कविताएँ : बीते साल के दर्द के बीच “उम्मीद अभी ज़िंदा है!”

नए साल की शुभकामनाएँ! / सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

नए साल की शुभकामनाएँ!
खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को
कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को
नए साल की शुभकामनाएं!

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को
करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को
चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को
ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को
सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को
नए साल की शुभकामनाएँ!


नये साल के स्वागत में लखनऊ के वरिष्ठ चित्रकार मोहम्मद शकील की रचना

नववर्ष / सोहनलाल द्विवेदी

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

दीनों दुखियों का त्राण लिये
मानवता का कल्याण लिये,
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष!
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये।

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति
की ज्वालाओं के गान लिये,
मेरे भारत के लिये नई
प्रेरणा नया उत्थान लिये;

मुर्दा शरीर में नये प्राण
प्राणों में नव अरमान लिये,
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

युग-युग तक पिसते आये
कृषकों को जीवन-दान लिये,
कंकाल-मात्र रह गये शेष
मजदूरों का नव त्राण लिये;

श्रमिकों का नव संगठन लिये,
पददलितों का उत्थान लिये;
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत!
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये!

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के
मद का चिर-अवसान लिये,
दुर्बल को अभयदान,
भूखे को रोटी का सामान लिये;

जीवन में नूतन क्रान्ति
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये,
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!


उम्मीद अभी ज़िंदा है! / हूबनाथ

काल
पहले भी आया था
इस तरह
पर इतनी देर
ठहरा न था

ग्रहण
पहले भी लगा था
धरती को
पर अंधेरा बरस भर रहे
ऐसा न था

वक़्त को भी
घुन लगता रहा है
पर पूरा वर्ष ढह जाय
बालू की ढूह सा
यह तो नहीं हुआ

पाप हमने
पहले भी कम नहीं किए
अभिशाप प्रकृति का
ऐसे तो उतरा न था

मौत तो आती ही रही
जब से जनमें हैं तब से
लाशें कलंक सी जली हों
यह तो कभी न हुआ

धुंध पहले भी छाई थी
पर इस क़दर
कि खो जाए
ख़ुद की पहचान ही
अपने सिवा कोई और
दिखाई ही न दे
ऐसा तो सोचा न था

एक साथ
थम गई हो क़ायनात
जम गई हो ज़िंदगी
दिल के एक कोने में
बैठा रहा हो डर
मौत का
घर में भी
और बाहर भी

दुनिया बन गई हो
श्मशान
आवाज़ घुटी घुटी
हंसी फंसीं फसीं
सांस
अब थमी कि तब थमी
रिश्ते
दीमक लगी किताबों से
नाते
डर में डूबे ख़्वाबों से

तीज त्यौहार पर्व उत्सव
धन दौलत पद प्रतिष्ठा
सत्ता शक्ति उपलब्धि
कसी मुट्ठी में फिसलती
सूखी रेत की तरह

अपने बचे होने के
अहसास को
बचाए रखने की
पुरज़ोर कोशिश करते
निरर्थक बहसों में शामिल

अपने होने को
न्यायोचित ठहराते
इस जानलेवा ठंड में
नंगे आसमान के नीचे
भयावह रात के
गुज़रने का इंतज़ार करते

हम सब
गुज़र रहे हैं
एक अंधी सुरंग से
जिसके दूसरे छोर पर
रौशनी की उम्मीद
अभी ज़िंदा है !


नया साल / शैलेय

1.

अभी-अभी नया साल आया है
अभी-अभी मैं काम पर निकला हूँ
बरसों-बरस के उसी पुराने मन से
जिससे निकलते रहे मेरे माता-पिता
माता-पिता के माता-पिता

लेकिन
आज एक समस्या
मेरे माता-पिता की समस्या से
कहीं अधिक विकट आन खड़ी हुई है
कि आज मेरे हाथों को काम और
पैरों से आराम कहीं है ही नहीं
कि ज़िंदगी जैसे फुटकर हो गई है

मैं अपनी समस्या को लेकर
सरकार के पास जाना चाहता हूँ लेकिन
वहाँ बेरिकेडिंग लगी है
भारी पुलिस खड़ी है

तो क्या मुझे भूखे ही
या फिर
लाठी-डंडे खाकर मर जाना होगा
क्या अबकी नया साल इस तरह मनाना होगा?


