कविताएं इस सप्ताह : ऐ जुल्म! आ मुझे मार !

सड़कें / रूपाली

एक

उनके सीनों पर ठोंक दी गईं कीलें
खड़ी कर दी गई ऊँची बाड़ें
समतल सड़कों को जबरन
उबड़-खाबड़ कर
सिखाया गया सबक
जिनपर चलकर लोग आ मिलते थे
तमाम अपने जैसों से
और इस तरह वे
जुड़ जाते थे सभी दिशाओं से
मुसीबत की घड़ी में
वे समझती थीं उनकी पीड़ा
तभी तो दौड़ती थीं सरपट
उन्हें लेकर
सड़कों से तानाशाहों का बैर पुराना था
वे रास्ते जो दिखाती थीं हमेशा
फ़िलहाल
लहूलुहान सड़कें ख़ामोश हैं
उन्हें पता हैं
फूट जाएगी उनमें से ही
कोई नई राह
हमेशा की तरह।


दो

वे बंद की जा रही थीं जगह-जगह
लगाई जा रही थीं उनपर संगीन धाराएँ
झेल रही थीं तमाम यातनाएँ ख़ामोश
अपना फ़र्ज़ पूरा करने के एवज में
इसतरह
जब उनपर न चल पाने के सारे इंतज़ाम
कर लिए गए पुख़्ता
अचानक जूतों की क़ीमत में
भारी कमी की घोषणा हुई
लोग उछल पड़े ख़ुशी से
दौड़ पड़े नंगे पाँव
दुकानों की ओर
यह दृश्य देख
घायल सड़कें मुस्कुरा उठीं।


हम मज़दूर हैं / मनोज सिंह

तुम कील लगा लो
हम बराबर कर देंगे रोड-रोलर से
हम मज़दूर हैं

तुम दीवार चुनवा दो कंक्रीट के
हम ढहा देंगे गारंटी है, बुलडोज़र से
हम मज़दूर हैं

तुम बैरिकेड पर बैरिकेड लगा लो रोकने को
हम बैरिकेड बनाना बंद कर देंगे
हम मज़दूर हैं

तुम बंदूकें और गोले छोड़ो किसानों पे
हम बंदूकें और गोले बनाना बंद कर देंगे
हम मज़दूर हैं

हम किसान हैं-हम मज़दूर हैं
किसान-मज़दूर एकता ज़िंदाबाद

तुम अपनी सोचो

किसान अनाज़ उगाना बंद कर देंगे
मज़दूर मिल चलाना बंद कर देंगे

तो रोटी कहां से पाओगे
भूख लगेगी तो क्या खाओगे……..????


इतिहास में दर्ज हो / स्वप्निल श्रीवास्तव

इतिहास में दर्ज हो कि नमकहरामों ने नमक
की कीमत नही अदा की है
उल्टे नमकहलालों का मजाक
उड़ाते रहे

वे रसूखदारों के पक्ष में लड़ते रहे
जो उनसे असहमत हुआ उसे देशद्रोही
कह कर उसके पीठ पर मुक़दमें लाद
दिए गए

इतिहास में दर्ज हो जो सत्ता के समर्थक है
उन्हें सत्ता का दलाल और जनता का दुश्मन
कहा जाय

नराधमों ! उनके अनाज के जरिये तुम्हारी
धमनियों में दौड़ रहा है रक्त और
तुम उसे शर्मसार कर रहे हो

तुम्हें जब भूख लगती है तो क्या
डॉलर या सोने चांदी से अपनी क्षुधा
शांत करते हो ?

नही ! उनके अनाज से तुम्हें जीवनदान
मिलता है

हे बिके हुए लोगो -अपनी आत्मा की
आवाज सुनो अन्यथा यह धरती नही
सुनेगी तुम्हारी आवाज


ऐ ज़ुल्म! आ मुझे मार / दुनु रॉय

ऐ ज़ुल्म मुझे मार, कई-कई बार
गैस से बहा आंसू ज़ारो कतार,
लहू से रंग दे अपनी तलवार
चीर दे योनी फोड़ ये कपार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

कर दे देह लौह सलाख़ों के पीछे
दबा दे गर्दन जब्र घुटनों के नीचे
खींच ले ज़ुबान, आँखें कर दे पार
पेशी के सैलाब में नय्या दे उतार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

चौराहा, मैदान पूरा नगर बंद
सर्द रात में रियाया नज़रबंद
ख़त्म रोज़गार,और ख़त्म व्यापार
बढ़ा सिर्फ है लूट का कारोबार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

ना लिखना होगा, ना पढ़ना होगा
ना सड़कों पर मुट्ठी का बंधना होगा
ना हंसी होगी, ना सुख का इज़हार
ना मुहब्बत, ना आपस में सरोकार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

बिगाड़ मेरी सूरत, तेरी शक्ल की तरह
निचोड़ मेरा दिमाग, तेरी अक्ल की तरह
सबको बना ग़ुलाम, सब बने अंधकार
ऊँचे हों और ऊँचे, तू जिनका चौकीदार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

सड़ जाऊं जेलों में, पर बू मेरी आएगी
मर जाऊं ढेरों में, ख़ाक उड़के छाएगी
लब कट जाएँ, बनेंगे लफ़्ज़ों के मज़ार
इंसानियत की रूह चूसेगी तेरा अहंकार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

हँसना फ़र्ज़ है मेरा, गाना मेरा फ़ितूर
सपना धर्म है मेरा, नाचना मेरा सुरूर
कैसे रोके मुझे सोचकर तू बेक़रार
दर्द से फूटे सर तेरा, यही मेरा इंतज़ार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार

तू मारेगा किसे, तू खुद घायल है
खामोश करेगा जिसे, वो तेरा सायल है
सीना काटेगा, फूटेगा तेरी मौत का अंगार
लाश में जान नहीं पर गले में तेरी हार
ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार, ऐ ज़ुल्म आ मुझे मार


लोक ‘तांत्रिक’ व्यवस्था का कीलबन्धन / महेन्द्र ‘आज़ाद’

दिल्ली के चारों ओर ठोक दी गईं हैं कीलें
खींच दिए गए हैं कटीले तार
खड़े कर दिए गए हैं स्थाई बेरिकेट
ये किलाबंदी कतई नहीं है
ये तंत्र में बैठे तांत्रिक का टोटका है
ये कीलबन्धन है
तांत्रिक अभी भी मुगालते में है कि
जिस प्रकार चल पड़ा था उसका वशीकरण वाला टोटका
ठीक उसी प्रकार कीलबन्धन का टोटका चल पड़ेगा

किसान जिस प्रकार धरती की कोख में बीज अर्पण कर सबके लिए अन्न उपजाता है
उसी प्रकार लोक ‘तांत्रिक’ व्यवस्था ने आज धरती की कोख में कीलें बो दी हैं
जिस प्रकार बीजों को पानी से सींचा जाता है
ठीक उसी प्रकार से तांत्रिक खून से इन किलों को सींचेगा
वो खून किसानों का होगा
वो खून जवानों का होगा
वो खून मज़दूरों का होगा
वो खून आम जनों का होगा
खून से सींची ये कीलें एक दिन लुटियन्स ज़ोन तक उग जायेगीं
तब तक इतिहास में एक और तानाशाह खुदकुशी कर चुका होगा।



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