8 घण्टे काम की माँग के संघर्ष का प्रतीक है मई दिवस

अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस (1 मई) पर विशेष

आज जब हम मई दिवस को याद कर रहे हैं, तो मज़दूरों के लंबे संघर्षों के दौरान हासिल अधिकारों को मटियामेट करने का दौर अपने चरम पर है और कोरोना के भय का माहौल एकबार फिर खड़ा कर दिया गया है। जिस मई दिवस की परंपरा 8 घंटे काम की माँग से आगे बढ़ी थी, आज काम के घंटे 12 करने का क़ानून खुले तौर पर आ गया है।

135 साल के उतार-चढ़ाव भरी एक लम्बी यात्रा से गुजरते हुए मई दिवस आज एक बेहद मुश्किल समय में उपस्थित है। मेहनतकश-मज़दूर वर्ग के सामने पहले से ही विकट समस्याओं के बीच तमाम ऐसे संकट आ खड़े हुए हैं, जो भयावह तस्वीर उपस्थित करते हैं। छंटनी-बंदी, भूख, बेकारी के बीच मनमर्जी रखने-निकालने की खुली छूट के साथ 12 घंटे कार्यदिवस कानूनी रूप ले चुका है।

मई दिवस ने 8 घंटे काम की माँग को बुलंद किया था, आज काम के घंटे 12 करने और 16 घंटे तक खटाने के लिए तैयारी पूरी हो चुकी है। मोदी सरकार सारे विरोधों व संविधान तक को दरकिनार कर मज़दूर विरोधी चार श्रम संहिताओं को लागू करने जा रही है।

मई दिवस की क्रान्तिकारी विरासत

मई दिवस की परंपरा मज़दूर वर्ग के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। जब सूर्योदय से सूर्यास्त तक बेहद कठिन परिस्थितियों में खटने वाले मज़दूर एकजुट हुए और पहली बार उन्होंने इंसान होने का एहसास कराया, 8 घंटे काम की माँग को बुलंद किया और इसी को लेकर 1886 की 1 मई को मज़दूरों ने अपना दिन घोषित किया। 8 घंटे काम, 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन के हक़ को एक बड़े आंदोलन के रूप में उपस्थित किया।

1 मई 1886 को शिकागो में मज़दूरों की जबर्दस्त हड़ताल हुई। दमन चौतरफा था, मज़दूरों को उससे लोहा लेना पड़ा। तमाम मज़दूरों को अपनी जान की कुर्बानियां देनी पड़ी। लेकिन मज़दूरों ने भी अपने जज्बे का प्रदर्शन किया, अपने खून से सने कपड़े को लहरा कर लाल झंडा पैदा किया।

4 मई को अमेरिका के शिकागो  के हे मार्केट में दमन का एक और भयावह रूप सामने आया और बेगुनाह 8 मज़दूर नेताओं को काल कोठरियों में डाल दिया गया। 4 मज़दूर नेताओं को फांसी की सजा दे दी। लेकिन जेल की कालकोठरी से अल्बर्ट पर्सन्स और ऑगस्ट स्पाइस की आवाज जो निकली वह आज तक गुंजायमान है। मज़दूर वर्ग के अंतरराष्ट्रीय संगठन द्वारा 1889 से 1 मई को पूरी दुनिया में मज़दूर दिवस मनाने का ऐलान हुआ। तबसे यह अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस है।

संघर्ष का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा, 8 घंटे काम के हक के साथ तमाम क़ानूनी हक हासिल होते गये। संघर्षों के इस सिलसिले में मज़दूरों के भीतर जो जज्बा पैदा हुआ था, उससे मज़दूर वर्ग की विचारधारा और परिपक्व हुई, मज़दूरों की पार्टियाँ बनीं। मज़दूरों ने 1917 में रूस में जारशाही की सत्ता को पलट कर अपने पहले राज को स्थापित किया, और धीरे-धीरे दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर मज़दूर वर्ग की सत्ताएं काबिज हुईं।

