चमोली आपदा : बर्बादी का यह सिलसिला आखिर रुकेगा कैसे?

तबाही मचाती दानवीय परियोजनाओं पर रोक कैसे लगे?

उत्तराखंड के चमोली में रविवार की भयावह आपदा में अबतक 17 जन के शव बरामद हो चुके हैं और 202 मज़दूर लापता हैं। सवाल यह है कि आपदाओं का यह सिलसिला आखिर रुकेगा कैसे? मानव द्वारा रचित विपदाएं प्रकृति जनित विपदाओं से ज्यादा बड़ा योगदान कर रही हैं। पहाड़ की छाती पर तेजी से बन रहे विकास के माडल पर्यावरण को तबाह और खोखला कर रहे हैं। दानवी विकास सोख रही हैं मानवी सम्पदाएं।

उल्लेखनीय है कि बीते 7 फरवरी को उत्तराखंड के चमोली जिले के रैणी गांव में ग्लेशियर फटने से धौली गंगा नदी में बाढ़ आ गई। पूरे इलाके में तबाही का मंज़र है। घाटी में जारी दो जल विद्युत परियोजनाओं तबाह हैं। ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट तथा तपोवन पावर प्रोजेक्ट ध्वस्त हो गया और यहाँ कार्य कर रहे 202 मज़दूर लापता हैं। इसके अलावा ख़बर लिखने तक कम से कम 17 जन के शव बरामद हो चुके थे, जो संख्या लगातार बढ़ रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार तपोवन डैम भी टूट गया है। अलकनंदा की सहायक नदी, धौली गंगा नदी का जल स्तर कई मीटर तक बढ़ गया है और बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। सैकड़ों जानवर, लोग और उनके असियाने बह गए।

स्थानीय लोग अपने इलाके में ऐसे डैम के निर्माण का विरोध करते रहे हैं। पर्यावरणीय दृष्टि से भी इन डैम्स का निर्माण अनुचित है। लोगों ने इसके ख़िलाफ नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की है, जो विचाराधीन है।

तबाही का यह सिलसिला जारी है…

तबाही का यह मंज़र उत्तराखण्ड के लिए कोई नया नहीं है। उत्तराखण्ड सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में बर्बादी की रोज नई कहानी लिखी जा रही है। जंगलों, बुग्यालों व पहाड़ों की तबाही बढ़ती जा रही है। केदारनाथ से लेकर उत्तरकाशी की आपदाओं के साये में लोग जीने को अभिशप्त हैं। हर नयी विपदा पहले से भयानक ही होती है।

बादल फटने, ग्लेशियर पिघलने का कारण जलवायु परिवर्तन, तापमान में उतार-चढ़ाव, बर्फ के नीचे स्खलन आदि हैं। इसकी मुख्य वजह पूँजीवादी मुनाफे के कारण अनियोजित विकास, अंधधुंध खनन व पेड़ों की कटाई आदि से पर्यावरण को नष्ट करना है। मुनाफे की अंधी हवस में विकास के नाम पर बन रही तमाम परियोजनाओं ने बारिश, बन, जल, मौसम सब पर भयानक असर डाला है। वर्तमान चमोली आपदा और तबाही इसकी बानगी हैं।

दानवीय विकास का माडल है देन

सवाल यह है कि आपदाओं का यह सिलसिला आखिर रुकेगा कैसे? मानव द्वारा रचित विपदाएं प्रकृति जनित विपदाओं से ज्यादा बड़ा योगदान कर रही हैं। पहाड़ की छाती पर तेजी से बन रहे विकास के माडल पर्यावरण को तबाह और खोखला कर रहे हैं। दानवी विकास सोख रही हैं मानवी सम्पदाएं।

बड़े पैमाने पर विस्पफोटकों और डेटेनेटरों के प्रयोग से पहाड़ की चूलें तक हिल रही हैं। मलबों के ढ़ेर नदियों को जाम कर रहे हैं। यही नहीं, बाजारवाद के इस दौर ने चारधाम यात्रा तक को ग्लैमरस बना दिया है। इससे पहाड़ पर बढ़ रहे अनियंत्रित दबाव ने संकट को और गहराया है। उधर, सरकारी राहत के बहाने भ्रष्टाचार कोढ़ में खाज का काम कर रहा है।

इन सवालों पर मंथन बेहद ज़रूरी है। क्योंकि पहाड़ों के विकास का यह क्रम जारी रहा तो न केवल तबाही का यह सिलसिला और तेजी से आगे ही बढ़ेगा बल्कि और भी भयानक मंज़र का गवाह बनेगा।

अतीत गवाह है कि बरबादी की ज्यादा बड़ी मार ग़रीब मेहनतकश जनता पर ही पड़ती है। इस दौरान राहत पैकजों की घोषणाएं होती रहती हैं, राजनीतिक रोटियां सिकती रहती हैं। लेकिन मुनाफे के हित में दानवीय परियोजनाएँ बेलगाम जारी रहती हैं। सरकारी राहत की उम्मीद में नई आपदा का एक और कहर बरपा हो जाता है।

“संघर्षरत मेहनतकश” पत्रिका, जनवरी-मार्च, 2021 का सम्पादकीय

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