अब औद्योगिक पूँजीपति बैंकों के भी मालिक होंगे

भारतीय रिज़र्व बैंक की एक कमेटी ने की सिफारिश

निजी क्षेत्र के बैंकों में मालिकाना हक संबंधी गाइडलाइंस और कॉरपोरेट स्ट्रक्चर को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक के इंटर्नल वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट को आरबीआई ने जारी किया है। …कैसे यह बनेगा अंबानी/टाटा जैसों के मुनाफे का जरिया? …बात रहे हैं वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक मुकेश असीम

रिजर्व बैंक की एक कमिटी ने सिफ़ारिश की है कि औद्योगिक पूँजीपतियों को बैंक मालिक बनने की अनुमति दी जाये। गौरतलब है कि बैंक और औद्योगिक पूंजी के मेल द्वारा बनी वित्तीय पूंजी के युग में भी पूंजीवादी देश अभी तक इनके ऐसे सम्पूर्ण विलय या एकाकार होने में बाधा लगाते आए हैं।

भारतीय पूंजीवाद के शैशव काल में ऐसा होता था पर तदजनित समस्याओं के कारण राष्ट्रीयकरण के द्वारा इसे समाप्त किया गया। कुछ साल पहले औद्योगिक पूँजीपतियों को पेमेंट बैंक चलाने की अनुमति दी गई थी पर वह कामयाब नहीं रहे। अब सिफ़ारिश है कि इन्हें ‘छोटे’ पर सम्पूर्ण बैंक में बदलने की अनुमति दे दी जाये, ‘छोटे’ बाद में ‘बड़े’ बन जाएंगे, यह कहने की तो जरूरत ही नहीं!

इसका अर्थ क्या है? अभी छोटी-बड़ी पूंजी रखने वाले जो खुद उद्योग चलाने में असमर्थ हैं अपनी पूंजी को बैंक में जमा करते हैं जो इससे औद्योगिक पूंजीपति को कर्ज देते हैं। औद्योगिक पूंजीपति इससे श्रमिकों की श्रमशक्ति खरीदकर जो सरप्लस वैल्यू या मुनाफा कमाते हैं उसका एक हिस्सा बैंक को ब्याज देते हैं जिसमें से एक हिस्सा बैंक पूंजीपति रखकर शेष जमा करने वालों को बांटता है। यही मूलतः बैंक कारोबार है।

अब बढ़ते आर्थिक संकट और गिरती मुनाफा दर के दौर में अंबानी/टाटा खुद के बैंक के जरिये इस बिचौलिये को समाप्त कर अपनी मुनाफा दर को बढ़ाने का प्रयास करेंगे। पर अब तक नियम विपरीत ऐसा करने वाले यस और पीएमसी बैंक के उदाहरण बताते हैं कि गलाकाट पूंजीवादी होड़ में उद्योग और बैंक के एक साथ डूबने का जोखिम और भी बढ़ जायेगा जिस पर मौजूदा नियम कुछ हद तक रोक लगाते हैं। इससे मध्यम वर्ग के निवेशकों और छोटे पूंजीपति मालिकों की बरबादी की रफ्तार और तेज होगी, आखिर इनकी ही पूंजी तो बैंक में जमा रहती है।

-साथी मुकेश असीम के वॉल से साभार

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