कविताएं इस सप्ताह : अभी वही है निज़ामे कोहना !

अभी वही है निज़ामे कोहना / ख़लीलुर्रहमान आज़मी

अभी वही है निज़ामे कोहना अभी तो जुल्मों सितम वही है
अभी मैं किस तरह मुस्कहराऊं अभी रंजो अलम वही है

नये ग़ुलामों अभी तो हाथों में है वही कास-ए-गदाई
अभी तो ग़ैरों का आसरा है अभी तो रस्मों करम वही है

अभी कहां खुल सका है पर्दा अभी कहां तुम हुए हो उरियां
अभी तो रहबर बने हुए हो अभी तुम्हा भरा भरम वही है

अभी तो जम्हूबरियत के साये में अमिरियत पनप रही है
हवस के हाथों में अब भी कानून का पुराना कलम वही है

मैं कैसे मानूं कि इन खुदाओं की बंदगी का तिलिस्मह टूटा
अभी वही पीरे-मैकदा है अभी तो शेखो-हरम वही है

अभी वही है उदास राहें वही हैं तरसी हुई निगाहें
सहर के पैगम्बारों से कह दो यहां अभी शामे-ग़म वही है ।


आने वाली पीढ़ी के नाम / बर्तोल्त ब्रेख़्त

1.

सचमुच मैं अँधिआरे दौर में जी रहा हूँ!
सीधी-सच्ची बात करना बेवकूफी है.
बेशिकन माथा निशानी है
पत्थर दिल होने की. वह जो हँस रहा है
उसने अभी तक सुनी नहीं
खौफनाक ख़बरें.

उफ़, कैसा दौर है ये
जब पेड़ों के बारे में बतियाना अमूमन जुर्म है
क्योंकि यह नाइंसाफी के मुद्दे पर एक तरह से ख़ामोशी है!
और वह जो चुपके से सड़क पार कर रहा है,
क्या अपने उन दोस्तों की पहुँच से बाहर नहीं
जो मुसीबत से घिरे हैं?

ये सही है कि मैं चला ले रहा हूँ अपनी रोजी-रोटी
मगर, यकीन करें, यह महज एक इत्तफाक है.
जो कुछ भी मैं करता हूँ, वह नहीं बनाता मुझे
पेट भर खाने का हकदार.
इत्तफाकन बच गया मैं. (किस्मत ने साथ छोड़ा नहीं
कि मैं गया काम से.)

वे मुझ से कहते हैं कि खाओ-पियो.
खुश रहो कि ये सब मयस्सर है तुम्हें.
मगर मैं कैसे खा-पी सकता हूँ
जबकि मेरा निवाला छीना हुआ है किसी भूखे से
और मेरे गिलास का पानी है किसी प्यासे आदमी का हिस्सा?
और फिर भी मैं खा-पी रहा हूँ.

मैं समझदार हो सकता हूँ खुशी-खुशी.
पुरानी किताबें बताती हैं कि समझदारी क्या है-
नजरअंदाज करो दुनिया की खींचातानी
अपनी छोटी सी उम्र गुजार दो
बिना किसी से डरे
बिना झगड़ा-लड़ाई किए
बुराई के बदले भलाई करते हुए—
इच्छाओं की पूर्ति नहीं बल्कि उन्हें भुलाते हुए
इसी में समझदारी है.
मैं तो इनमें से कुछ भी नहीं कर पाता-
सचमुच मैं अँधिआरे दौर में जी रहा हूँ!

2.

उथल-पुथल के दौरान मैं शहरों में आया
जब हर जगह भूख का राज था.
बगावत के समय आया मैं लोगों के बीच
और उनके साथ मिलकर बगावत की.
इस तरह गुजरा मेरा वक्त
जो मिला था मुझे इस धरती पर.

कत्लेआमों के दरमियान मैंने खाना खाया.
मेरी नींद में उभरती रहीं क़त्ल की परछाइयाँ.
और जब प्यार किया, तो लापरवाही से प्यार किया मैंने.
कुदरत को निहारा किया बेसब्री से.
इस तरह गुजरा मेरा वक्त
जो मिला था मुझे इस धरती पर.

हमारे दौर के रास्ते हमें ले जाते थे बलुई दलदल की ओर.
हमारी जुबान ने धोखा दिया कातिल के आगे.
मैं कुछ नहीं कर सकता था. लेकिन मेरे बगैर
हुक्मरान कहीं ज्यादा महफूज रह सकते थे. यही मेरी उम्मीद थी.
इस तरह गुजरा मेरा वक्त
जो मिला था मुझे इस धरती पर.

3.

तुम, जो इस सैलाब से बच निकलोगे
जिसमें डूब रहे हैं हम ,
जब भी बोलना हमारी कमजोरियों के बारे में,
तो ख्याल रखना
इस अंधियारे दौर का भी
जिसने बढ़ावा दिया उन कमजोरियों को.

