कविताएँ इस सप्ताह : गण और तंत्र के बीच जन !

शासन की बंदूक / नागार्जुन

खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक

उस हिटलरी गुमान पर सभी रहें है थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक

सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक

जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक


सब संकट में / हूबनाथ

जन संकट में
गण संकट में
मन संकट में
भारत भाग्य विधाता
हम सबका अन्नदाता
कृषि संकट में
वन संकट में
जल संकट में
झूठ तंत्र का नाता
अहंकार मदमाता
सत संकट में
रथ संकट में
पत संकट में
धूर्त्त शिकारी आता
झूठे स्वप्न दिखाता
गति संकट में
मति संकट में
सुख संकट में
भय के गीत सुनाता
मुश्किल नाच नचाता
विधि संकट में
निधि संकट में
बुद्धि संकट में
भूखा पेट खलाता
जय हे जय हे गाता


तंत्र फंस गया है / हूबनाथ

तंत्र फंस गया है
बुरी तरह
गणों के बीच
गण हांक रहे चहुं ओर से
किसी गण के हाथ सोंटा
तो किसी के हाथ संटी
तो कुछ तालियां बजा बजा
सुस्कारी मार
टिटकारी देते दुलराते
हांके जा रहे
भीषण जाड़े में
मुंह से भाप फेंकता
ठिठुरता जकड़ता
जाड़े में अकड़ता तंत्र
अड़ गया है चौराहे पर
टस से मस नहीं हो रहा
दाईं ओर से ज़ोर अधिक
तो बाएं की ज़िद जबर
अगवाड़े पंडा
तो पिछवाड़े डंडा
ठंडा पड़ा तंत्र
जम रहा है सड़क पर
लहू मिले बरफ की तरह
और गण और तंत्र से बाहर
बुझे अलाव के गिर्द
एक चिनगारी की आस में
जुटी हताश भीड़
कुरेदे जा रही श्मशानी राख
अतीत वर्तमान और भविष्य की
सभी के मुंह काले
हाथ राख भरे
सारी चिताएं बरफ की नदी में
दूर दूर तक सिर्फ धूसर सन्नाटा
तीनों चारों रंग दम तोड़ चुके
बारी तंत्र की है
कब तक सहेगा बोझ गणों का
कोई कोंच रहा
कोई खदेड़ रहा
कोई लोहकार रहा
तो कोई सिर्फ पुकार रहा
पूरी करुणा से
पूरी याचना से
भारी यातना से
पर आखिर सुने कौन
सब तो व्यस्त हैं
पस्त हैं
मस्त हैं


चप्पल / राजेश जोशी

चल चप्पल
अपन भी चलें बाहर

बाहर जहाँ कोहरा तोड़कर निकली हैं सड़कें
अपनी पीली कँचियाँ फेंककर
मैदान में आ डटा है नीम
बाहर जहाँ तिरछी नँगी तलवार पर चलती
ऊपर जा रही हैं ओस की बून्दें
नँगे पाँव ।

चल चप्पल चलें बाहर
किसने उतारा जानवर का चमड़ा
पकाया किसने उसे सिरके की
तीखी गन्ध के बीच खड़े रहकर ।

किसने निकाला लोहा ज़मीन से
ढाला किसने उसे तार में
किसने बनाईं कीलें
किसने बँटा कपास
तागा किसने बनाया
किसने चढ़ाया मोम

राजा ने तो कहा था —
सारी पृथ्वी पर मढ़ दो चमड़ा
किसने खाया उसकी मूर्खता पर तरस
हुक्मअदूली किसने की
किसने चुना पैरों को
राँपी किसने चलाई
पैर की माप से
किसने काटा सुकतल्ला
चल आज उधर चल

बबूल के काँटों
काँच की किरचों और कीचड़ से
बचाने वाली
तपती सड़क के ताप से
मेरी घुमक्कड़ी में
मेरी थकान की हिस्सेदार ।

मेरी रोज़ी-रोटी से
मेरे आत्मीयों तक
मुझे रोज़ ले जाने वाली
मेरी दोस्त

आज चल उधर
उस बस्ती की ओर
जहाँ हाथ सक्रिय हैं
पैरों की हिफ़ाज़त के लिए
और जहाँ से
नए शब्द प्रवेश करते हैं दुनिया में ।

चल चप्पल
आज चलें उधर ।


अँधेरे के बारे में कुछ वाक्य / राजेश जोशी

अन्धेरे में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह क़िताब पढ़ना
नामुमकिन बना देता था ।

पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या क़िताब से डरता था
उसके मन में शायद यह संशय होगा कि क़िताब के भीतर
कोई रोशनी कहीं न कहीं छिपी हो सकती है ।
हालाँकि सारी क़िताबों के बारे में ऐसा सोचना
एक क़िस्म का बेहूदा सरलीकरण था ।
ऐसी क़िताबों की संख्या भी दुनिया में कम नहीं ,
जो अन्धेरा पैदा करती थीं
और उसे रोशनी कहती थीं ।

रोशनी के पास कई विकल्प थे
ज़रूरत पड़ने पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था
ज़रूरत के हिसाब से कभी भी उसको
कम या ज़्यादा किया जा सकता था
ज़रूरत के मुताबिक परदों को खींच कर
या एक छोटा-सा बटन दबा कर
उसे अन्धेरे में भी बदला जा सकता था
एक रोशनी कभी कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास
एक रोशनी कहीं भीतर से, कहीं बहुत भीतर से
आती थी और दिमाग को एकाएक रोशन कर जाती थी ।

एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था
कहता था, उसे रेशा-रेशा उधेड़ कर देखो
रोशनी किस जगह से काली है ।

अधिक रोशनी का भी चकाचैंध करता अन्धेरा था ।

अन्धेरे से सिर्फ़ अन्धेरा पैदा होता है यह सोचना ग़लत था
लेकिन अन्धेरे के अनेक चेहरे थे
पाँवर-हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर
कई दिनों तक अंधकार में डूबा रहा
देश का एक बड़ा हिस्सा ।
लेकिन इससे भी बड़ा अन्धेरा था
जो सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होता था
या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले
ग़ुलाम दिमाग़ों से !
एक बौद्धिक अँधकार मौका लगते ही सारे देश को
हिंसक उन्माद में झोंक देता था ।

अन्धेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे
और उसे अपनी नियति मान लेते थे
कुछ ज़िद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में
जो कहते थे कि अन्धेरे समय में अन्धेरे के बारे में गाना ही
रोशनी के बारे में गाना है ।

वो अन्धेरे समय में अन्धेरे के गीत गाते थे ।

अन्धेरे के लिए यही सबसे बड़ा ख़तरा था ।



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