कविताएं इस सप्ताह : सपना देखने का अधिकार !

चंद ताज़े मौजूँ शे’र…. / रवि सिन्हा

लोग किस रंग में नहाये हैं
हम तो दामन बचा के आये हैं

सुर्ख़ होगा तो ख़ून ही होगा
शाह सुल्तान ने बहाये हैं

आप ही तख़्त पे बिठाते हैं
आसमाँ सर पे क्यूँ उठाये हैं

भूख दौलत के साथ रहती है
वक़्त ने फ़लसफ़े सिखाये हैं

तुम समन्दर के पार आये थे
हम भी दर्रे से पार आये हैं

ज़लज़ले बेवजह नहीं आते
झगड़े तहज़ीब ने दबाये हैं

सच यही है कि झूठ कुछ भी नहीं
ख़ल्क़ ने फ़ैसले सुनाये हैं.


सपना देखने का अधिकार / एदुआर्दो गालेआनो

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1948 में और दुबारा 1976 में मानवाधिकारों की लम्बी सूची जारी की, लेकिन मानवता की भारी बहुसंख्या आज भी सिर्फ देखने, सुनने और चुप रहने के अधिकार का ही उपभोग कर पाती है। मान लीजिये कि हम सपना देखने के अधिकार का प्रयोग करने लगें, जिसकी आज तक किसी ने घोषणा नहीं की ? मान लीजिये कि हम थोडा बक-बक करने लगें? आइये, हम अपनी निगाहें इस मौजूदा घिनौनी दुनिया की जगह एक बेहतरीन दूसरी दुनिया की ओर टिकाएँ जो मुमकिन है –

हवा तमाम जहरीली चीजों से साफ हो,
सिवाय उन जहरों के जो पैदा हुए हों इंसानी डर और इंसानी जज्बात से;

सडकों पर, कारें रौंदी जाएँ कुत्तो के द्वारा;

लोग कारों से न हाँके जाएँ या संचालित न हों कंप्यूटर प्रोग्राम से
या खरीदे न जाएँ सुपर बाज़ार के द्वारा या उन पर निगाह न रखी जाय टेलीविजन से;

आगे से टीवी सेट परिवार का सबसे ख़ास सदस्य न रह जाएँ
और उनके साथ वैसा ही सलूक किया जाय, जैसा इस्तरी या वाशिंग मशीन के साथ;

लोग श्रम करने के लिए जीने के बजाय जीने के लिए श्रम करें;

कानून की नजर में माना जाय मूर्खता का अपराध
कि लोग धन बटोरने या जीतने के लिए जिन्दा रहें,
बजाय इसके कि सहजता से जीयें,
उन पंछियों की तरह जो अनजाने ही चहचहाते हैं
और उन बच्चों की तरह जो खेलते हैं बिना यह जाने कि वे खेल रहे हैं;

किसी देश में युद्ध के मोर्चे पर जाने से इन्कार करने वाले नौजवान जेल नहीं जायें बल्कि जेल जायें वे लोग जो युद्ध छेड़ना चाहते हैं;

अर्थशास्त्री उपभोग के स्तर से जीवन स्तर को या उपभोक्ता सामानों की मात्रा से जीवन की गुणवत्ता को न नापें;

रसोईये इस बात में यकीन न करें कि लोबस्टर को अच्छा लगता है जिन्दा उबाला जाना;

इतिहासकार इस बात में यकीन न करें कि देशों को अच्छा लगता है उन पर हमला किया जाना;

राजनेता इस बात में यकीन न करें कि सिर्फ वादों से भर जाता है गरीब लोगों का पेट;

गम्भीरता को सद्गुण नहीं समझा जाय और जो खुद पर हँसना नहीं जानता हो,
उसे गम्भीरता से न लिया जाय;

मौत और पैसे की जादुई शक्ति गायब हो जाय और कोई चूहा महज वसीयत या दौलत के दम पर अचानक गुणी जन न बन जाय;

अपने विवेक के मुताबिक जो ठीक लगे
वह काम करने के लिए किसी को मूर्ख न समझा जाय
और नाह ही अपने फायदे के हिसाब से काम करने वाले को बुद्विमान;

पूरी दुनिया में गरीबों के खिलाफ नहीं, बल्कि गरीबी के खिलाफ जंग छिड़े
और हथियार उद्योग के सामने
खुद को दिवालिया घोषित करने के सिवा कोई चारा न रह जाये;

भोजन खरीद-फरोख्त का सामान न हो
और संचार साधनों का व्यापार न हो
क्योंकि भोजन और संचार मानवाधिकार हैं;

