सांप्रदायिक एकता और मेहनतकशों की मुक्ति के प्रतीक पुरुष थे आज़ाद

चंद्र शेखर आज़ाद की शहादत दिवस (27 फरवरी) की याद में

महान क्रान्तिकारी और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के कमाण्डर इन चीफ चन्द्रशेखर आज़ाद का जीवन अन्याय, ज़ुल्म और शोषण पर टिकी व्यवस्था के खिलाफ़ परिवर्तन की आवाज है। धर्म-जाति के बंटवारे की सियासी राजनीति के इस विकट दौर में आजाद जैसे क्रांतिकारी प्रेरणा के स्रोत हैं।

आज़ाद का जन्म एक ग़रीब परिवार में हुआ था और उन्हें प्राथमिक शिक्षा पूरी करने का मौक़ा भी नहीं मिल सका था। वे महज़ सेनापति ही नहीं, बल्कि एच.एस.आर.ए. के नेतृत्वकारी मण्डल के एक प्रमुख भागीदार थे।

आज़ाद एच.आर.ए. और एच.एस.आर.ए. के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थे और काकोरी काण्ड के बाद क्रान्तिकारी संगठन के बिखरे सूत्रों को जोड़कर उसका पुनर्गठन उन्हीं के नेतृत्व में हुआ था। उन्होंने अत्यन्त कुशलता, त्याग और साहस के साथ युवा क्रान्तिकारियों की उस टीम को संगठित, प्रेरित और सक्रिय किया जिसने अपने शौर्य, वैचारिक प्रखरता और असीम बलिदान से पूरे देश में बिजली की लहर पैदा कर दी थी।

आज की युवा पीढ़ी को आज़ाद जैसे क्रान्तिकारियों के जीवन और बलिदान से प्रेरणा लेकर उनके अधूरे सपनों को पूरा करने की राह पर आगे चलना है।

आज़ाद को जानने के लिए यहाँ हम उनके साथी क्रान्तिकारी शिव वर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक ‘संस्मृतियाँ’ का एक अंश प्रकाशित कर रहे हैं। -संपादक

सरल व दृढ़ व्यक्तित्व के महान क्रांतिकारी

आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, सन 1906 तदनुसार सावन सुदी दूज दिन सोमवार को मध्य प्रदेश में अलीराजपुर रियासत के भावरा ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. सीताराम तिवारी और माता का नाम श्रीमती जगरानी देवी था। भावरा ग्राम पहले अलीराजपुर रियासत में था। देश की आज़ादी और रियासतों के विलयन के बाद वह मध्य भारत का अंश बना। पिफर मध्य भारत और मध्य प्रदेश के विलयन के बाद वह मध्य प्रदेश में आ गया। इस समय वह झाबुआ जिले में है।

आज़ाद के पितामह उत्तर प्रदेश में जिला कानपुर में रहने वाले थे। पिता पं. सीताराम तिवारी का बचपन तथा युवावस्था के कुछ वर्ष उन्नाव जिले के बदरका गाँव में बीते। पं. सीताराम के पाँच पुत्रा थे। प्रथम पुत्र सुखदेव का जन्म बदरका में हुआ था। बाक़ी चार का जन्म भावरा में हुआ। आज़ाद सबमें छोटे थे।

बचपन से ही पढ़ने-लिखने के बजाय तीर-कमान या बन्दूक़ चलाने में आज़ाद की रुचि अधिक थी। वे प्रायः स्कूल का बहाना लेकर घर से निकल जाते और रास्ते में अपने दोस्तों के साथ थानेदार-डाकू का खेल खेलते रहते या पिफर तीन-कमान चलाने का अभ्यास करते और जानवरों का शिकार करते। आज़ाद की इन सब बातों से परेशान होकर उनके माता-पिता ने उन्हें काम से नौकरी में लगा देने की सोची। तहसील में नौकरी मिल भी गयी।

लेकिन आज़ाद भला उस सबमें कब बँधने वाले थे। अवसर मिलते ही एक मोती बेचने वाले के साथ वे बम्बई चले गये। वहाँ उन्हें कुछ मज़दूरों की सहायता से जहाज़ों को रंगने वाले रंगसाजों की मदद से काम मिल गया और उन्हीं की सहायता से उनके साथ के लोगों की कोठरी में लेटने-भर की जगह भी मिल गयी। अपने बम्बई जीवन की चर्चा करते हुए उन्होंने वैशम्पायन से बतलाया कि शाम को वे मज़दूर उन्हें अपने साथ अपनी कोठरी पर ले गये। खाने को पूछा तो कह दिया खा चुका हूँ। दूसरा दिन मूँगपफली-भेल आदि खाकर और पानी पीकर पार कर दिया। एक सप्ताह तक यही क्रम चलाने के बाद उन्होंने होटल की शरण ली।

बम्बई में आज़ाद के लिए सबसे कठिन समस्या थी रात बिताने की। मज़दूरों की उस छोटी कोठरी में जितने लोग एक साथ सोते थे उनकी श्वासों से वहाँ की हवा दूषित हो जाती थी, उस पर कोई-कोई लोग खँखार कर किसी कोने में थूक भी देते थे। सारी कोठरी में बीड़ी का धुआँ भरा रहता था। उसमें कोई खिड़की भी नहीं थी इसलिए बाहर की स्वच्छ हवा आदि का भी कोई रास्ता नहीं था। आज़ाद ऐसे घुटन भरे वातावरण में सोने के आदी नहीं थे। इसलिए काम से छूटने पर खा-पीकर वे सिनेमा में जा बैठते और कोठरी तभी जाते जब नींद रोकना असम्भव हो जाता।

