विडियो: महलकलां – लोक संघर्ष की बेजोड़ दास्ताँ

दो बार उम्र कैद से बरी हुए किसान नेता मंजीत धनेर से बातचीत

17 वर्षीय किरनजीत को इंसाफ दिलाने की मुहीम

1997 में जब पंजाब के बरनाला जिले में एक स्कूल टीचर की 17 वर्षीय बेटी – किरनजीत – शाम को घर नहीं पहुंची तो परिवार वालों और पड़ोसियों में घबराहट मच गयी। तलाश करने पर सारे सुराग गाँव के दबंग राजनैतिक परिवार की ओर इशारा कर रहे थे। सभी राजनैतिक पार्टियों से संबंध रखने वाले दबंगों के खेत के पास किरनजीत की साइकिल कुछ झाड़ियों में छिपी मिली। वहीँ खेतों में उसके अंतरवस्त्र मिले लेकिन किरनजीत का कोई पता नहीं चला। पुलिस को रपट लिखाने जाने पर कोई कार्यवाई नहीं की गयी। तब परिवार वाले स्थानीय किसान यूनियनों के पास पहुंचे। राजनैतिक दबाव और धमकियों को चुनौती देने वाला परिवार वालों का यह कदम एक 23 वर्षीय लम्बे संघर्ष का पहला कदम बना।

अगले कुछ दिनों में हज़ारों गाँव वासी लगातार सड़कों पर उतर कर गुनाहगारों को गिरफ्तार कराने में सफल हुए। आरोपियों के बयान से आखिरकार लाश खेत में शराब के बोयाम में दबी बरामद हुई। आन्दोलन की अगवाई के लिए विभिन्न जन संगठनों के गठजोड़ से बनाई गयी “किरनजीत एक्शन कमेटी” के लगातार प्रयासों के बाद 2001 में आरोपियों को सज़ा हुई।

नेतृत्वकारी साथियों पर झूठे मुकद्दमे और उम्रकैद की सज़ा

आन्दोलन के दौरान मार्च 2001 में हुई एक झड़प में आरोपियों के पक्ष के एक व्यक्ति की मृतु के आधार पर कमेटी के नेताओं – नारायण दत्त, मंजीत सिंह धनेर और प्रेम कुमार पर हत्या के झूठे आरोप लगा दिए गए। मार्च 2005 में सेशन कोर्ट ने उन्हें उम्र कैद की सज़ा सूना दी। डेढ़ साल भटिंडा जेल में बिताने के बाद जनता के अथक संघर्ष से जुलाई 2007 में पंजाब राज्यपाल ने उनकी सज़ा माफ़ कर दी और उन्हें बेक़सूर घोषित किया।

अगले मार्च 2008 तक केस वापस उच्च न्यायलय में गया और न्यायलय ने राजपाल की माफ़ी ख़ारिज करदी। अपील की सुनवाई में नारायण दत्त और प्रेम कुमार को बरी कर दिया गया और मंजीत धनेर को फिर उम्र कैद की सज़ा दे दी गयी। सर्वोच्च न्यायलय में अपील करने पर भी मंजीत धनेर को इंसाफ नहीं मिला। सितंबर 2019 को फिर सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा को ही मान्यता दी।

फैसला आने के बाद 30 हज़ार लोगों के बीच मंजीत धनेर बरनाला कोर्ट में आत्मसमर्पण करने पहुंचे। इसके बाद जब तक वे जेल में रहे तब तक लगातार जेल के बाहर सैकड़ों की तादात में लोग उनकी रिहाई की मांग ले कर धरने पर बैठे रहे। जन संघर्ष के ज़ोर तले पंजाब सरकार को झुकना पड़ा और जनता की शक्ति की बेजोड़ मिसाल कायम करते हुए 54 दिनों बाद 7 नवंबर, 2019 को मंजीत सिंह धनेर दोबारा राजपाल की माफ़ी पा कर जेल से रिहा हुए।

अब भी डटे हैं जंग के मैदान में

महिलाओं की सुरक्षा के दावे हर सरकार करती है किन्तु देश में महिलाओं की बड़ी आबादी और खास तौर से उसके सबसे दमित हिस्सों के साथ होने वाली यौन हिंसा के पीछे अकसर पुलिस – प्रशासन और – राजनैतिक दबंगों का गठजोड़ पाया जाता है। इस गठजोड़ के आगे पीडिता और उसका परिवार खुद को असहाय पाते हैं। किन्तु महल कलां की धरती पर संगठित संघर्ष के जीत देश दुनिया में हर महिला की सुरक्षा, हर मेहनतकश के सम्मान का झंडा गाडती है।

अपने नौजवानी से ही लोक संघर्ष को समर्पित का. मंजीत सिंह धनेर खुद एक सीमांत किसान परिवार से आते हैं और भारतीय किसान यूनियन (दकौंडा) के नेतृत्वकारी कार्यकर्त्ता हैं। नवंबर 2019 को लोक संघर्ष के आधार पर बरी होते ही वह सीधा मोर्चे पर गए और संघर्ष का झंडा हांथ में ले कर अपना जीवन लोक संघर्ष को समर्पित करने का पुनः संकल्प लिया। वे आज भी पिछले दो महीनों से दिल्ली के बोर्डेरों पर बैठे किसानों के बीच खड़ें हैं। इस मौके पर उनहोंने अपने संघर्ष के इतिहास और अनुभव को मेहनतकश की टीम से साझा किया।

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