संत रविदास मानवतावादी मूल्य के प्रणेता व सामाजिक एकता के प्रतीक थे

दलित समाज के अग्रणी विचारक संत रविदास की जयंती पर

रविदास एक महान संत, दार्शनिक, कवि, समाज-सुधारक और निर्गुण संप्रदाय के एक विभूति थे। उन्होंने सभी तरह की धार्मिक संकीर्णताओं, रूढि़यों, भेदभाव का विरोध किया और कहा कि ऐसी प्रवृत्तियाँ समाज को कमजोर और अपवित्र बनाती हैं। उन्होंने मानवतावादी मूल्यों की स्थापना की और कहा कि कोई भी व्यक्ति जन्म से नहीं सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है।

संत रविदास (रैदास) का जन्म माघ पूर्णिमा को 1376 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के गोबर्धनपुर गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम कर्मा देवी (कलसा) तथा पिता का नाम संतोख दास (रग्घु) था। इस वर्ष 27 फरवरी 2021 को उनकी जयंती मनाई जाएगी।

चर्मकार कुल से होने के कारण जूते बनाने का अपना पैतृक व्यवसाय उन्होंने ह्रदय से अपनाया था। वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे।

संत रैदास ने मांसाहार, अनैतिकता, धनलिप्सा, दुराचार को भी असामाजिक घोषित किया। उन्होंने सभी तरह की धार्मिक संकीर्णताओं, रूढि़यों, भेदभाव का विरोध करते हुए कहा, इस तरह की प्रवृत्तियों से समाज कमजोर और अपवित्र बनता है।

संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जातिगत भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर बल दिया और मानवतावादी मूल्यों की नींव रखी। रविदासजी ने सीधे-सीधे लिखा कि-

रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नकर कूं नीच करि डारी है, ओछे करम की कीच।।

(यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है। जो व्यक्ति गलत काम करता है वो नीच होता है। कोई भी व्यक्ति जन्म के हिसाब से कभी नीच नहीं होता।)

“जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात,
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।”

करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस।
कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास।।

कुछ अन्य रचनाएं-

पूजा कहा चढ़ाऊं…

राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊं।
फल अरु फूल अनूप न पाऊं।
थन तर दूध जो बछरू जुठारी।
पुहुप भंवर जल मीन बिगारी।
मलयागिर बेधियो भुअंगा ।
विष अमृत दोउ एक संगा।
मन ही पूजा मन ही धूप।
मन ही सेऊं सहज सरूप।
पूजा अरचा न जानूं तेरी।
कह रैदास कवन गति मोरी।

मन चंगा तो कठौती में गंगा

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।
हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।
मन चंगा तो कठौती में गंगा।
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

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