विशेषज्ञों ने बताया, नई श्रम संहिताएं कैसे बनायेंगी मज़दूरों को बंधुआ

मज़दूर सहयोग केंद्र की कार्यशाला में मिली अहम जानकारी

रुद्रपुर (उत्तराखंड। मज़दूर सहयोग केंद्र द्वारा रविवार को आयोजित ऑनलाइन व ऑफलाइन कार्यशाला में श्रम क़ानूनों के विशेषज्ञ वक्ताओं ने नई श्रम संहिताओं (लेबर कोड) से कानूनी बदलावों को स्पष्ट किया और बताया कि कैसे ये कानूनी बदलाव पूरी मज़दूर आबादी के लिए बेहद खतरनाक हैं।

रुद्रपुर स्थित आस्था पब्लिक स्कूल में दो सत्रों में चली कार्यशाला के दौरान चारों संहिताओं पर वरिष्ठ अधिवक्ता कॉम. संजय सिंघवी मुंबई से, वरिष्ठ अधिवक्ता कॉम. अमरीश पटेल अहमदाबाद से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉम. राजेश त्यागी दिल्ली से तथा अधिवक्ता सुश्री अदिति सक्सेना मुंबई से मज़दूर साथियों से ऑनलाइन संवाद कायम किया।

अभी जो चार श्रम संहिताएँ – वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, व्यवसायिक संरक्षण और कार्यदशाओं पर संहिता 2020 तथा सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 हैं उनकी नियमावलियाँ भी तैयार हो चुकी हैं और मोदी सरकार अप्रैल से लागू करने को बेताब है।

श्रम कानूनों के चारों विशेषज्ञों ने कानूनों में नए बदलाव पर अलग-अलग चर्चा की तथा मज़दूर साथियों के सवालों और आशंकाओं का भी जवाब दिया। यह बात उभरकर निकली कि केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लंबे संघर्षों के दौरान हासिल 44 श्रम कानूनों को मटियामेट करके लाई गई 4 श्रम संहिताएँ दरअसल मज़दूरों को बंधुआ बनाने के दस्तावेज हैं।

पहला सत्र :

प्रथम सत्र में संहिताओं पर मुख्य बात कॉमरेड संजय सिंघवी व कॉमरेड अमरीश पटेल ने तथा सामाजिक सुरक्षा पर सुश्री अदिति सक्सेना ने रखी और मज़दूरों के सवालों का जवाब दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता कॉम संजय सिंघवी

कॉम संजय ने स्पष्ट किया कि वैश्विक पूँजी की खुली लूट के लिए 1991 में राव-मनमोहन सरकार के दौर में उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की जो शुरुआत हुई थी, उसे ही मोदी सरकार ने मुकाम पर पहुंचाया है। बताया कि ये संहिताएं बाजपेयी सरकार के दौरान 2002 में प्रस्तुत दूसरे श्रम आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही बने हैं।

उन्होंने मौजूद कानूनों से तुलना करते हुए बताया कि इसमें सबसे खतरनाक बात यह है कि यह स्थाई प्रकृति के रोजगार की गारंटी को समाप्त कर देता है। स्थाई रोजगार की जगह फिक्सड टर्म यानी नियत अवधि के रोजगार की नई श्रेणी जोड़ देने से स्थाई नौकरी सीधे प्रभावित हो रही है।

उन्होंने कहा कि वेतन श्रम संहिता में न्यूनतम वेतन तय करने के पूर्ववर्ती मानदंडों को ही समाप्त कर दिया गया है। असल में यह बड़ा धोखा है।

कहा कि ट्रेड यूनियन बनाना या हड़ताल पर जाना मुश्किल बनाया गया है। यूनियन के अधिकार और सीमित हुए हैं। यूनियनों की मान्यता मालिकों व सरकार पर निर्भर होगी। यहाँ तक कि यूनियन के सामूहिक माँगपत्र पर मालिक एक व्यक्ति से भी समझौता कर सकता है। हड़ताल लगभग असंभव होगा। ऐसे में जमीनी संघर्ष ही अब और महत्वपूर्ण हो जाएगा।

