कैसे लुट गया किसानों को सुरक्षा देने वाली पीएम फसल बीमा योजना का कारवां?

किसानों से कहीं ज्यादा राज्य सरकारें फसल बीमा योजना से पीछा छुड़ाने में लगी हैं

केंद्र सरकार ने 2016 में पूरे जोर-शोर से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को रिलॉन्च किया ताकि किसानों को मौसम की मार से होने वाले नुकसान से सुरक्षा दी जा सके. लेकिन चार साल बाद इस योजना को ही बीमा की जरूरत दिखाई दे रही है. आज किसान ही नहीं, बल्कि राज्य सरकारें तक इससे पीछा छुड़ाने लगी हैं. यहां तक कि गुजरात सरकार ने भी इस साल पीएम फसल बीमा योजना को लागू करने से इनकार कर दिया है. इससे पहले पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, झारखंड, तेलंगाना और बिहार फसल बीमा योजना को लागू करने से पीछे हट चुके हैं. इसकी क्या वजह है, यह जानने के लिए संसद में सरकार द्वारा दिए गए जवाब को देखना होगा.

संसद के मानसून सत्र में राज्य सभा में सांसद जी.सी. चंद्रशेखर, प्रताप सिंह बाजवा और डॉ अमि याज्ञिक ने फसल बीमा योजना को लेकर कुल पांच सवाल पूछे थे. इनमें (1) पीएम फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत 2016 से अब तक रबी और खरीफ सीजन के लिए बीमा कराने वाले किसानों की कुल संख्या, (2) 2016-17 से अब तक बीमा कंपनियों को मिले प्रीमियम की राज्यवार जानकारी, (3) 2016-17 से अब तक बीमा कंपनियों द्वारा किसानों को दिए गए क्लेम की राशि का सवाल शामिल था. इसके अलावा (4) 2016-17 से अब तक किसानों का बकाया फसल बीमा क्लेम और (5)किसानों के फसल बीमा क्लेम मिलने में देरी की वजह भी पूछी थी.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने इन सवालों का 23 सितंबर को काफी विस्तार से लिखित जवाब दिया है. इसमें राज्यवार ब्यौरा शामिल है. इसके मुताबिक खरीफ 2016 में बीमा कंपनियों को चार करोड़ आठ लाख किसानों ने फसल बीमा कराया. इसके लिए कंपनियों को 15 हजार 924 करोड़ रुपये प्रीमियम दिया गया, जबकि किसानों को 10 हजार 557 करोड़ रुपये क्लेम दिया गया. इस दौरान 4.9 करोड़ रुपये फसल बीमा का भुगतान नहीं हो पाया. रबी 2016-17 बीमित किसानों की संख्या एक करोड़ 76 लाख थी, जबकि बीमा कंपनियों को 5,738 करोड़ रुपये प्रीमियम का भुगतान हुआ. किसानों को कुल 6,193 करोड़ रुपये क्लेम मिला, जबकि 14.5 करोड़ रुपये क्लेम बकाया रहा. इसी तरह खरीफ 2017 में 3 तीन करोड़ 58 लाख किसानों ने फसल बीमा कराया. बीमा कंपनियों को कुल प्रीमियम 18 हजार 416 करोड़ रुपये मिला और क्लेम का भुगतान 18 हजार 137 करोड़ रुपये रहा. इस सीजन में फसल बीमा क्लेम में 3.7 करोड़ रुपये बकाया रहा.

फसल बीमा योजना में रबी 2017-18 तक क्लेम भुगतान के आंकड़े तो मामूली हैं, लेकिन खरीफ 2018 के बाद के आकंड़े बताते हैं कि जैसे पूरी योजना ही पटरी से उतर गई हो. उदाहरण के लिए, खरीफ 2018 में 3 करोड़ 45 लाख किसानों ने फसल बीमा कराया, कंपनियों को 20 हजार 822 करोड़ रुपये प्रीमियम मिला, क्लेम का भुगतान 18 हजार 522 करोड़ रुपये रहा, जबकि बीमा क्लेम बकाया बढ़कर लगभग 880 करोड़ रुपये हो गया. लेकिन खरीफ 2019 आते-आते तो फसल बीमा के बकाया क्लेम ने सारे रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर डाले. इस साल फसल बीमा क्लेम बकाया सात हजार 337 करोड़ रुपये पहुंच गया. रबी 2019-20 में फसल बीमा क्लेम का बकाया 2074 करोड़ रुपये रहा. सरकार ने अपने जवाब में खरीफ 2018 के दावों की पूरी सूचना न होने और रबी 2019-20 के नामांकन और दावों को अंतिम रूप नहीं दिए जाने की भी जानकारी दी है.

