटर्स जिनकी क्वालिटी को लेकर बार-बार सवाल उठ रहे हैं उन्होंने भारत के मानकों के तहत सर्टिफिकेट का आवेदन क्यों नहीं किया।

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“ना खाऊँगा, ना खाने दूँगा”

पूरा मामला सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाता है। पीएम केयर फंड में घोटाले की आशंका के साथ वेंटिलेटर खरीद में धांधली, चहेती कम्पनियों को सीधे लाभ पहुँचाने का खेल आदि के साथ जनता के स्वास्थ्य के प्रति अपराधिक लापरवाही स्पष्ट है। ‘न खाऊंगा ना खाने दूंगा’ की दुहाई देने वाले ज़नाब पीएम की कार्यगुजारी की यह महज बानगी है!

(बीबीसी में छपी रिपोर्ट पर आधारित)

(‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, अप्रैल-जून, 2021 में प्रकाशित)

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