इस सप्ताह : मंगलेश डबराल को याद करते हुए !

अपनी तस्वीर / मंगलेश डबराल

यह एक तस्वीर है
जिसमें थोड़ा-सा साहस झलकता है
और ग़रीबी ढँकी हुई दिखाई देती है
उजाले में खिंची इस तस्वीर के पीछे
इसका अँधेरा छिपा हुआ है

इस चेहरे की शांति
बेचैनी का एक मुखौटा है
करुणा और क्रूरता परस्पर घुलेमिले हैं
थोड़ा-सा गर्व गहरी शर्म में डूबा है
लड़ने की उम्र जबकि बिना लड़े बीत रही है
इसमें किसी युद्ध से लौटने की यातना है
और ये वे आँखें हैं
जो बताती हैं कि प्रेम जिस पर सारी चीज़ें टिकी हैं
कितना कम होता जा रहा है

आत्ममुग्धता और मसखरी के बीच
कई तस्वीरों कि एक तस्वीर
जिसे मैं बार-बार खिंचवाता हूँ
एक बेहतर तस्वीर खिंचने की
निरर्थक-सी उम्मीद में


बचपन की कविता / मंगलेश डबराल

जैसे जैसे हम बड़े होते हैं लगता है हम बचपन के बहुत क़रीब हैं ।
हम अपने बचपन का अनुकरण करते हैं । ज़रा देर में तुनकते हैं और
ज़रा देर में ख़ुश हो उठते हैं । खिलौनों की दूकान के सामने देर तक
खड़े रहते हैं । जहाँ जहाँ ताले लगे हैं हमारी उत्सुक आँखें जानना चाहती
हैं कि वहाँ क्या होगा । सुबह हम आश्च्रर्य सेचारों ओर देखते हैं जैसे
पहली बार देख रहे हों ।

हम तुरंत अपने बचपन में पहुँचना चाहते हैं । लेकिन वहाँ का कोई
नक्शा हमारे पास नहीं है । वह किसी पहेली जैसा बेहद उलझा हुआ
रास्ता है । अक्सर धुँए से भरा हुआ । उसके अंत में एक गुफ़ा है जहाँ
एक राक्षस रहता है । कभी कभी वहाँ घर से भागा हुआ कोई लड़का
छिपा होता है । वहाँ सख़्त चट्टानें और काँच के टुकड़े हैं छोटे छोटे
पैरों के आसपास ।

घर के लोग हमें बार बार बुलाते हैं । हम उन्हें चिट्ठियाँ लिखते हैं ।
आ रहे हैं आ रहे हैं आएँगे हम जल्दी ।


माँ की तस्वीर / मंगलेश डबराल

घर में माँ की कोई तस्वीर नहीं
जब भी तस्वीर खिंचवाने का मौक़ा आता है
माँ घर में खोई हुई किसी चीज़ को ढूंढ रही होती है
या लकड़ी घास और पानी लेने गई होती है
जंगल में उसे एक बार बाघ भी मिला
पर वह डरी नहीं
उसने बाघ को भगाया घास काटी घर आकर
आग जलाई और सबके लिए खाना पकाया

मैं कभी घास या लकड़ी लाने जंगल नहीं गया
कभी आग नहीं जलाई
मैं अक्सर एक ज़माने से चली आ रही
पुरानी नक़्क़ाशीदार कुर्सी पर बैठा रहा
जिस पर बैठकर तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं
माँ के चहरे पर मुझे दिखाई देती है
एक जंगल की तस्वीर लकड़ी घास और
पानी की तस्वीर खोई हुई एक चीज़ की तस्वीर


तानाशाह / मंगलेश डबराल

तानाशाहों को अपने पूर्वजों के जीवन का अध्ययन नहीं करना पड़ता.
वे उनकी पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखते या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखते.

यह स्वत:स्फूर्त तरीके से होता है कि,हवा में बन्दूक की तरह उठे उनके हाथ या बँधी हुई मुठ्ठी के साथ

पिस्तौल की नोक की तरह उठी हुई अँगुली से,
कुछ पुराने तानाशाहों की याद आ जाती है,
या एक काली गुफ़ा जैसा खुला हुआ उनका मुँह इतिहास में,
किसी ऐसे ही खुले हुए मुँह की नकल बन जाता है.

वे अपनी आँखों में काफ़ी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करते हैं,
लेकिन क्रूरता एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है,
और इतिहास की सबसे क्रूर आँखों में तब्दील हो जाती है.

तानाशाह मुस्कराते हैं, भाषण देते हैं और भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं,
कि वे मनुष्य है, लेकिन इस कोशिश में उनकी भंगिमाएँ जिन प्राणियों से मिलती-जुलती हैं
वे मनुष्य नहीं होते.

तानाशाह सुन्दर दिखने की कोशिश करते हैं,
आकर्षक कपड़े पहनते हैं,
बार-बार सज-धज बदलते हैं,
लेकिन यह सब अन्तत: तानाशाहों का मेकअप बनकर रह जाता है.

इतिहास में कई बार तानाशाहों का अन्त हो चुका है,
लेकिन इससे उन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता
क्योंकि उन्हें लगता है वे पहली बार हुए हैं.


छुओ / मंगलेश डबराल

उन चीजों को छुओ
जो तुम्हारे समाने टेबल में रखी है
घड़ी कलमदान एक पुरानी चिट्ठी
बुद्ध की प्रतिमा
ब्रेटोलट ब्रेस्ट
चेग्वेरा की तस्वीरें
दराज खोलकर उसकी पुरानी उदासी को छुओ

एक खाली कागज को छुओ
शब्दों की अंगुलियों से
वैनगोग की पेंटिंग के स्थिर जल को
एक कंकड़ की तरह छुओ
जो उस पर जीवन की हलचल शुरू कर देता है।

अपने माथे को छुओ
और देर तक उसे थामे रहने में
शर्म महसूस मत करो

छूने के लिए जरूरी नहीं
कोई बिल्कुल पास मैं बैठा हो
दूर से भी छूना सम्भव है
उस चिड़िया की तरह
दूर से ही जो अपने अंडों को सेती रहती है

कृपया छुएं नहीं
या छूना मना है
जैसे वाक्यों पर विस्वास मत करो
यह लम्बे समय से चला आ रहा एक षड्यन्त्र है

तमाम धर्म गुरु ध्वजा, पताका, मुकुट, उत्तरीय धारी बमबाज जंगखोर सबको एक दूरसे से दूर रखने के पक्ष में हैं
वे जितनी गंदगी जितना मलवा उगलते हैं
उसे छू कर ही साफ किया जा सकता है
इसलिए भी छुओ
भले ही इससे चीजें उलट पुलट हो जाएं

इस तरह मत छुओ जैसे
जैसे भगवान, महंत, मठाधीश, भक्त , चेले
एक दूसरे के सर और पैर छूते हैं

बल्कि ऐसे छुओ
जैसे लम्बी घासें चांद तारों को छूने छूने को होती हैं
अपने भीतर जाओ और एक नमी को छुओ।
देखो वह बची हुई है या नहीं
इस निर्मम समय में


एक लोकगीत सुनकर / मंगलेश डबराल

वह बहुत मीठी धुन थी
दूर से एक स्त्री का स्वर गूँजता हुआ आता था
सुरीला सुखद और मार्मिक
ज़रूर वह लम्बे समय तक सँगीत सीखती रही होगी
मर्म पर छपते उन स्वरों के शब्द
आर्तनाद से भरे हुए थे
हे दीनानाथ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो
हे पाँच नामों वाले देवता इस बस्ती के नारायण
स्वीकार करो मेरे ख़ाली हाथों का यह नैवेद्य
मैं सुनती रहती हूँ सास-ससुर घर के लोगों के कुबोल
पता नहीं कहाँ से पुरखे चले आते हैं
और ताने देकर चले जाते हैं
पता नहीं किस गुनाह की सज़ा मुझे मिलती है

दूर से आ रही थी वह ध्वनि
नज़र नहीं आती थी उसकी गायक
लगता था सभी स्त्रियाँ उसे गा रहीं हैं
बिना चहरे की नामहीन
बहुत मीठी थी वह धुन
लेकिन उन शब्दों में भरी थी एक स्त्री की दासता
एक कातरता एक अभागेपन की ख़बर
वह गायन एक साथ मुग्ध करता और डराता था

स्त्रियाँ मीठे स्वरों में बाँचती हैं अपनी व्यथा
अपने अभागेपन की कथा
उसके भयानक शब्दों को सजाती-सँवारती हैं
उनमें आरोह-अवरोह-अलँकार के बेल-बूटे काढ़ती हैं
ताकि वे सुनने में अच्छे लगें
पूछती हैं दीनानाथों से
बताओ कौन से हैं मेरे गुनाह
जिनके लिए दी जा रही है मुझे सज़ा
दीनानाथ कोई जवाब नहीं देते
उनका यह अभागापन अलग से है ।


ग़ुलामी / मंगलेश डबराल

इन दिनों कोई किसी को अपना दुख नहीं बताता
हर कोई कुछ छिपाता हुआ दिखता है
दुख की छोटी-सी कोठरी में कोई रहना नहीं चाहता
कोई अपने अकेलेपन में नहीं मिलना चाहता
लोग हर वक्त घिरे हुए रहते हैं लोगों से
अपनी सफलताओं से ताक़त से पैसे से अपने सुरक्षादलों से
कुछ भी पूछने पर तुरंत हंसते हैं
जिसे इन दिनों के आम चलन में प्रसन्नता माना जाता है
उदासी का पुराना कबाड़ पिछवाड़े फेंक दिया गया है
उसका ज़माना ख़त्म हुआ
अब यह आसानी से याद नहीं आता कि आख़िरी शोकगीत कौन-सा था
आख़िरी उदास फ़िल्म कौन-सी थी जिसे देखकर हम लौटे थे

बहुत सी चीज़ें उलट-पुलट हो गयी हैं
इन दिनों दिमाग़ पर पहले क़ब्ज़ा कर लिया जाता है
ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करने के लिए लोग बाद में उतरते हैं
इस तरह नयी ग़ुलामियां शुरू होती हैं
तरह-तरह की सस्ती और महंगी चमकदार रंग-बिरंगी
कई बार वे खाने-पीने की चीज़ से ही शुरू हो जाती हैं
और हम सिर्फ़ एक स्वाद के बारे में बात करते रहते हैं
कोई चलते-चलते हाथ में एक आश्वासन थमा जाता है
जिस पर लिखा होता है “मेड इन अमेरिका’
नये ग़ुलाम इतने मज़े में दिखते हैं
कि उन्हें किसी दुख के बारे में बताना कठिन लगता है

और वे संघर्ष जिनके बारे में सोचा गया था कि ख़त्म हो चुके हैं
फिर से वहीं चले आते हैं जहां शुरू हुए थे
वह सब जिसे बेहतर हो चुका मान लिया गया था पहले से ख़राब दिखता है
और यह भी तय है कि इस बार लड़ना ज़्यादा कठिन है
क्योंकि ज़्यादातर लोग अपने को जीता हुआ मानते हैं और हंसते हैं
हर बार कुछ छिपाते हुए दिखाई देते हैं
कोई हादसा है जिसे बार-बार अनदेखा किया जाता है
उसकी एक बची हुई चीख़ जो हमेशा अनसुनी छोड़ दी जाती है।



मंगलेश डबराल
जन्म – 16 मई 1948 कापफलपानी, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड)
मृत्यु – 9 दिसम्बर 2020, दिल्ली

मंगलेश डबराल की कविताओं का भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्पानी, पोल्स्की और बल्गारी भाषाओं में भी अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कविता के अतिरिक्त वे साहित्य, सिनेमा, संचार माध्यम और संस्कृति के सवालों पर नियमित लेखन भी करते रहे। मंगलेश डबराल की कविताओं में सामंती बोध एव पूँजीवादी छल-छद्म दोनों का प्रतिकार है। वे यह प्रतिकार किसी शोर-शराबे के साथ नहीं बल्कि प्रतिपक्ष में एक सुंदर सपना रचकर करते हैं। उनका सौंदर्यबोध सूक्ष्म है और भाषा पारदर्शी।


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