आज़ाद के बम्बई के जीवन के बारे में वैशम्पायन ने लिखा है, ”्बम्बई में आज़ाद सप्ताह में एक बार स्नान करते थे। क्योंकि सवेरे पाँच बजे उठकर नहाने की सुविधा नहीं थी, पास में कपड़े भी इतने नहीं थे कि नित्य उन्हें धोकर सुखाते और बदलते, इसलिए वे रविवार को ही नहाते थे। उस दिन छुट्टी होती थी इसलिए देर तक सोते रहते। बाद में प्रातविधि से निवृत्त हो नाश्ता करते और उसके बाद घूमते हुए चोर बाज़ार जाते। वहाँ से एक हाफ़पैण्ट और कमीज़ ख़रीदकर साबुन-तेल लेते।

“फिर किसी जनपथ के नल पर बैठकर नहाते, पुराने कपड़े उतार फेंकते और उस दिन ख़रीदे कपड़े पहिन लेते। ये ख़रीदे कपड़े भी पुराने ही होते थे परन्तु धोबी के धुले होने के कारण सप्ताह भर चल जाते। फि‍र सिर में तेल डाल, पुराने कपड़े आदि आस-पास फेंक देते और किसी होटल में भोजन करने चल देते। इसके बाद सड़कों के चक्कर, चिड़ियाघर की सैर या किसी पार्क में पेड़ की छाँह में विश्राम। उसके बाद चौपाटी पर बैठकर समय बिताना और शाम होते ही िफर सिनेमा हॉल में घुस जाना।

”धीरे-धीरे उन्हें बम्बई के उस यन्त्रावत जीवन से घृणा हो गयी। वे यह अनुभव करने लगे कि यदि उन्हें पेट भरने के लिए नौकरी या मज़दूरी ही करनी थी तो वह अलीराजपुर में मिल ही गयी थी। उसके लिए घर छोड़कर इतने कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता थी। तब एक रविवार को जब वे नहा-धोकर होटल में भोजन करने गये तो भोजन करते-करते उन्होंने बम्बई छोड़ने का निश्चय कर लिया। परन्तु घर वापस जाना नहीं था इसीलिए संस्कृत पढ़ने बनारस जाने का विचार किया।…

”होटल से भोजन करने के पश्चात उन्होंने सीधे रेलवे स्टेशन की राह पकड़ी। सामान तो घर से कुछ लेना नहीं था, जो कुछ था वह पास ही था। एक सप्ताह की कमाई भी जेब में थी। स्टेशन पर जानकारी प्राप्त कर बनारस की गाड़ी में बिना टिकट जा बैठे। बम्बई से जाते समय वे एक चीज़ अवश्य ले गये। और वह था मज़दूरों के जीवन का उनका अपना ख़ुद का अनुभव। उनकी स्थिति से भी वे अच्छी तरह परिचित हो गये थे। क्रान्तिकारी जीवन में जब मज़दूरों की परिस्थिति के विषय में चर्चा चलती तो वे उस पर अधिकारपूर्वक बोलते थे। उसी प्रकार भावरा में वे आदिवासियों तथा किसानों के जीवन को भी निकट से देख चुके थे। इसीलिए किसान तथा मज़दूरों के राज की जब वे चर्चा करते तो उसमें उनकी सहानुभूति की झलक स्पष्ट दिखायी देती थी।”

आज़ाद के शहीद हो जाने के बाद भी उनकी मां को उनके लौट आने का विश्वास था

बनारस में उन्नाव निवासी श्री शिवविनायक मिश्र से उनकी मुलाक़ात हुई और मिश्रजी की सहायता से उन्हें एक संस्कृत पाठशाला में प्रवेश भी मिल गया। इसके कुछ दिन बाद ही 1921 का असहयोग आन्दोलन आरम्भ हो गया और उसी में संस्कृत काॅलेज बनारस पर धरना देते हुए वे गिरफ्ऱतार कर लिये गये। अदालत में जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बतलाया–”आज़ाद”। तभी से वे आज़ाद के नाम से पुकारे जाने लगे।

इस केस में आज़ाद को 15 बेंतों की सज़ा हुई थी। बेंत लगाने के बाद उन्हें जेल से बाहर कर दिया गया। ख़ून से लथपथ वे किसी तरह पैदल घिसटकर अपने स्थान पर पहुँचे। वहाँ सराय गोवर्धन में गौरीशंकर शास्त्री ने घाव ठीक होने तक उनकी ख़ूब सेवा की।

स्वस्थ हो जाने के बाद आज़ाद काशी विद्यापीठ में भर्ती हो गये। यह 1922 की बात है। यहीं पर उनका श्री मन्मथनाथ गुप्त तथा श्री प्रणवेश चटर्जी से परिचय हुआ। यह दोनों साथी पहले ही क्रान्तिकारी दल की सदस्यता प्राप्त कर चुके थे। प्रणवेश की निगाह आज़ाद पर पड़ी और उन्होंने धीरे-धीरे आज़ाद को भी दल का सदस्य बना लिया। और तब से जीवन के अन्त तक अडिग भाव से साबितक़दमी के साथ वे सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ते रहे।

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