कविताएँ इस सप्ताह : यही तो लोकतंत्र है !

यही तो लोकतंत्र है! / दिगम्बर

बच्चे जब चित्रकारी करते हैं
तो आम का चित्र बनाने पर
अमरुद बन जाता है,
गाय बनाते हैं तो कुत्ता बन जाता है।

इसीलिये बच्चों को
अपने चित्र के नीचे लिखना पड़ता है–
यह आम है।
यह गाय है।

हमारे देश में बड़े-बड़ों को
यही करना पड़ रहा है।

चित्र-विचित्र इस समय-सत्य का
केरीकेचर करते हैं
और कहते हैं–
यह लोकतंत्र है।
यही तो लोकतंत्र है!


उन्हें बुद्ध चाहिए / राजेश मल्ल

उन्हें बुद्ध चाहिए,
करुणा,दया,अहिंसा के बिना।
उन्हें चाहिए भगत सिंह,
इन्कलाबी विचारों के बिना।
उन्हें करनी है पूजा सुभाष की
तरुण के स्वप्न के बिना।

आज़ादी ,समानता,धर्मनिरपेक्षता के बिना चाहिए संविधान।
दलित मुक्ति के विचारों के बिना अम्बेडकर।

उन्हें चाहिए कुछ मूर्तियां,
जहाँ वे चढ़ा कर फूल ,
कर सके हत्या विचारों और उसे जीवन कर्म मानने वालों की।


जीने के बारे में / नाज़िम हिक़मत

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : विनोद दास)

ज़िंदगी जीना कोई हँसी-ठिठोली नहीं
तुम्हें बेहद संजीदगी के साथ जीना चाहिए
मसलन जैसे जीती है गिलहरी
मेरा मतलब है जि़ंदगी से कुछ परे और ऊपर
मतलब कि जि़ंदगी जीना एक भरा-पूरा काम होना चाहिए
जि़ंदगी जीना कोई हँसी-ठिठोली नहीं
तुम्हें बेहद संजीदगी से इसे लेना चाहिए
इतनी गंभीरता के साथ
और इस हद तक
कि चाहे तुम्हारे हाथ पीठ पर बँधे हों
और तुम्हारी पीठ दीवार से सटी हो
या चाहे सफ़ेद कोट और सुरक्षित चश्मों में
तुम कहीं किसी प्रयोगशाला में भी हो
तुम अपनी जान दे सको उन लोगों के लिए
जिनके चेहरे भी तुमने कभी नहीं देखे
अगरचे तुम जानते हो
कि जि़ंदगी सबसे बड़ी सचाई और ख़ूबसूरत शै है।
मेरा आशय यह है कि
जि़ंदगी को तुम्हें इतनी ही संजीदगी से लेना चाहिए
कि सत्तर साल की उम्र में तुम्हें जैतून का पौधा रोपना चाहिए
सिर्फ़ अपनी औलादों के लिए नहीं
बल्कि इसलिए भी कि मौत से डरने के बावजूद
तुम उस पर यक़ीन नहीं करते
और जि़ंदगी मेरे ख़्याल से मौत पर भारी है।


सबका एक घराना हो / इब्ने इंशा

जोग बियोग की बातें झूठी सब जी का बहलाना हो.
फिर भी हम से जाते जाते एक ग़ज़ल सुन जाना हो.

नगरी नगरी लाखों द्वारे हर द्वारे पर लाख सखी,
लेकिन जब हम भूल चुके हैं दामन का फैलाना हो.

हम भी झूठे तुम भी झूठे एक इसी का सच्चा नाम,
जिससे दीपक जलना सीखा परवाना मर जाना हो.

सीधे मन को आन दबोचे मीठी बातें सुन्दर लोग,
‘मीर’, ‘नज़ीर’, ‘कबीर’, और ‘इन्शा’ सब का एक घराना हो.


बेचैनी की जमीन / नियी ओसुन्दरे

(दिगंबर की वाल से)

उस जमीन पर कभी अमन-चैन नहीं होता
जहाँ कुछ के पास ज्यादा हो
और कुछ के पास बिलकुल नहीं

इस दुनिया का शकरकन्द
काफी है तमाम मुँह के लिए
जो हर रोज पूजते हैं
अपने ग्रासनली भगवान को

उन बुजुर्गों के लिए काफी
जो इन्तजार करते हैं साँझ होने का
और उन बच्चों के लिए भी
जो माँ की पीठ से झाँकते हैं
आनेवाले कल की ओर

लेकिन अफसोस,
इन्सान गढ़ता है गैरबराबर चाकू
कुछ लोग काटते हैं शकरकन्द
एसिमुदा(*) की तलवार से भी ज्यादा
लालची गंड़ासे से
और बहुतों के लिए
छोड़ देते हैं सिर्फ छिलके

बड़े चाकूवाले
बेहिसाब भकोसकर फुला देते हैं पेट
छोटी चाकूवाले मरते हैं भूखों
गाँव की गलियों में

और जब हम पूछते हैं कि क्यों
तो वे कहते हैं पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं

हम फिर पूछते हैं
क्यों कुछ लोगों ने अंगूठा होना चुना
और बहुतेरे दूसरों ने कानी ऊँगली
जो जैसे-तैसे चिपकी रहती है
हथेली के एक किनारे?

(एसिमुदा(*) – नाइजीरिया के शहर आइकर के एक पौराणिक योद्धा की बेहद बड़ी और धारदार तलवार)



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