केंद्र सरकार की यह फ्लैगशिप योजना बीच रास्ते में ही क्यों हांफने लगी? इसे समझने के लिए टेबल-3 देखें. केंद्र सरकार ने अपने जवाब में पीएम फसल बीमा योजना के तहत क्लेम लंबित होने की वजह भी बताई हैं. इसके मुताबिक, सबसे बड़ी वजह फसल बीमा प्रीमियम में राज्य सरकारों द्वारा अपने हिस्से के प्रीमियम का भुगतान न करना है. खरीफ 2017 में अकेले गुजरात राज्य सरकार ने प्रीमियम में अपना हिस्सा नहीं दिया था, वही संख्या रबी 2019-20 तक शेयर न देने वाले राज्यों की संख्या बढ़कर आठ हो गई. इनमें गुजरात, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. इसके अलावा रबी 2019-20 में आंध्र प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, मेघालय और पश्चिम बंगाल ने योजना को लागू ही नहीं किया. यानी किसानों को फसल बीमा के जरिए मिलने वाली सुरक्षा खत्म हो गई.

अब सवाल उठता है कि आखिर राज्य सरकारें क्यों प्रीमियम का भुगतान नहीं कर पाई? बाद के दिनों में इसकी दो वजहें सामने आईं. एक तो राज्यों को प्रीमियम सब्सिडी में केंद्र के साथ आधी हिस्सेदारी भारी पड़ने लगी, दूसरा फसल बीमा क्लेम के भुगतान में कंपनियों की मनमानी ने भी बड़ी भूमिका निभाई. बीते एक साल में जिन राज्य सरकारों ने पीएम फसल बीमा योजना से खुद को अलग किया है, उन सभी ने दलील दी है कि वह प्रीमियम सब्सिडी में अपने हिस्से का जितना भुगतान करती हैं, कंपनियां किसानों को उतना क्लेम भी नहीं देती हैं. इसमें फसल बीमा कंपनियों की मनमानी सबसे प्रमुख वजह है.

हालांकि, इस साल की शुरुआत में केंद्र सरकार ने बैंक से फसल कर्ज के साथ फसल बीमा योजना की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. यानी किसान चाहे तो फसल बीमा कराए और न चाहे तो बैंक को प्रीमियम काटने से मना कर दे. पीएम फसल बीमा योजना के तहत किसानों को खरीफ सीजन के लिए अधिकतम दो फीसदी, रबी सीजन के लिए डेढ़ फीसदी और बागवानी फसलों के लिए पांच फीसदी प्रीमियम देना होता है. इसके बाद बचे प्रीमियम को केंद्र और राज्य सरकारें आधा-आधा सब्सिडी के तौर पर देती हैं. पूर्वोत्तर राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 का है. फसलों का प्रीमियम उनके जोखिम के आधार पर होता है.

फसल बीमा योजना के स्वैच्छिक होने के बाद फसल बीमा कराने वाले किसानों की संख्या में भी गिरावट आई है. इसका असर फसल बीमा के लिए प्रीमियम दरों पर पड़ा है. उनमें भारी इजाफा हुआ है. इसी वजह से गुजरात सरकार ने एक साल के लिए फसल बीमा योजना को लागू करने से इनकार कर दिया. वहीं, मध्य प्रदेश में सरकार को कम प्रीमियम रेट पाने के लिए बार-बार फसल बीमा के लिए टेंडर रद्द करने पड़े.

जाहिर है कि किसान जहां फसल बीमा क्लेम न मिलने से, वहीं राज्य सरकारें प्रीमियम सब्सिडी के खर्च की वजह से पीएम फसल बीमा योजना से भाग रही हैं. इसका सबूत 23 सिंतबर को ही राज्य सभा में सासंद वी विजयसाई रेड्डी को दिए गए जवाब में मिलता है. इसमें कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने राज्यों में फसल बीमा सब्सिडी के बकाया पैसे की जानकारी दी है. इसके मुताबिक फसल बीमा सब्सिडी का आंध्र प्रदेश पर 1302 करोड़, गुजरात पर 858 करोड़, राजस्थान पर 538 करोड़, मध्य प्रदेश पर 470 करोड़ रुपये, तेलंगाना पर 467 करोड़ और झारखंड पर 357 करोड़ रुपया बकाया है. (देखें- टेबल-4)

अपने इसी जवाब में केंद्र सरकार ने यह भी साफ किया है कि वह राज्यों पर बकाया फसल बीमा प्रीमियम का बोझ नहीं उठाने जा रही है. जाहिर है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों को इसके लिए दोषी ठहरा सकती है, लेकिन सवाल है कि आखिर राज्य सरकारों की माली हालत इतनी कैसे खराब हो गई कि वह अपने हिस्से की सब्सिडी का बोझ नहीं उठा पा रही हैं? अगर केंद्र सरकार इस योजना के जरिए किसानों को सुरक्षा देने के मुद्दे पर गंभीर नहीं हुई तो जिस तरह से मौसम की मार खेती को चोट पहुंचा रही है, उसमें किसानों की खुशहाली लाना तो दूर, उसकी तस्वीर बनाना भी मुश्किल होगा.

(ऋषि कुमार सिंह, संसदनामा से साभार)

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