विश्वविद्यालयों-कॉलेजों में फीस की मनमानी पर रोक लगे

समाज के संवेदनशील नागरिकों को आगे आना होगा!

दिल्ली की एक होनहार छात्रा ऐश्वर्या की खुदकुशी के बाद राजधानी कॉलेज में फीस में कटौती के समाचारों के बीच शिक्षा जगत के मनमानेपन और शिक्षा के बाजारीकरण से पैदा परिस्थिति व आम मेहनतकश के बच्चों को शिक्षा से वंचित करने के साजिशों पर सवाल फिर से गहरा गए हैं। ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक साथी रविन्द्र गोयल का यह पोस्ट गौरतलब है….

होनहार छात्रा ऐश्वर्या की आर्थिक तंगी के कारण आत्म हत्या की दुखद खबर और उसको न्याय दिलाने पर जारी आन्दोलन के बीच खबर आई है कि राजधानी कॉलेज द्वारा छात्रों की फीस में 2010 रुपये की कटौती की है। यह एक अच्छी खबर है और इसके लिए राजधानी कॉलेज बधाई का पात्र है।

लेकिन यदि नेट पर उपलब्ध जानकारी को सही माना जाये तो इस कटौती के बाद भी राजधानी कोलेज में फर्स्ट इयर के छात्र को 9000 रुपये के करीब फीस देनी होगी। दिलचस्प बात यह है की इस राशि में सालाना ट्यूशन फीस केवल 180 रुपये है और एडमिशन फीस केवल 5 रुपये हैं। 185 रुपये से ऊपर ली जाने वाली शेष (8000 से ऊपर) राशि विभिन्न मदों में लिए जाने वाले चार्जेज की है।

मैं यह तो नहीं कह सकता की इसमें कितने चार्जेज वाजिब हैं और कितने गैर वाजिब। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि डीयू के विभिन्न कॉलेजों द्वारा ट्यूशन फीस और एडमिशन फीस के अलावा विभिन्न मदों में ली जाने वाली राशि की जाँच होनी चाहिए ताकि इस देश के आम नागरिक भी पूर्णतया राज्य पोषित शिक्षण संस्थाओं में पढ़ सके।

मेरे पास अन्य कोलेजों द्वारा इस साल ली जाने वाली फीस की कोई जानकारी नहीं है, लेकिन 2018–19 की ली जाने वाली फीस का मेरा विश्लेषण बताता है कि उस साल बीए फर्स्ट इयर के छात्र के लिए सबसे कम फीस 3046 रुपये सालाना थी, तो अधिकतम फीस 38105 रुपये सालाना थी। बाकि कॉलेज इन दो सीमाओं के भीतर फीस वसूलते थे।

जब सरकार इन संस्थाओं का सभी खर्चा देने को बाध्य है, ऐसे में इस मनमानी फीस का एक ही तर्क समझ आता है कि, चारों तरफ निजीकरण के बढ़ते शोर में, यूनिवर्सिटी अफसर, प्रिंसिपल्स और शिक्षकों के एक हिस्से ने फीस बढ़ोतरी के माध्यम से भ्रष्टाचार और हेरा फेरी का एक चोर दरवाज़ा ढूंढ लिया है।

दुखद है कि मनमानी ली जा रही फीस या इस पर लगाम लगे विश्वविद्यालय के आम छात्र और शिक्षक और कर्मचारी की चिंता का विषय नहीं है। मध्यम वर्ग से आने वाले ये तत्व आम समाज से कितना कटे हुए हैं इसका यह सबूत है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रगतिशील छात्र/शिक्षक/कर्मचारी और अन्य समाज के जागरूक तबके अब तो इस सवाल के महत्व को समझेंगे, मनमानी फीस पर लगाम के सवाल को मुस्तैदी से उठाएंगे। और माँग करेंगे की डीयू में मनमानी फीस का चलन बंद हो, नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब मज़दूर किसान और मेहनतकश तबकों के बच्चे विश्वविद्यालय की शिक्षा से बिलकुल बाहर खदेड़ दिए जायेंगे।

-साथी रविन्द्र गोयल की वॉल से

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