आपदा में अवसर ढूंढ़ते गिद्ध और उनका सफ़ेद दाढ़ी वाला बाबा

वेदांता नें सुप्रीम कोर्ट में अपील लगाई कि देश में ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए उसे देश हित में तमिलनाडु तूतीकोरन स्थित स्टारलाईट कॉपर स्मेलटिंग प्लांट को फ़िर से खोलने और मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन करने की इजाज़त दी जाए।

वेदांता ग्रुप की इस कम्पनी को पर्यावरण नियमों का उल्लघंन करने और स्थानीय जनता के तीखे विरोध और गोलीकांड में 14 लोगों के मारे जाने के बाद तमिलनाडु सरकार द्वारा 2018 में पूरी तरह बंद कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बोबडे ने टिप्पणी कि राज्य सरकार को तुरन्त इसपर फैसला लेना चाहिए और प्लांट को नियंत्रण में लेकर ऑक्सीजन का उत्पादन शुरू कर देना चाहिए। बोबडे का यह आखिरी कार्यदिवस था।

वेदांता लिमिटेड की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अधिवक्ता हरीश साल्वे ने दलील दी कि इजाज़त मिलते ही वो तुरन्त फ़्री में ऑक्सीजन का उत्पादन शुरू कर देंगे।

तमिलनाडु सरकार की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता वी एस वैद्यनाथन ने कहा कि स्थानीय जनता इस प्लांट को खोलने के खिला़फ है पहले ही गोलीकांड में 13 लोगों की जान जा चुकी है। केंद्र सरकार चाहे तो इस प्लांट का अधिग्रहण कर इसको फ़िर से चालू सकती है।

प्रभावित परिवारों की तरफ़ से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि लोग इस प्लांट के खिलाफ हैं और कम्पनी की पुरानी गतिविधियों को देखते हुए वेदांता पर भरोसा नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु सरकार पहले भी मद्रास हाई कोर्ट में कह चुकी है कि उनके पास ऑक्सीजन की कमी नहीं है।

इससे पहले अगस्त 2020 में मद्रास हाई कोर्ट और दिसम्बर और जनवरी में जस्टिस आरएफ नरीमन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने वेदांता समूह की प्लांट दुबारा खोलने की अपील को ख़ारिज कर दिया था।
वेदांता समूह की यह कम्पनी 2001 में हर्षद मेहता और 17 अन्य दलालों के साथ मिलकर शेयर के मूल्यों में हेर फेर के लिए सेबी द्वारा दोषी पाई गई थी।

तूतीकोरन स्थिति स्टरलाइट कॉपर स्मेल्टिंग प्लांट में गैस का रिसाव और भूमिगत जल को दूषित करने की वजह से आसपास के इलाके में लोगों को स्वास्थ्य समस्या होने लगी थी। मई 2018 में कॉपर प्लांट को बन्द करने की मांग को लेकर करीब 20 हज़ार लोगों ने विशाल रैली निकाली जिसपर तमिलनाडु पुलिस के स्नाइपर द्वारा गोली चलाने से 14 लोग मारे गए थे।

वेदांता समूह की इस खनन कंपनी द्वारा ओडिशा में डोंगरिया कोंध आदिवासी समूह के प्रवास स्थल नियमगिरि पहाड़ से एल्युमिनियम उत्पादन के लिए खनिज बॉक्साइट के खनन के खिलाफ लंबा संघर्ष चल रहा है। बॉक्साइट खनन से आसपास के जीव समूह और पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव के खिला़फ 12 गांवो के 8000 आदिवासी 2003 से लगातार जन आंदोलन कर रहे हैं।

यहां सवाल वेदांता, जस्टिस बोबडे और मोदी सरकार की नीयत पर है। अगले बोबडे को वर्तमान कोरोना संकट में जनता की इतनी चिंता होती तो पिछले एक महीने से हालात को बिगड़ते देखकर चुपचाप क्यों थे और जब मद्रास हाईकोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट तथा बांबे हाईकोर्ट पिछले एक सप्ताह से इस मामले को लेकर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार की नाकामी की आलोचना कर रहे थे तो अचानक से बोबडे ने मामले का स्वत संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट को इस मामले आगे सुनवाई करने से रोकने और मोदी सरकार को बचाने के लिए हरीश साल्वे को कोर्ट की मदद के लिए नियुक्त कर दिया और मामले को एक सप्ताह बाद सुनवाई के लिए टाल दिया।

सुप्रीम कोर्ट क्यों यह देखने में विफल रही कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बंगाल में लाखों की भीड़ के साथ चुनावी रैली कर रहे हैं और लोग अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन के बिना दम तोड़ रहे हैं। मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट को हरएक शहर में सैकड़ों की तादाद में रोज़ जलती चिताएं और व्यवस्था की नाकामी क्यों नहीं दिखी?

दरअसल आम जनता को यह अच्छी तरह समझ जाना चाहिए कि मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बोबडे को पूंजीपतियों और सरकारी दलालों के हित के सिवा कुछ और देखना और सुनना नहीं चाहते हैं।

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