यह समय : कविताएँ इस सप्ताह !

यह समय / श्रुति कुशवाहा

वो जाता तो लौटकर बिल्कुल न आता
जो लौटता तो हमेशा अलहदा होता
समय को जाने की बुरी आदत है

दुनिया के तानाशाहों
समय तो तुम्हारा भी जाएगा
फिर जो लौटकर आएगा
वो बिल्कुल नहीं होगा तुम्हारा
इसलिये समय रहते संभल जाओ

संभल जाओ कि जो उँगली उट्ठी है तुम्हारी
उसके गिरने तक बदल जाएगा समय
तुम एक समय में एक ही तलवार
दो बार नहीं चला सकते
अगली बार बदल सकती है तलवार और गर्दन

समय बदलेगा तो बदलेंगे तख़्त
समय बदलेगा तो होगा सख़्त
समय काठ की पुतली नहीं
वो किसी इशारे नहीं नाचता
समय को नहीं दी जा सकती रिश्वत
समय कष्ट भले हो, भ्रष्ट नहीं है
समय मुट्ठी में नहीं समाता
न ही जेब में
ओ दुनिया के तानाशाहों
समय रहते संभल जाओ

समय ने अपना वारिस चुन रखा होता है।


चिड़िया / प्रबोध सिन्हा

ए चिड़िया तुम
ये
जहाँ
मत छोड़ना
क्योंकि तुमसे ही
लगता है
कि
जीवन
अभी शेष है।
कम से कम
इस मुर्दे भरे समाज मे
तुम्हारी
चहचहाहट
जीवन के बसंत की
उमंग
भरती रहती है
इसलिये
तुम
इस रिक्तियां को
पृथ्वी के
अंत तक
भरती रहना।


अगला नम्बर आपका है / नवाज़ देवबंदी

जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है
आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है

उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है


बार बार हाथ धोने की हिदायत / वासुकि प्रसाद “उन्मत्त”

बार बार हाथ धोओ
कीटाणु कहीं से भी आ सकते हैं
कीटाणु को तो फिजा मे नहीं रोका जा सकता है
ख़ुद को महफ़ूज़ रखो
बार बार हाथ धोओ

हाथ धोने की आदत डालो
नौकरी से हाथ धोने की
पेंशन से हाथ धोने की
वेतन से हाथ धोने की
जान से हाथ धोने की

मुंबई के फुटपाथ पर सोने वालों
रेलवे स्टेशनों पर स्थाई तौर बसेरा बना चुके तब के लोगों
किन घरों मे चले गए तुम?

आदत डालो घोषणा मे सबकुछ मिलने की
ख़ामोशी के ,दमन के अंधेरे मे
शांति चैन से हाथ धोने की आदत डालो
आदत डालो घरों को क़ैदख़ाना महसूस करने की
उंगलियों की तरह एक साथ रहने केलिए अभिशप्त
एक एक मीटर दूर रहने की आदत डालो

देखो, तुम्हारे पास देखने केलिए बहुत कुछ है
शासक के थोबड़े देखो
देखो उसकी पसंद, उसकी सनक,
उसके ख़रीदे लोगों से घिरे रहो
अपने अपने क़ैदख़ानो मे देखो रामायण देखो महाभारत, शक्तिमान,
ख़ुद को देखने से हाथ धो लो,
हाथ धो लो अपनी मुक्ति के सिद्धांत से
उसे घोषित किया जा चुका है दानवी

तुम्हारे अगल बग़ल के लोग बजा रहे हैं थाली,
किस कीटाणु से ग्रसित हैं ये?
किस कीटाणु से ग्रसित हैं ये कि किसी सिरफिरे की एकाएक घोषणा पर ये जलाने लगते हैं दिये
जबकि कीटाणु ग्रसित ज़िंदा आदमी रोज़ लाशों मे छटपटाहट कर
हो रहा है तब्दील
हज़ारों हो रहे हैं संक्रमित

सावधान, यह एक ऐसा अंधा समय है
जहां विवेक की हत्या की जा रही है
सम्मोहित भीड़ हत्यारे के साथ है
उसके कहने भर पर हुजूम मार सकता है ख़ुद को
हमें और तुम्हें

रोटियां नहीं हैं, आश्वासन हैं घरों मे
राशन ढो कर लानेवालों पर बरस रही हैं पुलिस की लाठियां।


घनश्याम की दो कविताएं :

साहस

हम बीज हैं,
हमारा काम है अंखुआना,
और हद यह कि,
हम अंखुआ रहे हैं,
ताना शाह के बूट तले।


अपराध

अंतहीन सपने हैं,
दिग्भ्रमित हैं हम,
बाड़ा बंदियों के देश में,
सरहदों के पार
जाने के जिद्द में,
no man’s line में
कैद कर लिए गए।



भूली-बिसरी ख़बरे

%d bloggers like this: