बीतते साल के अंत में : सोचने के लिए कुछ कविताएँ !

हिमांशु कुमार की दो कविताएं

1.

कुछ लोग मारे गए
क्योंकि उनकी दाढ़ियां लंबी थीं

और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए
क्योंकि उनकी खाल का रंग
हमारी खाल के रंग से ज़रा ज़्यादा काला था

कुछ लोगों की हत्या की वाजिब वजह यह थी
कि वो एक ऐसी किताब पढ़ते थे
जिसके कुछ पन्नों में
हमारी किताब के कुछ पन्नों से
अलग बातें लिखी हुई थीं

कुछ लोग इसलिए मारे गए
क्योंकि वो हमारी भाषा नहीं बोलते थे

कुछ को इसलिए मरना पड़ा
क्योंकि वो हमारे देश में नहीं पैदा हुए थे

कुछ लोगों की हत्या की वजह ये थी
कि उनके कुर्ते लंबे थे

कुछ को अपने पजामे
ऊंचे होने के कारण मरना पड़ा

कुछ के प्रार्थना का तरीका
हमारे प्रार्थना के तरीके से अलग था
इसलिए उन्हें भी मार डाला गया

कुछ दूसरों की कल्पना ईश्वर के बारे में
हमसे बिल्कुल अलग थी
इसलिए उन्हें भी जिंदा नहीं रहने दिया गया

लेकिन हमारे द्वारा की गयी सारी हत्याएं
दुनिया की भलाई के लिए थीं

हमारे पास सभी हत्याओं के वाजिब कारण हैं

आखिर हम इन सब को न मारते
तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता?


2.

जन्म लेते ही मुझे हिन्दू, मुसलमान
या फलाना या ढिकाना बना दिया गया
जन्म लेने से पहले ही
मेरे दुश्मन भी तय कर दिए गये
जन्म से पहले ही
मेरी ज़ात भी तय कर दी गयी
यह भी मेरे जन्म से पहले ही
तय कर दिया गया था कि
मुझे किन बातों पर गर्व और
किन पर शर्म महसूस करनी है

अब एक अच्छा नागरिक होने के लिये
मेरा कुछ को दुश्मन मानना
और एक अनचाहे गर्व से भरे रहना
आवश्यक है

यह घृणा और यह गर्व
मेरे पुरखों ने जमा किया है
पिछले दस हज़ार सालों में
और मैं अभिशप्त हूं
इस दस हज़ार साल के बोझ को
अपने सिर पर ढोने के लिये
और अब मैं सौंपूंगा यह बोझ अपने
मासूम और भोले बच्चों को

अपने बच्चों को मैं सिखाऊंगा
नकली नफ़रत, नकली गर्व,
थमाऊंगा उन्हें एक झंडा
नफ़रत करना सिखाऊंगा
दूसरे झंडों से

अपने बच्चों की पसंदगियां भी मैं तय कर दूंगा
जैसे मेरी पसंदगियां तय कर दी गयी थीं
मेरे जन्म से पहले ही
कि मैं किन महापुरुषों को
अपना आदर्श मान सकता हूं
और किनको नहीं
किस संगीत को पसंद करना है
हमारे धर्म को मानने वालों को
कौन से रंग शुभ हैं
और कौन से रंग दरअसल विधर्मियों के होते हैं !

लगता है
अभी भी कबीले में जी रहा हूँ मैं
लड़ना विरोधी कबीलों से
परम्परागत रूप से तय है

शिकार का इलाका
और खाना इकठ्ठा करने का इलाका
अब राष्ट्र में तब्दील हो गया है
दूसरे कबीलों से इस इलाके पर
कब्ज़े के लिये लड़ने के लिये
बनाए गये लड़ाके सैनिक
अब मेरी राष्ट्रीय सेना कहलाते हैं

मुझे गर्व करना है इस सेना पर
जिससे बचाए जा सकें
हमारे शिकार के इलाके
पड़ोस के भूखे से लड़ना
अपने शिकार के इलाके के लिये
अब राष्ट्र रक्षा कहलाती है

लड़ने के बहाने पहले से तय हैं
पड़ोसी का धर्म, उसका अलग झंडा,
उनकी अलग भाषा
सब घृणास्पद हैं
हमारे पड़ोसी हीन और क्रूर हैं
इसलिए हमारी सेना को
उनका वध कर देने का
पूर्ण अधिकार है

दस हज़ार साल की सारी घृणा
सारी पीड़ा
मैं तुम्हें दे जाऊंगा मेरे बच्चो

पर मैं भीतर से चाहूंगा मेरे बच्चों
तुम अवहेलना कर दो मेरी
मेरी किसी शिक्षा को न सुनो
न ही मानो कोई सड़ा गला मूल्य
जो मैं तुम्हें देना चाहूं
धर्म और संस्कृति के नाम पर
तुम ठुकरा दो

मैं चाहूंगा मेरे बच्चो
कि तुम अपनी ताज़ा और साफ़ आंखों से
इस दुनिया को देखो

देख पाओ कि कोई वजह ही नहीं है
किसी को गैर मानने की
न लड़ने की ही कोई वजह है

शायद तुम बना पाओ एक ऐसी दुनिया
जिसमे सेना, हथियार, युद्ध, जेल नहीं होगी
जिसमें इंसानों द्वारा बनायी गयी
भूख, गरीबी और नफ़रत नहीं होगी
जिसमें इनसान अतीत में नहीं
वर्तमान में जियेगा


लाल्टू की दो कविताएं

1.