मज़दूर साथियों के सवालों का जवाब देते हुआ कहा कि जो भी कानून मिले हैं वे संघर्षों से मिले हैं। कानून नहीं रहेंगे तब भी संघर्ष जारी रहेगा। आज ट्रेड यूनियनें भी अलग-अलग कुनबे में बँटी हुई हैं और मज़दूर आबादी भी बिखरी हुई है। बिखरी हुई मज़दूर आबादी को एकजुट होना होगा।

आज जुझारू और निरन्तरता में चलाने और निर्णायक आंदोलन में तब्दील करने की जरूरत है।

सवालों के जवाब में बताया कि प्रावधान इसे हैं कि कुछ परिस्थितियों में मज़दूर 12 घंटे से भी ज्यादा कार्य कर सकता है और उसे 12 घंटे के कार्य के बाद ही ओवरटाइम का भुगतान होगा। धोखा यह कि सप्ताह में काम के घण्टे 48 होंगे लेकिन दैनिक कार्य के घण्टे 12 होंगे, जिसे साप्ताहिक चार दिन काम का बताया जा रहा है।

वरिष्ठ अधिवक्ता कॉम अमरीश पटेल

कॉम अमरीश ने कहा कि औद्योगिक सम्बंध संहिता के तहत अब मज़दूर व कर्मचारी की दो अलग- अलग परिभाषाएं देकर उन्हें बाँट दिया गया है।

कहा कि 300 से कम मज़़दूरों वाले उद्योगों को कामबंदी (लेऑफ), छँटनी या बंदी के लिए सरकार की अनुमति लेना जरूरी नहीं है। संबंधित सरकारें यह संख्या और बढ़ा सकती हैं। छँटनी का शिकार हुए कर्मचारी के री-स्किल डेलवपमेंट का झुनझुना दिया है।

उन्होंने कहा कि वेतन का पचास फीसदी मूल वेतन किया गया है। मज़दूरों के हाथ में आने वाला वेतन यानी टेक होम सैलरी कम हो जाएगी। भविष्य निधि के लिए केवल उन प्रतिष्ठानों को ही मान्य किया गया है, जहां 20 या अधिक कर्मचारी हों, जबकि लाखों सूक्ष्म और लघु उद्यमों को इसके दायरे से बाहर कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि 50 से कम मज़दूर रखने वाले किसी भी ठेकेदार को श्रम विभाग में अपना पंजीकरण कराने की कोई आवश्यकता नहीं है। ठेका श्रमिकों के मज़दूरी भुगतान में मुख्य नियोजक की पूर्व में तय जिम्मेदारी से मुक्त कर देती है और स्थायी कार्य में ठेका मज़दूरी के कार्य को प्रतिबंधित करने के प्रावधानों को ही खत्म कर लूट की खुली छूट देती है।

मज़दूर साथियों के सवालों का जवाब देते हुए कॉम अमरीश ने बताया कि पुरानी यूनियनों के पंजीयन को समाप्त करना अब नियोक्ता के लिए आसान होगा।

उन्होंने गुजरात के टेक्सटाइल उद्योगों की तबाही का उल्लेख करते हुए सवाल के जवाब में दो टूक शब्दों में कहा कि दरअसल जो नए प्रावधान हैं, उससे आने वाले समय में संगठित क्षेत्र ही नहीं बचेगा, क्यों कि सभी मज़दूर असंगठित क्षेत्र के दायरे में या जाएंगे। साथ ही मालिकों को अब कानूनों के उल्लंघन की और सहूलियत मिल जाएगी।

सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि इन संहिताओं में काम के घंटे 12 करने का प्रावधान जोड़ देने का मतलब कि 12 घंटे के काम को कानूनी मान्यता मिल गई है। वेतन निर्धारण पर संहिता सीधे तौर पर कुछ नहीं बोलती हैं और पुराने वेतन निर्धारण की पूरी प्रक्रिया को इसने खत्म कर दिया है।