जूतों से भी ज्यादा मर्तबा बदले हमने देश.
वर्ग युद्ध में, निराश-हताश
जब सिर्फ नाइंसाफी थी और कोई मजम्मत नहीं.

और हमें अच्छी तरह पता है
कि नफरत, कमीनगी के खिलाफ भी
चेहरे को सख्त कर देती है.
गुस्सा, नाइंसाफी के खिलाफ भी
आवाज़ को तल्ख़ कर देता है.
उफ़, हम जो इस दुनिया में
हमदर्दी की बुनियाद रखना चाहते थे
खुद ही नहीं हो पाये हमदर्द.

लेकिन तुम, जब आखिरकार ऐसा दौर आये
कि आदमी अपने संगी-साथी का मददगार हो जाए,
तो हमारे बारे में फैसला करते वक्त
बेमरौवत मत होना.

(अनुवाद – दिगम्बर)


बिल में आखिर काला क्या है? / धर्तिअंश महेंद्र

वो कह रहे हैं कि
वो पूछ रहे हैं
दो महीनों से
हंसते हुये
पूरी निर्लज्जता से
कमीनेपन के साथ
अंदाजे बेशर्म पूछ रहे हैं
कि बिल मे आखिर काला क्या है ?

इन्हें रंगों ओर कपड़ों की पहचान बड़ी गहरी है
ये रंग देना चाहते हैं
हर खूबसूरत रंग को नफरत के रंग मे
और सियाह कर देना चाहते हैं जिंदगी के सारे रंग

पर विरोध का रंग भी एक ही होता है
जब तुम पूछते हो कि इसमे काला क्या है
तो मुझे अब हंसी भी नहीं आती
घिन्न आती है और थूकने का मन करता है
तुम्हारे धूर्त और मक्कारी भरे चेहरों पर

तुम्हे भूखे रखकर मारने का मन करता है
तुम्हे कर्ज मे डूबे, आत्महत्या को मजबूर
सल्फास की गोलियां खाते
पेड़ पर लटकी,खलिहान मे पड़ी लाश
और नहर मे तैरते मुर्दे की तरह
देखने का मन करता है
फसलों को औने पौने बेचने को मजबूर
दर दर भटकने और थक कर
आग लगाने का मन करता है

दरअसल
तुम्हारी नीयत काली है
दोस्त काले हैं
धंधा काला है

तुम्हारा कानून अंधा
और सियाह काला है
कोर्ट कचहरी काली है
पुलिस काली, जेलें काली
तंत्र और हिसाब किताब काला है
अंदाजे बयां काला
तुम्हारे मालिक काले

जो अभी भी तुम्हें समझ नहीं आता
कि इसमे काला क्या है
तो हम क्या करें ?
तुम करो अपनी
हम अपनी करेंगे
जबतक वापिस नहीं होते
ये काले बिल
हम घर वापसी नहीं करेंगे !


वसंत आ रहा है / मार्गस लैटिक

फर्क नहीं पड़ता…
मेरे कहने से, तुम्हें जाना ही होगा…
अपने लिए देखने और महसूसने को
कि शहरों की चोटी पर पर्वतों के साए
और नन्हीं सी जानों के बीच बहती नदी
तमन्नाएँ दिलों के घर में रहती हैं
और रह रह रूप बदलते हैं…

हाँ सच है की बसंत आने को है…
मेघ, सरगोशी और गमगीन खामोशी में…
इस से पहले की बहती हवा पेड़ों से सरसराती निकले
और पुरानी धूसर छतों पे जाके मचले…
तुम्हारे लब्जों में रंग और रवानी
दोनों खिल उठेंगे…
और रंग चढ़ेगा हाथों पर मरहम का, इनायत का…
लेकिन सोच करवट लेगी
शायद जिंदगी के माने बदल जाएँ
कुछ ऐसे कि जिंदगी झाँकेगी आँखों से
और निर्ममता से धो देगी
दिल के सारे मेल पुराने…
और रह रह कर खोलेगी
नए सिरों से मुहाने…

क्या मिल सकेगी राह तुम्हें?
क्या पहुँच पाओगे लक्ष्य तक
जो कि तुम खुद हो ।


क्या गजब की बात है / पी डी सत्या

क्या गजब बात है कि
हत्यारा भी
दुनिया में बराबर जिंदा रहना चाहता है
जिंदा रहने के
निरंतर 100 उपाय ढूंढता है

दुनिया तो है ही
जिंदा रहने के लिए
फिर आखिर कहां से ये
हत्यारे चले आते हैं

तय करो कि
एक दिन हत्यारों से भी बात हो
फिर जिंदगी के पक्ष में कुछ भी करना पड़े।