इस सप्ताह : संघर्षों से रीता जीवन !

कैसे न वे / स्वप्निल श्रीवास्तव

कैसे न वे अचूक निशानेवाज बन जाये
जब द्रोणाचार्य ही हाथ उठाकर
उनके पक्ष में खड़े हुए हो
और पूरा राज दरबार उनकी महिमा
का गायन कर रहा हो

कैसे न वे बड़े कविराज बन जाए
जब ऊंचे दर्जे के आलोचक उनके
कंधे पर हाथ रख कर कह रहे हो
प्रभु जी आप इस दुनिया के सबसे
बड़े कवि हैं

यह अयोग्यों और सस्ते दाम में बिक
जाने वालों का समय है जिसमें बाजार
की भूमिका निर्णायक हो गयी है

जिसके एक हाथ में असलहे और दूसरे
हाथ में लोगों को चुगाने के लिए अशर्फी
के दाने हो , वे ही आगे चलकर हमारे
कर्णधार बनेंगे

अक्ल बाटने से कुछ भी नही होने वाला है
आलिमों – जिधर ज़ालिम है उधर ही है
ताकत ।


जब रीत जाते हैं सपने / रूपाली

(रोहित वेमुला को याद करते हुए:)

जब सपने रीत जाते हैं
ज़िन्दगी हो जाती है ख़ाली
अंदर-बाहर होता है
केवल एक शून्य।
सवाल यह है कि
क्यूँ रीत जाते है सपने
क्यूँ मियाद से पहले ही कोई उम्र
छीज जाती है ?
क्यों सपनों से लदा
एक हरा-भरा पेड़
हो जाता है खोखला
और एक दिन
अपनी चुप्पी का ऐलान कर
खामोश हो जाता है
हमेशा के लिए?
क्यों धरती बहुत छोटी लगने लगती है
और ज़िंदगी सँकरी
बहुत सँकरी
विस्तार की तलाश
मृत्यु के वरण में ही
क्यों पूरी होती है अंततः?
अपनी-अपनी चौहद्दियों में
क़ैद हो जाती हैं विचारधाराएँ
और संवादों के सारे पुल
उड़ा दिए जाते हैं
शत्रुता के डायनामाइट से
क्यों बंद दिखने लगते हैं
मुक्ति का द्वार दिखाने वाले सारे रास्ते?
सपनों के खून से लथपथ
एक समूची सभ्यता है
जिससे पूछे जाने हैं
ये तमाम सवाल।


सपने नई सृष्टि लेकर आते हैं / निभा शाह

मरे कहे गए सपने
ज्वालामुखी लेकर आते हैं।
सपनों का डुबान नहीं होता
डूबे कहे गए सपने
सुनामी लेकर आते हैं।
सपनों का राख नहीं होता
बुझे कहे गए सपने
आग लेकर आते हैं।
सपनों का मृत्युबीज नहीं होता
बांझ कहे गए सपने नई सृष्टि लेकर आते हैं।

(2012 में ‘छिमेकी’ वेब साइट को दिए एक इंटरव्यू मे नेपाली क्रांति के संदर्भ में नेपाली कवि निभा शाह ने कहा था : “मुझे लगता है कि इतिहास के एक कालखंड में जनता के नायक यदि खलनायक बन भी जाते हैं तो जनता फिर अपने नायक पैदा करती है और नए सपने देखती है। शहीद का बलिदान रक्तबीज पैदा करने वाली कोख है, जो नए नायक पैदा करती रहेगी। जब तक जनता मुक्त नहीं होती, तब तक उसके सपने नहीं मरेंगे।”)



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