शिप-ब्रेकिंग यार्ड में श्रमिकों के मुद्दों पर ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सुधारात्मक उपायों के आदेश दिए

ख़राब हैं मैन्युअल मजदूरों के कामकाज की परिस्थितियों और पर्यावरण की स्थिति

नई दिल्ली: गुजरात के अलंग शिप-ब्रेकिंग फैसिलिटी में मैन्युअल मजदूरों के कामकाज की ख़राब परिस्थितियों और सामान्य तौर पर पर्यावरण की स्थिति का संज्ञान लेते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शुक्रवार 27 नवंबर को अपने आदेश में सुधारात्मक उपायों को सुझाने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल के गठन के निर्देश दिए हैं। इन सिफारिशों को गुजरात मेरीटाइम बोर्ड को अपने मौजूदा शिप-ब्रेकिंग फैसिलिटी में पर्यावरणीय मंजूरी देते समय नियमों एवं शर्तों की सूची में शामिल करना होग।

ट्रिब्यूनल ने फैसिलिटी क्षेत्र में मौजूदा यार्डों के उन्नयन के निर्देश भी दिए हैं और इसके साथ ही तटीय क्षेत्रों में शिप-ब्रेकिंग गतिविधियों से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के नियमित तौर पर निगरानी किये जाने के निर्देश दिए हैं। इसने केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओइएफ एंड सीसी) को सालभर में दो बार इन निर्देशों के तहत निगरानी बनाए रखने के निर्देश दिए हैं।

ट्रिब्यूनल द्वारा ये निर्देश मुंबई स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था, कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट द्वारा दायर किये गए एक आवेदन को निपटाने के दौरान जारी किये गए थे, जिसने विस्तार परियोजना के लिए प्रदान की गई पर्यावरणीय मंजूरी और तटीय नियमन क्षेत्र (सीआरजेड) की मंजूरी को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता की प्राथमिक आपत्ति इस बात को लेकर थी कि शिप-ब्रेकिंग के लिए अलंग फैसिलिटी में जिस ‘बीचिंग पद्धति’ का इस्तेमाल किया जा रहा था, वह पर्यावरण एवं समुद्री जैव विविधता के लिए असुरक्षित होने के साथ-साथ बेहद जोखिम भरा है।

न्यायाधिकरण की एक चार-न्यायाधीशों की पीठ- जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल, न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्यों में सत्यवान सिंह गर्ब्याल और नगीन नंदा को हालाँकि इस चुनौती में कोई योग्यता देखने को नहीं मिली। जबकि पिछले 40 वर्षों से अलंग में शिप-ब्रेकिंग गतिविधियाँ जारी हैं, जिसके चलते इस क्षेत्र का पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। हालाँकि पीठ का कहना है कि इस क्षेत्र की तटीय पारिस्थितिकी पर शिप-ब्रेकिंग गतिविधियों से पड़ने वाले प्रभाव की जाँच को समय-समय पर निगरानी किये जाने की आवश्यकता है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा है “हालाँकि हम [एम्ओईएफ एंड सीसी-कमीशंड] की रिपोर्ट के निष्कर्षों से व्यापक तौर पर सहमत हैं कि इस परियोजना से किसी भी प्रकार के गंभीर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है, लेकिन हमारी राय में आम तौर पर पर्यावरण एवं जन स्वास्थ्य के साथ-साथ श्रमिकों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए इसमें सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। एम्ओइएफ एंड सीसी द्वारा इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक पांच सदस्यीय समिति को नियुक्त कर इस पहलू को स्वतंत्र तौर पर परखा जा सकता है, जिसमें व्यावसायिक स्वास्थ्य संस्थान, स्वास्थ्य मंत्रालय और श्रम मंत्रालय शामिल हैं। इस प्रकार की समिति को एक महीने के भीतर गठित किया जाना चाहिए जो अपनी रिपोर्ट को छह महीने के भीतर दे सकती है। इस परियोजना के प्रस्तावक [गुजरात मेरीटाइम बोर्ड] को इन सिफारिशों पर कार्यवाही करने की जरूरत है, जिसे ईसी [पर्यावरणीय मंजूरी] की शर्तों के तौर पर अमल में लिया जाएगा।”