कोई व्यक्ति भूख से न मरे और कोई व्यक्ति खाते-खाते भी न मरे;

बेघर बच्चों को कूड़े का ढेर न समझा जाय क्योंकि कोई भी बच्चा बेघर न रह जाय;

धनी बच्चों को सोने जैसा न माना जाय क्योंकि कोई भी बच्चा धनी न रहे;

शिक्षा उन लोगों का विशेषाधिकार न हो जिनकी हैसियत हो उसे खरीदने की;

पुलिस उन लोगों पर कहर न ढाये जिनकी जेब में उसे देने के लिए पैसा न हो;

न्याय और मुक्ति,
जिन्हें जन्म से ही आपस में जुड़े बच्चों की तरह काट कर अलग कर दिया गया,
आपस में फिर मिलें और एक साथ जुड़ जायें;

एक महिला, एक अश्वेत महिला ब्राजील में राष्ट्रपति चुनी जाय,
एक रेड इण्डियन महिला ग्वाटेमाला में और दूसरी पेरू में सत्ता संभाले;

अर्जेंनटीना की ‘प्लाजा द मेयो'(1) की सनकी औरतों को
मानसिक स्वास्थ्य की सब से अच्छी मिसाल समझा जाय
क्योंकि उन्होंने जान पर खतरा जानकर भी स्वीकार नहीं किया चुप बैठना;

चर्च और पवित्र माता, मूसा के शिलालेख की गलत लिखावट को दुरुस्त करें
और उनका छठा आदेश शरीर के उत्सव मनाने का आदेश दे;

एक और आदेश की घोषणा करे चर्च,
जिसे भूल गया था ईश्वर –
तुम प्रकृति से प्यार करो क्योंकि तुम उसी के अंग हो;

जंगलों से आच्छादित हों दुनिया के रेगिस्तान और धरती की आत्मा;

नाउम्मीद लोगों में उम्मीद की किरण फूटे
और खोये हुए लोगों का पता लगा लिया जाय
क्योंकि वे लोग अकेले-अकेले राह तलाशने के चलते निराश हुए
और रास्ते से भटक गये;

हम उन लोगों के हमवतन और हमसफर बनें
जिनमें न्याय और खूबसूरती की चाहत हो,
चाहे वे कहीं भी रहते हों,
क्योंकि आने वाले समय में कहावत हो जाएँ
देशों के बीच सरहदें और दिलों के बीच की दूरी;

शुद्धता केवल देवताओं का उबाऊ विशेषाधिकार भर रह जाये,
और हम अपनी गड़बड़ और गन्दी दुनिया में इस तरह गुजारें हर रात
जैसे वह आखिरी रात हो और हर दिन जैसे पहला दिन…

(1. प्लाजा द मेयो- अर्जेंनटीना में 1976 से 1983 के बीच सैनिक तानाशाही के अधीन सरकार का विरोध करने वाले क्रांतिकारी नौजवानो को गिरफ्तार करके यातना देने, हत्या करने और गायब कर देने की घटनाएं आम हो गयी थीं। उन नौजवानों की माताओं ने प्लाजा द मेयो नाम से संगठन बनाकर तानाशाही की इन क्रूरताओं का खुलकर विरोध किया था।)

अनुवाद– दिगम्बर


वे क्यों करते आत्महत्या? / हरीशचन्द्र पाण्डे

उन्हें धर्मगुरुओं ने बताया था प्रवचनों में
आत्महत्या करने वाला सीधे नर्क जाता है
तब भी उन्होंने आत्महत्या की

क्या नर्क से भी बदतर हो गई थी उनकी खेती ?

वे क्यों करते आत्महत्या
जीवन उनके लिए उसी तरह काम्य था
जिस तरह मुमुक्षुओं के लिए मोक्ष
लोकाचार उनमें सदानीरा नदियों की तरह
प्रवहमान थे
उन्हीं के हलों के फाल से संस्कृति की लकीरें
खिंची चली आई थीं
उनका आत्म तो कपास की तरह उजार था
वे क्यों करते आत्महत्या?