2.

साल की अंतिम सांझ में भी
पहाड़ पर उसी तरह उतरी रात
जिस तरह
अंधेरा खोह-खन्दक में उतरता है

तब
अंधेरे में जिस तरह कीड़े
अपना कारोबार करते हैं
यहां भी स्याव-बाघ डुकरने लगे

किसी तरह नींद
कांधे से किसी बोझ के उतरने की तरह
जब उतरी
तो आंखे सोते-सोते भी रुंवासी हो आई

किसी पर भी
दिन भर का सिर पर फूटा हुआ घाम
रात भर पिण्डलियाँ चटकाता रहा

हालांकि
इस घुप्प अंधेरे में भी
दूर किसी गधेरे से आती साँय-साँय की
अनरवत आवाज़ सा
भीतर किसी बहुत पुराने सपने की
छप-छप बजती रही !


2020 को याद करते हुए ! / महेन्द्र ‘आज़ाद’

ओ बरस… बीते हुए बरस…
तुम कभी गुज़रोगे नहीं
साथ बने रहोगे सदा
मानवता को एक सीख देते हुए

ओ बरस… बीते हुए बरस
क्या क्या न देखा?
एक महामारी देखी
अपने ही घरों में कैद देखी
और जिनके पास नहीं थे अपने घर
उनको सड़कों पर अपने जड़ों की ओर लौटते देखा
सुनसान पटरियों पर सांस उखड़ते देखा
जहां इन्श्योरेंस का बाजार गरम है
वहीं इलाज़ की आस में लोगों को दम तोड़ते देखा
ऑनलाइन सारा व्यापार देखा
दानों-दानों के लिए मोहताज देखा
शिक्षा का विनाश देखा
ज्ञान के लिए तड़फता इंसान देखा
सत्ता का क्रूर मजाक देखा
संविधान का संहार देखा
अध्यादेशों से नीतियों का प्रख्यापन देखा
किसानों का सैलाब देखा
मज़दूरों को उदास देखा
युवाओं को निराश देखा
ओ बरस… बीते हुए बरस…
अब मत पूछ
क्या-क्या देखा?

ओ बरस… बीते हुए बरस…
मैं तुम्हें सिर्फ एक बरस नहीं मानता
तुम एक दौर हो
जहां से मज़दूर अपने घरों को लौट रहे थे
से लेकर
आज जब किसान अपने घरों से बाहर निकल रहे हैं
और ये दौर तब तक चलता रहेगा
जब तक शोषण से मुक्ति के लिए संघर्ष रहेगा
जिस दिन मानवता संघर्ष से मुक्ति पा लेगी
उस दिन ये दौर एक दस्तावेज बनकर
इस धरती पर आने वाली पीढ़ियों के लिए
मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए
सदियों तक याद किया जायेगा।


लाल हमारा रंग / ए एन सी कुमालो (अफ़्रीकी कवि)

हमें ऐसी कविताओं की जरूरत है
जिनमें खून के रंग की आभा हो
और दुश्मनों के लिए आती हो जिनसे
यमराज के भैंसे की घंटी की आवाज!

कविताएँ
जो आतताइयों के चेहरे पर
सीधा वार करती हों
और उनके गरूर को तोड़ती हों!

कविताएँ
जो लोगों को बताएँ
कि मृत्यु नहीं, जीवन
निराशा नहीं, आशा
सूर्यास्त नहीं, सूर्योदय
प्राचीन नहीं, नवीन
समर्पण नहीं, संघर्ष!

कवि, तुम लोगों को बताओ
कि सपने सच्चाई में बदल सकते हैं
तुम आजादी की बात करो
और धन्नासेठों को सजाने दो
थोथी कलाकृतियों से अपनी बैठकें!

तुम आजादी की बात करो
और महसूस करो लोगों की आँखों में
जनशक्ति की वह ऊष्मा
जो जेल की सलाखों को
सरपत घास की तरह मरोड़ देती है
ग्रेनाइट की दीवारों को ध्वस्त करके
रेत में बदल देती है!

कवि,
इससे पहले कि यह दशक भी
अतीत में गर्क हो जाय
तुम जनता के बीच जाओ और
जन संघर्षों को आगे बढ़ाने में
मदद करो !



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