जल निगम कर्मियों का प्रदर्शन, 5 माह से वेतन नहीं

वेतन-पेंशन की माँग व निजीकरण के ख़िलाफ़ धरना

उत्तर प्रदेश जल निगम के मौजूदा और रिटायर कर्मचारी शुक्रवार, 12 फरवरी को सड़कों पर उतरे। बीते कई महीनों से वेतन और पेंशन नहीं मिलने से परेशान इन कर्मचारियों ने प्रदेश में कई जगह धरना दिया, जूलुस और रैलियां निकाली, साथ ही मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन भी सौंपा। उत्तर प्रदेश जल निगम संघर्ष समिति के बैनर तले हुए इस प्रदर्शन में वेतन और पेंशन के अलावा भी जल निगम कर्मियों की कई पुरानी मांगें उठाई गईं, जो कई अनुरोधों के बावजूद अभी तक पूरी नहीं हो पाई हैं।

आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश जल निगम संघर्ष समिति ने पहले ही 10 फरवरी को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पूरे प्रदेश में चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा की थी। जिसके पहले चरण में शुक्रवार को सभी जिला मुख्यालयों पर जल निगम कर्मियों ने धरना दिया और डीएम को ज्ञापन सौंपे।

समिति का कहना है कि पहले चरण के बाद दूसरे चरण में 16 से 20 फरवरी तक जल निगम मुख्यालयों पर क्रमिक अनशन व प्रदर्शन किया जाएगा और अगर तब भी सरकार द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया गया तो एक सप्ताह बाद 23 फरवरी से जल निगम कर्मी आमरण अनशन करेंगे।

जल निगम कर्मचारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?

– सितंबर, 2020 से अब तक का बकाया वेतन एवं पेंशन का तत्काल भुगतान।

– ट्रेजरी से प्रतिमाह नियमित रूप से वेतन और पेंशन का भुगतान कराया जाए।

– साल 2016 से बकाया सभी पेंशनरी देयों का तत्काल भुगतान किया जाए।

– मृतक आश्रितों की अनुकंपा नियुक्ति तत्काल बहाल की जाए।

– जल निगम कर्मचारियों पर भी राजकीय विभाग के कर्मचारियों की तरह सातवां वेतनमान लागू किया जाए।

सबसे पहले तो जान लीजिए की यूपी जल निगम कर्मियों के वेतन और पेंशन की जिम्मेदारी सीधे तौर पर प्रदेश सरकार के पास है ही नहीं। निगम अपने काम के जरिए होने वाली आमदनी से वेतन और पेंशन का भुगतान करता है। हालांकि इसी आमदनी का करीब 2,100 करोड़ रुपये प्रदेश सरकार के पास बकाया है जिसका वह भुगतान नहीं कर रही हैं। सीधा मतलब जब निगम की कमाई ही सरकार नहीं दे रही तो वो अपने कर्मचारियों को वेतन और पेंशन कैसे दे।

जल निगम संघर्ष समिति के मुताबिक निगम की खस्ता आर्थिक स्थिति की जिम्मेदार सरकार है क्योंकि एक तो सरकार उन्हें पैसा नहीं दे रही दूसरा हाल के सालों में सरकार जल निगम के कार्यों को दूसरी एजेंसियों को सौंप रही है, जिससे निगम की आय बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

समिति का कहना है कि प्रदेश सरकार उप्र वाटर सप्लाई एवं सीवरेज अधिनियम-1975 में निहित व्यवस्था को अतिक्रमित कर पेयजल तथा जल जीवन मिशन (हर घर नल से जल) जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को लघु सिंचाई विभाग, प्रोजेक्ट कार्पोरेशन, यूपी सीएलडीएफ आदि को आवंटित कर रही है जो इन कार्यों के लिए सक्षम नहीं हैं।

गोरखपुर के मंडल अध्यक्ष नितेश कुमार नायक का मानना है कि जल निगम कर्मियों के साथ सरकार भेदभाव कर रही है। जो काम जल निगम के द्वारा किया जाता रहा है अब उसे प्राइवेट संस्था के जरिए कराया जा रहा है। इस वजह से कर्मचारियों के समक्ष कई तरह की समस्याएं पैदा हो गई है। सरकार से मांग है कि उनकी समस्याओं का जल्द से जल्द निस्तारण किया जाए।

समिति के मुताबिक जल निगम द्वारा किए गए कार्यों के बदले मिलने वाला सेंटेज भी लंबे समय से नहीं दिया गया है। सेंटेज यानी शतांश, जल निगम के गठन के बाद ये व्यवस्था की गई कि वह प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार या दूसरी एजेंसियों के लिए जो भी कार्य करेगा उसे 22 प्रतिशत सेंटेज मिलेगा। जिससे वह वेतन, पेंशन व अन्य खर्चों का वहन करेगा।

हालांकि एक अप्रैल 1997 से जल निगम के सेंटेज को 22 प्रतिशत से घटाकर 12.5 फीसदी कर दिया गया। इससे जल निगम की आमदनी प्रभावित हुई और इसमें लगभग 41 फीसदी की कमी आई। सिर्फ यही नहीं जवाहर रोजगार योजना, सांसद व विधायक निधि (क्षेत्रीय विकास निधि) के कार्यों पर सेंटेज शून्य कर दिया गया। जल निगम बोर्ड ने प्रदेश सरकार से इसे संशोधित करने का अनुरोध कई बार किया लेकिन इसे सरकार द्वारा अनसुना कर दिया गया।

गौरतलब है कि इससे पहले उत्तर प्रदेश जल निगम बीते साल 27 अप्रैल को सीएम राहत कोष में 1.47 करोड़ रुपए दान देने के लिए सुर्खियों में आया था। इस फंड को कोरोना से लड़ने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ ने पीएम केयर्स फंड की तर्ज पर बनाया था। तब पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सवाल उठाया था कि जब तीन महीने से जल निगम के कर्मचारियों को वेतन ही नहीं मिल पा रहा, तो विभाग मुख्यमंत्री के कोरोना राहत कोष में दान कैसे दे रहा है।

दरअसल तब मीडिया में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरवरी, मार्च और अप्रैल का वेतन और पेंशन जल निगम कर्मियों का बकाया था। खुद यूपी जल निगम कर्मचारी महासंघ के संयोजक अजय पाल सोमवंशी ने आपत्ति जताते हुए कहा था कि तीन महीने से कोई सैलरी किसी को नहीं मिली है, तो फिर कैसे उससे पैसा काट लिया वो भी बिना किसी जानकारी।

बता दें कि उत्तर प्रदेश जल निगम का गठन 1975 में किया था। जल निगम को नगरीय और ग्रामीण पेयजल, सीवरेज, ड्रेनेज एवं नदी प्रदूषण नियंत्रण सम्बन्धी कार्यों का दायित्व सौंपा गया। जल निगम को इन कार्यों के लिए विशेषज्ञ एजेंसी के रूप में मान्यता मिली। लेकिन जल निगम में मौजूदा आर्थिक संकट के कारण सितंबर 2020 से लगभग दस हज़ार कर्मियों और 15 हज़ार रिटायर कर्मचारियों को पेंशन नहीं मिली है। वहीं मृतक आश्रितों को नौकरी देने पर भी 2018 से रोक लगी हुई है जबकि जल निगम ने मृतक आश्रित नियमावली को स्वीकार किया है। यही नहीं रिटायर अभियंताओं व कर्मियों को रिटायर होने के बाद मिलने वाले देयकों का भुगतान वर्ष 2016 से नहीं हुआ है।

न्यजूक्लिक से साभार

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