घर लौटते प्रवासी मज़दूरों से भरी बस उलटी: 3 की मौत, 7 से अधिक घायल

21 अप्रैल, ग्वालियर: मंगलवार 20 अप्रैल को मध्य प्रदेश की जौरासी घाटी में सुबह 8.30 बजे दिल्ली के सराय काले खान से मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर खेत्रों को आ रही बस के उलटने से 3 लोगों की मौत हो गयी और 7 से अधिक लोग घायल हुए। बस में क्षमता से अधिक भरी हुई थी। जहाँ स्थानीय पुलिस का कहना है कि बस में 100 लोग थे वहीँ बस के एक यात्री ने मीडिया को बताया कि बस में 350 लोग सवार थे। प्रति यात्री 700 का किराया दे कर बस में ठुंसे हुए जा रहे यह यात्री, दिल्ली में दो हफ्ते का लॉकडाउन लगाए जाने के बाद अपने गाँव लौटने के लिए निकले प्रवासी मज़दूर परिवार थे। मृतकों की पहचान मुकेश डिमर (26), मातादीन अहिरवार (37) और जीतेन्द्र अहिरवार (22) के रूप में की गयी है। मुकेश डिमर की पत्नी अभिलाषा की रपट पर ड्राईवर के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज किया गया है। यात्रियों का कहना है कि ड्राईवर नशे में गाड़ी चला रहा था, जो गाड़ी के ज़्यादा लदे होने के साथ यात्रियों के लिए जान का जोखिम बन गया।

कोरोना महामारी से निपटने में फिर एक बार प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों का हनन

किन्तु यह हादसा मात्र ड्राईवर की गैर ज़िम्मेदारी पर नहीं थोपी जा सकती बल्कि कोरोना महामारी में प्रवासी मज़दूरों के जीवन के साथ होने वाले खिलवाड़ का एक और उदाहरण है । ऐसी कई घटनाएं कोरोना महामारी की पहली लहर के समय सामने आ चुकी हैं।  महामारी की इस दूसरी बड़ी लहर से आतंकित हो कर प्रवासी मज़दूर अब फिर एक बार शहरों से गाँव लौट रहे हैं। उचित सरकारी व्यवस्था की अनुपस्थिति में यह वापसी फिर एक बार अवय्वस्थित तरीके से होती नज़र आ रही है। महामारी से साथ साथ, यह हडकंप और अव्यवस्था खुद विभिन्न दुर्घटनाओं का कारण बन रही है। वहीं सरकार मज़दूरों के शहरों में रहने, उनके इलाज़ या इच्छुक मज़दूरों के वापस लौटने का उचित इंतज़ाम करने के बजाए पुलिसिया दमन के ज़रिये उन्हें रोकने या मीडिया में खबर गयाब कर के इस दुबारा उभरते संकट को लोगों के नज़रों से दूर रखने की कोशिश कर रही है। जहाँ इसकी ज़िम्मेदारी महामारी के मत्थे मढ़ी जा रही है, वास्तव में यह सरकार की ज़िम्मेदारी है की महामारी से निपटने की प्रक्रिया में वे मज़दूरों के हितों की सुरक्षा कैसे करें। पिछले साल कोरोना की पहली लहर में लगाए गए राष्ट्रिय लॉक डाउन में 1 करोड़ से अधिक प्रवासी मज़दूर शहरों से अपने गाँव लौटने को मजबूर हुए थे, जिनकी एक बड़ी आबादी पैदल घर गयी थी। इस वापसी में हज़ारों प्रवासी मज़दूरों और बच्चों की रोड दुर्घटनाओं में और थकान के कार मौत हुई थी।

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