पानी का भी कोई धर्म होता है? / देवयानी भारद्वाज

तेरह साल के लड़के के पास
दुनिया-जहान की प्यास है

संसार को जानने की
जीवन को जीने की
चांद को छूने की
समंदर को पीने की
झरनों में नहाने की
नदियों में तैरने की

उसके पास हर वर्जित फल को
चखने की प्यास है
ईश्वर को ललकारने की प्यास है

ईश्वर यदि होता तो
मंदिर ही नहीं
आसिफ कहीं भी पानी पी सकता था
आसिफा कहीं भी लंबी तान कर सो सकती थी
जुनैद अपने घर ईद मनाने जाता
अखलाक के घर बिरयानी खाने
तुम बिन बुलाए चले जाते

तेरह साल के लड़के के पास
जिंदगी से अथाह प्यार की प्यास है

तुम जो कभी तेरह साल के लड़के रहे होंगे
तुम्हें किसी ने मंदिर में नहीं
घर में बाप ने पीटा होगा
स्कूल में मास्टर से मार खाए होंगे
गली में गुंडों से डर कर रहे होंगे
चौराहे पर पुलिस ने थप्पड़ लगाए होंगे
तुम्हारे भीतर तेरह साल का लड़का
प्यासा ही मर गया होगा

तुम खुद को बचा लो
मंदिर जाओ
प्याऊ बनाओ
आसिफ को
जुनैद को
अखलाक को
बुला कर लाओ
माफी मांगो
पानी पिलाओ
यह नफरतों का बोझ
तुम्हें जीने नहीं देगा

तुम तेरस साल के लड़के की प्यास का
कुछ नहीं बिगाड़ सकते
बस खुद को बचा सकते हो
खुद को बचा लो.


यहाँ दिल धड़कना गुनाह क्यूँ? / फ़िदा हुसैन

यहाँ साँस लेना अज़ाब क्यूँ ? यहाँ दिल धड़कना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब,तो लबों का खुलना गुनाह क्यूँ ?

तेरे इस जहाँ का जो हाल है, वो बयान करना मोहाल है
वो समझ के कुछ न समझ सके, ये अजीब सूरते-हाल है
न तो कोई उस का जवाब है, न कोई भी उसकी मिसाल है
जहाँ अद्ल मिलना मोहाल हो, वहां जुर्म करना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब——-

न तो रंग है न जमाल है, न गुलों में कोई निखार है
न उमंग है न तरंग है, तो ये कैसी फसले-बहार है ?
अगर इस निज़ामे-बहार पर, यूँ चढ़ा ख़िज़ाँ का ख़ुमार है
तो जड़ों से ऐसे निज़ाम को ही उखाड़ देना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब——

कहीं सर झुकाना क़ुबूल है, कहीं बंदगी पे सवाल है
कहीं बुत शिकन भी ख़लील है, कहीं बुतगरी का कमाल है
है निज़ाम ख़ुद ही अज़ाब पर, उसे लब पे लाना मोहाल है
मेरा आज उन से सवाल है, कि सवाल करना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब—–

है जो अह्द तेरा बहिश्त का, वो सवाब है कि सराब है
मेरा अज्र पर भी जो हक़ नहीं, तो सवाब कैसा सवाब है?
ये निज़ाम कैसा निज़ाम हूं? ये निज़ाम है कि अज़ाब है ?
जो ख़ुदाओं पर ये सवाल हों, तो गुनाह करना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब—

ये जो आँधियों का हुजूम है, नई सुब्ह की ये नसीम है
तुम अज़ाबे-जाँ न कहो इसे, ये तो एक कारे-अज़ीम है
रहे कौम किस तरह मुन्तशिर, जो निज़ामे-वक़्त की थीम है
तो निज़ामे-वक़्त को अस्र से ही निकाल देना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब—

यहाँ बंद मुँह की सुरंग में ये सुलग रही हैं जो भट्ठियाँ
जो बढ़ी घुटन तो अजब नहीं, कि फटे कोई आतिश-फिशां
है निज़ाम फ़िर भी बज़िद अगर कि जला के माने गा गुलसिताँ
तो फ़िर इस निज़ाम की लाश पर मेरा रक्स करना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब —

उन्हें ज़ुल्मतों का गुमान है, हमें रौशनी पे यक़ीन है
उन्हें नफ़रतों का सुरूर है, हमें उल्फ़तों पे यक़ीन है
वो तबाहियों के हैं मोतक़िद, हमें साख्ते-नौ पे यक़ीन है
वो क़दामतों पे हैं मुनहसिर, हमें इर्तेक़ा पे यक़ीन है
उन्हें मौत का ही गुमान है, उन्हें मौत पर ही यक़ीन है
मेरी ज़िन्दगी है यक़ीन से, मुझे ज़िन्दगी पे यक़ीन है
नई सुब्ह आनी है लाज़िमी, मुझे सहरे-नौ पे यक़ीन है
जो यक़ीन बाइसे अज्र हो, तो यक़ीन करना गुनाह क्यूँ ?
नहीं सोच पर कोई रोक जब तो लबों का खुलना गुनाह क्यूँ ?



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