(टोकरी लिए खड़ी बच्ची
पंगत में बैठे लोगों को रोटी परोस रही है)
करीब से देखो तो उसकी आँखों में दिखती है
हर किसी को अपनी तस्वीर

एक निष्ठुर दुनिया में मुस्कराने की कोशिश में
कल्पना-लोक में विचरता है हर कोई
बच्ची और उसका लंगर है
किसान इतना निश्छल हर वक्त हो न हो
अपना दुख बयां करते हुए ज़रूर होता है

खुद को फकीर कहने वाले हत्यारे को यह बात समझ नहीं आती
अचरज होना नहीं चाहिए इसमें कि सब कुछ झूठ जानकर भी
पढ़े-लिखे लोग हत्यारे के साथ हैं
पर होता ही है
और अंजाने में हमारे दाँत होंठों के अंदर मांस काट बैठते हैं
कहते हैं कि कोई हमारे बारे में बुरा सोच रहा हो तो ऐसा होता है

बच्ची की मुस्कान को देखते हुए
हम किसी के भी बारे में बुरा सोचने से परहेज करते हैं
मुमकिन है कि हम इसी तरह मुस्करा सकें
जब हमें पता है कि इस मुस्कान को भी हत्यारे के दलाल
विदेशी साजिश कह कर लगातार चीख रहे हैं

यह अनोखा खेल है
इस मुल्क की मुस्कान को उस मुल्क की साजिश
और वहाँ की मुस्कान को यहाँ की साजिश कह कर
तानाशाह किसी भी मुल्क में जन्म लेना अभिशाप बना देते हैं
और फिर ऐसी हँसी हँसते हैं कि उनकी साँसों से महामारी फैलती है
आस्मां में रात में तारे नहीं दिखते और धरती पर पानी में ज़हर घुल जाता है

यह मुस्कान हमें थोड़ा सा और इंसान बना रही है
हमारे मुरझाते चले चेहरों पर रौनक आ रही है
अब क्या दुख और क्या पीर
बस धरती के हम और धरती हमारी
हममें राम और हमीं में मुहम्मद-ईसा
सीता हम और राधा हम
माई भागो हम नानक-गोविंद भी हम
यह ऐसी मुस्कान है कि सारे प्रवासी पक्षी
इसे देखने यहाँ आ बैठे हैं

ओ तानाशाह,
इस बच्ची को देख कर हमें तुम पर भी प्यार आ जाता है
हम यह सोच कर रोते हैं कि तुम्हारी फितरत में नफ़रत जड़ बना चुकी है
और फिर कहीं मुँह में दाँतों तले मांस आ जाता है
जा, आज इस बच्ची की टोकरी से रोटी खाते हुए
तुझे हम एकबारगी माफ करते हैं।


2.

बड़ा दिन आ रहा है
धरती और सूरज के अनोखे खेल में
हमारी उम्मीद कुलांचे भरती है

दिन बड़ा हो जाएगा
जाड़ा कम नहीं होगा
लहर दर लहर हमारे ऊपर से गुजरेगी
और तानाशाह दूरबीन से हमें लाशें उठाते देखेगा

वक्त गुजरता है
दरख्तों पर पत्तों के बीच से छन कर आती सुबह की धूप
हमें जगाती है
एक और दिन
हत्यारे से भिड़ने को हम तैयार हैं

दोपहर हमारे साए लंबे होते जाते हैं
फिलहाल इतना काफी है कि
तानाशाह सपनों में काँप उठे
कि हम आ रहे हैं
उसके ख्वाब आखिर अधूरे रह जाएँगे
जिन पंछियों को अब तक वह कत्लगाह तक नहीं ला पाया है
हम उनको खुले आकाश में उड़ा देंगे
और इस तरह वाकई एक नया साल आएगा

रात-रात हम साथ हैं
सूरज को भी पता है
जाने से पहले थोड़ी तपिश छोड़ जाता है
कि हमारे नौजवान गीत गाते रहें
हम हर सुबह उठकर
समवेत गुंजन करते रहें कि जो बोले सो निहाल
सत श्री अकाल!


(हरजिंदर सिंह उर्फ़ लाल्टू हिंदी के जाने माने कवि हैं, यह बात सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि वह भौतिकी के विद्वान हैं जिन्होंने अमेरिका के प्रिंसटन ( Princeton ) यूनिवर्सिटी से रिसर्च की है और हैदराबाद के अग्रणी संस्थान में पढ़ाते हैं )

मजरूह सुल्तानपुरी की गजल

आ निकल के मैदान में दो रूखी के खाने से।
काम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से।

अहदे इंकलाब आया दौरे आफताब आया
मुन्तजिर थीं ये आँखें जिसकी इक ज़माने से।

अब ज़मीन गायेगी हल के साज़ पर नग़मे
वादियों में नाचेंगे हर तरफ़ तराने से।

अहले दिल उगायेंगे ख़ाक से महो अंजुम
अब गुहर सबुक होंगे जौ के एक दाने से।

मनचले बनेंगे अब रंगो बू के पैराहन
अब सँवर के निकलेगा हुस्न कारखाने से।

आम होगा अब हमदम सब पे फैज़ फितरत का
भर सकेंगे अब दामन हम भी इस खजाने से।

मैं कि एक मेहनतकश मैं कि तीरगी दुश्मन
सुबहे नौ इबारत है मेरे मुस्कुराने से।

खुदकुशी ही रास आयी! देख बदनसीबों को!
खुद से भी गुरेजाँ हैं भाग कर ज़माने से।

अब जुनूँ पे वो साअत आ पडी कि ऐ ‘मजरूह’
आज जख्मे सर बेहतर दिल पे चोट खाने से।



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