अधिवक्ता सुश्री अदिति सक्सेना

सुश्री अदिति सक्सेना ने मुख्य बात सामाजिक सुरक्षा संहिता पर रखी। उन्होंने इस संहिता के दायरे में किसे रखा जाएगा, उसकी व्यवस्था क्या होगी और असली फायदा किसे होगा, इन तीन हिस्से में बाँट कर बातें रखीं।

उन्होंने कहा कि मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा में जो खामियाँ थीं उन्हें खत्म करने और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाने की जगह और जटिलता पैदा की गई है। संहिता दरअसल नौकरी की ही सुरक्षा को खत्म करता है। फिक्स्ड टर्म के तहत 11-11 महीने के लिए रखने का धंधा चलेगा और वह श्रमिक ग्रेज्युटी से भी वंचित रहेगा। कहा कि असंगठित क्षेत्र के लिए स्कीम या फंड बनाने की बात की गई है, लेकिन वे बेहद अस्पष्ट हैं।

उन्होंने बताया कि सामाजिक सुरक्षा के मानदंड बदल दिए गए हैं और फैक्ट्री में सेफ्टी के लिए 500 से अधिक संख्या वाले कारखाने में बाध्यता नहीं होगी। लेबर इंस्पेक्टर का काम अब फ़ैसिलेटर का होगा। यानि अब वह किसी मामले की जाँच करने की जगह मालिक को गलतियों पर महज उसे सुधारने की सलाह देगा।

ईएसआई, पीएफ जैसी सामाजिक सुरक्षा के मानदंडों को मज़दूरों के लिए संकुचित किया गया है। दोनों में योगदान राशि घटाई गई है। सामाजिक सुरक्षा के तहत लाभ के लिए आधार से जोड़ने की बाध्यता बनाई गई है। इससे लाभ पाने से कई मज़दूर वंचित होंगे, वहीं यह सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश का भी उल्लंघन है।

मज़दूरों के सवालों का जवाब देते हुए अदिति जी ने बताया कि प्लेटफार्म श्रमिक वह है जो इंटरनेट ऑनलाइन सेवा प्लेटफार्म पर काम करते हैं। गिग कर्मचारी वह है जो बाजार अर्थव्यवस्था में अंशकालिक स्वरोजगार या अस्थाई संविदा पर काम करते हैं। इसी तरह एग्रीगेटर मज़दूर भी हैं।

स्व-रोजगार नियोजित श्रमिकों, घर पर काम करने वाले श्रमिकों और अन्य कमजोर समूहों को सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान बेहद कमजोर किया गया है।

दूसरा सत्र :

वरिष्ठ अधिवक्ता कॉम राजेश त्यागी

दूसरे सत्र में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश त्यागी में बातें रखीं। उन्होंने कहा कि एक तरफ वैश्वीकरण के तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सिकंजा और कस रहा है, वहीं राष्ट्रीय राज्य अपने वर्चस्व के प्रयास में भी जुटे हैं। सारे कानूनों में तबदीली का मुख्य मक़सद पूँजी की खुली छूट को और बेलगाम करना और मनमर्जी रखने-निकालने की खुली छूट देना है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा मालिकों के हित में जिस तरीके से तीन खेती कानून लाए गए उसी तरीके से मज़दूरों को बँधुआ बनाने वाली चार श्रम संहिताएँ लाई गई हैं। सरकार तेजी से सरकारी संस्थानों और संपत्तियों को बेच रही है। मोदी सरकार का मुख्य एजेंडा देश की सारी बागडोर मुख्य रूप से देसी विदेशी कारपोरेट के हाथ में सौंप देना है। यह चार श्रम संहिताएँ उसी की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।

