अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस : मुक्तिकामी संघर्ष के संकल्प का दिन

जो भी अधिकार मिले हैं संघर्ष से मिले हैं, संघर्ष से ही मिलेंगे!

आज 8 मार्च अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस है| पूरी दुनिया में हक के संघर्ष के इस प्रतिक दिवस पर विविध कार्यक्रम हो रहे हैं| हमारे देश में काले कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ जारी किसान आन्दोलन के तहत आज किसान महिला दिवस के रूप में मनाया जा रहा है| हजारों महिलाएं दिल्ली की सरहदों पर जुटी हैं और पूरा संचालन भी कर रही हैं| इस अवसर पर श्रमजीवी महिला दिवस पर यह लेख प्रस्तुत है…

महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष को आगे बढ़ाएं!

अन्तराष्ट्रीय नारी दिवस का इतिहास सौ साल से भी पुराना है| विश्व भर में मनाया जाने वाला यह दिवस महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों और एक बेहतर समाज के लिए लड़े गए संघर्षों को श्रधांजलि देता है और साथ ही नयी उभरती पीढ़ी को इससे जुड़ने की प्रेरणा देता है| महत्वपूर्ण है की आज अन्तराष्ट्रीय नारी दिवस के रूप में प्रसिद्ध इस दिवस की शुरुआत मजदूर परिवारों की महिलाओं ने की थी और इसकी महत्ता स्थापित करने में भी उनकी केन्द्रीय भूमिका रही है|

अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस, चीन और नेपाल हर जगह महिला श्रमिकों ने बहादुरी और झुझारूपन की मिसाल कायम की और अपने पुरुष साथियों के साथ कंधे से कंधा मिला कर मालिकों और सरकारों के दमन शोषण के खिलाफ खड़ी हुईं| आज महिलाओं की बड़ी आबादी के लिए सामान्य हो गए मौलिक अधिकार जैसे पढ़ना, पुरुषों के समान वेतन पाना और वोट देना इत्यादि भी महिलाओं के अथक संघर्ष के परिणाम हैं| आज विश्व में सबसे विकसित कहलाने वाले अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में सैकड़ों महिलाएं इन अधिकारों को पाने के लिए जेल गईं और यहाँ तक की कई शहीद भी हो गईं|

महिलाओं ने न केवल अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किए हैं बल्कि अपने प्रियजनों तथा पूरे समाज के बेहतर भविष्य को बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है| हम मे से कितने जानते हैं कि रूसी क्रांति का पहला वार अन्तराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस के दिन रोटी के बढ़ते दाम के खिलाफ जुलूस प्रदर्शन करने वाली महिलाओं ने किया था, जिसके बाद ही अन्य मजदूर भी आन्दोलन में शामिल हुए और इतिहास में पहला मजदूर राज कायम किया?

आज के समाज में महिलाएं विभिन्न प्रकार के शोषणों का दंश झेल रही हैं| मजदूर वर्ग पर बढ़ते दमन और शोषण के संदर्भ में आज मजदूर परिवारों की महिलाओं पर दुगना बोझ है जहाँ वह महिला होने के नाते भी उत्पीडित है और मजदूर होने के नाते भी| जहाँ गरीबी और भुखमरी का निवास होता है वहाँ सबसे पहले महिलाओं के मुंह से निवाला और हाँथ से किताब छूट जाते हैं| मजबूरी के समय माँ खुद कुपोषित रह कर बच्चों को खाना खिलाती है|

अंततः देश में बढ़ती गरीबी की सबसे कठोर मार महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा पर ही पड़ती है| बढ़ती बेरोज़गारी के कारण अनेकों महिलाओं को बहुत कम पैसों के लिए बुरे से बुरे परिवेश में नौकरी करनी पड़ रही है|

जब वह मेहनत कर के अपना और अपने परिवार का पेट पोसने की कोशिश भी करती हैं तो उन्हें एक पुरुष प्रधान समाज में असमान वेतन, यौन उत्पीडन और दुर्व्यवहार जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है| समाज में हमेशा खुद को असुरक्षित और कमज़ोर महसूस करती महिलाओं के लिए अपनी पूरी क्षमता तक विकसित हो पाना असंभव मालूम पड़ता है| यह पूरे समाज के प्रगतिशील विकास को भी सीमित करता है|

इन अनेकों कठिनाईयों में जीती महिलाओं के एक बड़े हिस्से को आज अपनी ही पूरी क्षमता और ताकत का एहसास नहीं है| इसलिए वह अक्सर घर से बहार निकल अपनके अधिकारों के इए आन्दोलनों में जुड़ने से हिचकिचाती हैं| समाज में बढ़ने के लिए ज्यादा अवसर पाने वाली महिलाओं के बीच भी एक शक्तिशाली व्यक्तिवाद हावी है जहाँ वे अक्सर पूरी महिला आबादी या पूरे समाज के हित में न सोच कर अपने हितों के दायरे में ही बंधी रह जाती हैं|

पिछले महीनों दिल्ली और देश भर में बलात्कार और यौन उत्पीडन के खिलाफ हुए आन्दोलन ने महिलाओं के अधिकार का मुद्दा प्रभावशाली तरीके से समाज के सामने तो रखा, परन्तु उसमें भी महिलाओं का एक छोटा हिस्सा ही भाग ले सका है| ऐसे में आज देश में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक सुसंगठित और सशक्त अभियान चलाना महत्वपूर्ण बन गया है| ऐसे अभियान को रूप देने में हर महिला का योगदान ज़रूरी होगा, परन्तु साथ ही इसे सम्पूर्ण समाज के प्रगतिशील परिवर्तन की मुहीम के साथ जोड़ने में मजदूर वर्ग की महिलाओं को एक प्रमुख भूमिका निभानी होगी|

आज जब देश में जनता विभिन्न मुद्दों से जूझ रही है और और संघर्ष के नए मिसाल कायम कर रही है तब मेहनतकश महिलाओं के लिए भी अपने संघर्ष को आगे बढ़ाने की नई ज़मीन तैयार हो रही है| सही मायने में एक शोषण मुक्त और सुन्दर समाज बनाने के लिए महिलाओं और पुरुष को कंधे से कन्धा मिला कर लड़ना होगा| परन्तु ऐसी शक्तिशाली एकता का रास्ता महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष से गुज़रे बिना नहीं निकल सकता| आइए हम इस संघर्ष को साथ आगे बढ़ाने की सौगंध खाएं और अन्तराष्ट्रीय श्रमजीवी महिला दिवस के संघर्षशील विरासत को कायम रखें!!   

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