एमओईएफ एंड सीसी की ओर से जारी अध्ययन को इस फैसले में उद्धृत किया गया था, जिसे राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (एनआईओ) एवं वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अन्सुसंधन (सीएसआईआर) द्वारा पिछले साल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों के तहत आयोजित किया गया था। इस अध्ययन को ट्रिब्यूनल के समक्ष जुलाई 2020 को प्रस्तुत किया गया था, जिसमें शिप-ब्रेकिंग के बीचिंग पद्धति जैसे बेहद अवैज्ञानिक तौर-तरीकों को इस्तेमाल में लाने से होने वाले दुष्प्रभावों को लेकर याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की जाँच करने के लिए आयोजित किया गया था। आरोप में कहा गया था कि बीचिंग पद्धति को इस्तेमाल में लाये जाने के कारण गुजरात में अलंग-सोसिया तटों पर समुद्री पर्यावरण एवं जलीय जैव विविधता प्रदूषित हो रही है।

पीठ ने अपने 52 पेज के फैसले में जोड़ते हुए सुझाव दिया है कि “अन्य बातों के साथ समिति सीएसआईआर-एनआईओ रिपोर्ट के निष्कर्षों का उद्धरण लेते हुए सुधारात्मक कार्यवाई को सुझा सकती है, जिसमें अधिकांश श्रमिकों के रहने के क्षेत्र की दयनीय स्थिति और अपर्याप्त आवासीय सुविधायें हैं।” गुजरात के भावनगर जिले में 1982 के बाद से ही शिप-ब्रेकिंग फैसिलिटी अपने अस्तित्व में है। यहाँ पर 8,000 से अभी अधिक की संख्या में अबतक विभिन्न श्रेणियों के समुद्री जहाजों को ‘बीचिंग’ पद्धति से तोड़ने का काम किया जा चुका है। साल 1991 में पहली बार तटीय नियमन क्षेत्र (सीआरजेड) की अधिसूचना जारी किये जाने से काफी पहले से ही इसका परिचालन चल रहा था।

एमओईएफ एंड सीसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि क्रोमियम, मैंगनीज, लोहा, कोबाल्ट, निकेल, ताँबा, जस्ता, आर्सेनिक, कैडमियम सहित लीड की उच्चा मात्रा शिप-ब्रेकिंग फैसिलिटी के पास और तटवर्ती एवं समुद्री किनारे के पानी में पाई गई हैं। हालाँकि रिपोर्ट ने निष्कर्ष के तौर पर कहा है कि “समुद्रीय पर्यावरण पर शिप-ब्रेकिंग गतिविधियों का कोई ख़ास प्रभाव देखने को नहीं मिला है।” तलछट के नमूनों में आर्सेनिक, पारे और शीशे के अलावा क्रोमियम, ताँबा, निकल एवं जिंक सहित भारी धातुओं की मौजूदगी भी पाई गई है। याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट को ख़ारिज करते हुए कहा था कि एमओईएफ एंड सीसी अध्ययन के दौरान पारे की मौजूदगी को जानने के लिए, जो कि शिप-ब्रेकिंग गतिविधियों में भारी मात्रा में निकलता है, के परीक्षण के लिए कभी भी पानी के नमूने को नहीं लिया गया था।

ट्रिब्यूनल को याचिकाकर्ता के सीआरजेड I (बी) क्षेत्र के लिए वर्गीकृत क्षेत्र में शिप-ब्रेकिंग गतिविधि जारी रखने सम्बंधी निषेधाज्ञा के दावे में भी कोई योग्यता नजर नहीं आई है। एमओईएफ एंड सीसी द्वारा किये गए अध्ययन के साथ-साथ नवंबर 2016 में जारी पर्यावरणीय मंजूरी पत्र में कहा गया था कि अलंग में चल रही संपूर्ण शिप-ब्रेकिंग गतिविधि पूरी तरह से सीआरजेड I (बी), सीआरजेड III एवं सीआरजेड-IV क्षेत्र में वर्गीकृत है और प्रमुख गतिविधियाँ सीआरजेड I (बी) क्षेत्र में चल रही हैं।

अपने निष्कर्षों पर पहुँचने के लिए ट्रिब्यूनल की पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के साल 2007 में जारी एक फैसले में की गई टिप्पणियों का सहारा लिया था, जिसमें ‘लेडी ब्लू’ नाम के एक फ़्रांसिसी जहाज को अलंग शिपयार्ड में तोड़े जाने पर अनुमति दिए जाने को लेकर विचार किया गया था। सभी सम्बंधित मुद्दों पर विचार करने के बाद शीर्षस्थ अदालत ने अलंग में इस फ़्रांसिसी जहाज को तोड़े जाने को लेकर अपनी मंजूरी दे दी थी। अलंग में यह मौजूदा सुविधा 167 रीसाइक्लिंग भूखंडों में है, जो कि अलंग और सोसिया गाँवों के बीच की 10 किमी लम्बाई में बना हुआ है। गुजरात मेरीटाइम बोर्ड की ओर से इन भूखंडों को प्राइवेट संचालकों को पट्टे पर दिया जाता है। इसके विस्तार परियोजना के जरिये 15 अतिरिक्त नए भूखंडों, जिसमें दो सूखे जहाजी मालघाट होंगे जिसमें समुद्री जहाजों को तोड़ने से पूर्व प्री-क्लीनिंग के लिए रखे जायेंगे। इसमें से एक में अपशिष्ट तेल के प्रबंधन की व्यवस्था की जाएगी और एक में भस्मक स्थापित किया जायेगा। इस विस्तारित परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1,630 करोड़ के होने की संभावना है।

आदेश में आगे कहा गया है “प्रदूषण में कमी लाने एवं सुरक्षा को बढ़ाने के लिए कई यार्डों को अपग्रेड किये जाने की जरूरत है। आगे के लिए अनुशंसा यह है कि रीसाइक्लिंग यार्डों के अपग्रेडेशन किये जाने की जरूरत है और हर साल समय-समय पर अलंग के समुद्री जीव-जंतुओं में धातुओं के जैव-संचय सहित समुद्री जैव विविधता और तटीय पारिस्थितिकी की निगरानी किये जाने की आवश्यकता है। उप-ज्वार और अन्तः-ज्वारीय सहित तटीय पारिस्थितिकी पर किसी भी प्रकार के प्रतिकूल प्रभावों को सम्बंधित प्राधिकरण के नोटिस में लाये जाने की आवश्यकता है ताकि इस क्षेत्र की भविष्य की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाये जा सकें।”

शिप-ब्रेकिंग के काम को, जिसे व्यापक तौर पर अत्यधिक प्रदूषण पैदा करने वाला और पर्यावरण की दृष्टि से खतरनाक गतिविधि के तौर पर माना जाता है, को अब विकसित देशों द्वारा अपने यहाँ संचालित नहीं किया जाता है। इसके साथ ही ‘बीचिंग’ पद्धति से शिप-ब्रेकिंग के काम को, जिसे अन्तः-ज्वारीय क्षेत्र में ही कर पाना संभव है को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे चुनिन्दा देशों ने ही अपने तटों इस औद्योगिक गतिविधि को जारी रखने की अनुमति दे रखी है। इस विस्तार परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी दिए जाने को कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट द्वारा ग्रीन ट्रिब्यूनल में चुनौती इस तथ्य के आधार पर दी गई थी कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रक्रिया के दौरान बीचिंग पद्धति से शिप-ब्रेकिंग से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कभी भी नहीं किया गया था।

कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट ने इस परियोजना के प्रस्तावक गुजरात मेरीटाइम बोर्ड को पर्याप्त तौर पर विस्तारित परियोजना के यथोचित सामाजिक प्रभाव के आकलन को संचालित न करने के लिए भी घसीटा था। ट्रस्ट की याचिका में आरोप लगाया था था कि मंजूरी दिए जाने से पहले प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारकों को लेकर किसी भी प्रकार की आधारभूत निगरानी अध्ययन को नहीं अपनाया गया था। यह भी आरोप लगा था कि ईआईए प्रक्रिया के दौरान समुचित जन सुनवाई भी नहीं संचालित की गई थी। कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट द्वारा पेश किये गए इन उपरोक्त तथ्यों की रोशनी के आधार पर ग्रीन ट्रिब्यूनल ने एमओईएफ &सीसी को पर्यावरण संबंधी प्रभाव आकलन को संचालित करने के आदेश दिए थे।

कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट के कार्यकारी ट्रस्टी देबी गोयनका के अनुसार “अलंग में मौजूदा फैसिलिटी में ‘बीचिंग’ पद्धति जो कि शिप-ब्रेकिंग के लिए सबसे असुरक्षित पद्धति है, को उपयोग में लाया जाता है, क्योंकि लागत के मामले यह सबसे सस्ता उपाय है। उच्च ज्वार के दौरान कबाड़ पड़े समुद्री जहाज़ों को समुद्र तटों पर खींचा जाता है और जब ज्वार शांत हो जाता है तो इन्हें तोड़ने का काम किया जाता है। मलबे के इस ढेर से काम की वस्तुओं को निकाल लिया जाता है जबकि इसमें से निकलने वाला बहुत सा जहरीला कचरा वापस समुद्र में जाकर पानी और समुद्री जैव विविधता को प्रदूषित और जहरीला बनाता है।” वे आगे कहते हैं कि यह बेहद चिंता का विषय है कि शिप-ब्रेकिंग के लिए आज कई विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन इस सबके बावजूद सबसे खतरनाक विकल्पों को शिप-ब्रेकिंग के लिए चुने जाने का क्रम जारी है।”

(अयस्कांत दास, न्यूज़ क्लिक से साभार)

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