महत्वपूर्ण यह भी है की एक संहिता या नियमावली में एक बात लिखी है तो दूसरी संहिता या नियमावली में दूसरी बातें। इस तरीके से तमाम मामले इतने गोलमाल तरीके से लिखे गए हैं जिसको अमल में आने के बाद ही वास्तविक हकीकत सामने आएगी, जो भयावह है।

कहा कि मज़दूरों को ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार को संकुचित किया गया है। यूनियन की मान्यता की बाध्यता बनाई गई है और वार्ताकार कमेटी मालिकों की मनमर्जी से बनाने की छूट दी गई है। आंदोलन और हड़ताल करने के रास्ते को लगभग समाप्त कर दिया गया है।

उन्होंने यह भी बताया कि यह सिर्फ फैक्ट्री में काम करने वाले स्थाई श्रमिकों के लिए ही घातक नहीं है, बल्कि यह सरकारी निजी औद्योगिक संस्थानों के अलावा सीधे-सीधे पत्रकार, प्रेस में काम करने वाले कर्मचारी को भी प्रभावित करेगा।

मज़दूर साथियों की आशंकाओं का जवाब देते हुए कहा कि राज्य के कानून केन्द्रीय कानूनों के मातहत होंगे। बताया कि पूर्ववर्ती मामले जो लंबित हैं वे पुराने कानूनों से ही निपटेंगे। मालिकों पर अब किसी भी मामले में आपराधिक वाद की जगह केवल सिविल वाद चलेगा और कुछ रुपए के अर्थदंड अलग-अलग मामलों में लगाए जा सकेंगे।

संघर्ष ही रास्ता

चारों वक्ताओं ने इस बात को स्पष्ट किया कि मज़दूरों के क़ानूनी संघर्ष के पहले से ही सीमित रास्ते लगभग खत्म हो जाएंगे। इसलिए मज़दूर वर्ग की व्यापक वर्गीय एकता के साथ जमीनी संघर्ष को तेज करना होगा। धर्म की राजनीति मज़दूर वर्ग को बांटने का धंधा है, जिसमें संघ पोषित भाजपा सरकार माहिर है। इसे मज़दूर साथियों को समझना होगा।

कार्यशाला के दोनों सत्रों के अध्यक्ष मंडल में गोविंद सिंह बिष्ट, चंदन सिंह मेवाड़ी, कॉम राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, दर्शन लाल, धनबीर राणा, के एन झा, कुलविंदर गिल व मुकुल शामिल रहे।

कार्यशाला में श्रमिक संयुक्त मोर्चा उधम सिंह नगर, नेस्ले कर्मचारी संगठन, राकेट रिद्धि सिद्धि कर्मचारी संघ, एल.जी.बी. वर्कर्स यूनियन, भगवती श्रमिक संगठन, वोल्टास इम्प्लाइज यूनियन, महिंद्रा सी.आई.ई. श्रमिक संगठन, महिंद्रा कर्मकार यूनियन, बी.सी.एच. मज़दूर संगठन, डेल्टा इम्प्लाइज यूनियन, करोलिया लाइटिंग इम्प्लाइज यूनियन, एडविक कर्मचारी संगठन, सी.जी. फूड्स, बजाज मोटर्स कर्मकार यूनियन, शिरडी श्रमिक संगठन, पारले मज़दूर संघ पंतनगर, असाल कर्मकार यूनियन आदि ने भागीदारी की। साथ ही इलाके के तमाम मज़दूर उपस्थित रहे।

कार्यशाला का विषय प्रवर्तन धीरज जोशी ने, संचालन दीपक कुमार सनवाल ने और धन्यवाद ज्ञापन चंद्र मोहन लखेड़ा ने की। तकनीकी व्यवस्था व संचालन में मज़दूर साथियों महेंद्र राणा, सचिन, हरेन्द्र व मदन लाल की अहम भूमिका रही।

कार्यशाला ‘संघर्षरत मेहनतकश’ फ़ेसबुक पेज पर भी लाइव रहा।

%d bloggers like this: