कविताएँ इस सप्ताह : अ-परिचय का तिलिस्म !

अपरिचित / दिनेश श्रीनेत

हम एक-एक शब्द जोड़कर बनाते हैं
छोटे-छोटे पुल
जिस पर चलकर हमें एक-दूसरे के करीब आना होता है
हमारे पास अविश्वास करने के लिए कुछ खास नहीं होता
और यकीन करने के लिए बहुत कुछ होता है
वो सब कुछ जो हम नहीं जानते हैं
हमारे यकीन को रास्ता देता है

असहज होते हैं
थोड़ा संकोच करते हैं
बात कहां से शुरू करें
हमेशा ही शुरुआत एक सी होती है
बेवजह मुस्कुरा पड़ना
ठिठक जाना या रास्ता देना
या एक-दूसरे को बस अकारण ही देखना

हम समझ जाते हैं कि कुछ बातों कुछ चीजों को देखने का
तरीका एक जैसा है हमारा
हम एक दूसरे का नाम जानते हैं
शहर, प्रोफेशन, पता

हम एक-दूसरे को जानने लगते हैं
शब्दों के पुल ढह जाते हैं

अ-परिचय का तिलिस्म तो कब का टूट जाता है


चौथी शक्ति हो याद रहे! / बोधिसत्व

जब तुमको भूख लगे
खोजने पर भी रोटी न मिले
तब याद करना की भारत चौथी शक्ति है!
और वह भारत तुम हो!

जब पहनने को साड़ी न मिले
और धोती लंगोटी न मिले
तब याद करना की भारत चौथी शक्ति है!
और वह भारत तुम ही हो!

जब खोजने पर भी काम न मिले
तब मिसाइल का चिंतन करना
और सोचना की भारत चौथी शक्ति है!
और वह भारत तुमसे है!

जब मुस्कुराना मुश्किल हो जाए
और कई लोग मिल कर मारें लतियाएं
तब याद करना की भारत चौथी शक्ति है!
और उसकी शक्ति तुम हो!

चौथी शक्ति तुमको बलात्कार सहने की शक्ति दे
चौथी शक्ति तुमको दंगा सहने की शक्ति दे
चौथी शक्ति तुमको हर दुराचार सहने की शक्ति दे
चौथी शक्ति तुमको नंगा रहने की शक्ति दे
चौथी शक्ति तुमको अत्याचार सहने की शक्ति दे!

तुम सब यातना तकलीफ भूल जाओगे
एक निर्दोष आनंद पाओगे
जन्म सुफल बनाओगे
परम पद पाओगे
बस इतना याद रखो कि अब
चौथी शक्ति हो तुम!


मैं, मैं और मैं / स्वप्निल श्रीवास्तव

मैं 1857 के संग्राम में
शामिल था
आजादी की लड़ाई में
गया था जेल
सही थी यातनाएं

मैं महात्मा गांधी की हत्या का
नही था जिम्मेदार
वे हिंसा से नही अहिंसा
से मारे गये थे

मैं बांगला देश की मुक्तिवाहिनी
में सबसे आगे था और जय बांगला देश
के नारे लगाता था

मैं गोयबल्स था और जनहित में
झूठ बोलता था
आगे चलकर मैं हिटलर बना
जो वतन से प्रेम नही करते थे
उन्हें तड़ीपार कर दिया था

जो बाजिदद थे उन्हें यातना शिविर में
डाल दिया गया था

मैं जहाँ जहाँ था ,वहाँ वहाँ तुम
नही थे
मैं मुल्क के कण कण में
व्याप्त था

इतिहास ने मेरे साथ बहुत किया
है अन्याय
मुझे बर्बर और आततायी कहकर
किया है लांक्षित

कभी मेरी राष्ट्रभक्ति की मिसाल
नही दी गयी।


कभी तो / बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
किसी की आँख में रह कर सँवर गए होते

सिंगार-दान में रहते हो आइने की तरह
किसी के हाथ से गिर कर बिखर गए होते

ग़ज़ल ने बहते हुए फूल चुन लिए वर्ना
ग़मों में डूब कर हम लोग मर गए होते

अजीब रात थी कल तुम भी आ के लौट गए
जब आ गए थे तो पल भर ठहर गए होते

बहुत दिनों से है दिल अपना ख़ाली ख़ाली सा
ख़ुशी नहीं तो उदासी से भर गए होते



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