वर्तमान दौर के बदले हालात में पूँजीवाद फिर आक्रामक हमले बोलने लगा है। क्योंकि वक्ती तौर पर आज मज़दूर आंदोलन पीछे हटा है, बिखराव और पराजय की स्थिति में है।

कोरोना के बीच संकटग्रस्त मज़दूर

पिछला सवा साल जहाँ मज़दूर-मेहनतकश आवाम के लिए आपदा का रहा, वहीं मोदी जमात ने इसे देसी-विदेशी पूँजीपतियों के अवसर में बदल दिया। लॉकडाउन की महाविपदा के बीच लम्बे संघर्षों से हासिल श्रम क़ानूनी अधिकारों को खत्म करके मालिकों के हित में चार श्रम संहिताएँ लाने, जन विरोधी तीन कृषि कानून थोपने, जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक-सरकारी संस्थानों-संपत्तियों को बेचने आदि का मोदी सरकार का घोडा सरपट दौड़ गया।

आज जब हम मई दिवस को याद कर रहे हैं, तो हमारे सामने एक तरफ मज़दूरों के लंबे संघर्षों के दौरान हासिल अधिकारों को मटियामेट करने का दौर अपने चरम पर है और कोरोना के भय का माहौल एकबार फिर खड़ा कर दिया गया है।

छिनते अधिकारों के दौर में मई दिवस

जिस मई दिवस की परंपरा 8 घंटे काम की माँग से आगे बढ़ी थी, आज काम के घंटे 12 करने के कानून खुले तौर पर आ गए हैं और 16 घंटे तक खटाने के लिए तैयारी पूरी हो चुकी है। मज़दूरों के वेतन में तरह-तरह से कटौतियां बढ़ रही हैं। छँटनी का नया दौर गति पकड़ रहा है।

याद रहे, दमन के ख़िलाफ प्रतिरोध का प्रतीक दिवस भी है मई दिवस। आज एक बार फिर सत्ता का दमन बेलगाम हो चुका है। न्याय और हक़ की आवाज़ उठाने वालों पर फर्जी मुक़दमे थोपे जा रहे हैं, गिरफ्तारियाँ तेज हो रही है, जेल लाठी-डंडे और बंदूक से कुचलने के उन्हीं पुराने हथियारों का इस्तेमाल आज ज्यादा कुशलता से हो रहा है। मुनाफाखोरों और निरंकुश सत्ता का नापाक गठजोड़ हर तरीके से मज़दूरों को डराने, ख़ौफ पैदा करने के लिए पहले से ज्यादा मुस्तैदी से उतर पड़ा है।

जहाँ तीन काले कृषि क़ानूनों के खि़लाफ दिल्ली की सरहदों पर किसान मुस्तैदी से डटे हुए हैं, वहीं मोदी सरकार तमाम कुचक्रें रचने में लगातार सक्रिय है। फिर भी यह आन्दोलन जनांदोलन बनता जा रहा है, जो आज के दौर में मई दिवस की परंपरा की याद दिलाता है।

यह नये संकल्प लेने का समय है

मौजूदा हालात में मज़दूरों के सामने आज जो सवाल उपस्थित हैं, उसमें निश्चित रूप से मई दिवस पर नए संकल्प लेने का मौका पहले से ज्यादा मौजू हुआ है। आइए मज़दूर विरोधी इस संकटपूर्ण दौर में, मई दिवस के शहीदों को याद करते हुए संकल्प लें!

आठ घंटे काम के हक सहित मज़दूर वर्ग को अधिकार विहीन बनाने के कुचक्रों के ख़िलाफ वर्गीय एकता कायम करें, निरंतरता में एक जुझारू संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए निर्णायक संघर्ष में तब्दील करें!

(‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, अप्रैल-जून, 2021 में प्रकाशित)

%d bloggers like this: