26 नवम्बर की देशव्यापी आम हड़ताल में शामिल हो!

मज़दूर सहयोग केंद्र का समर्थन- इसे निर्णायक संघर्ष में बदलने का आह्वान!

केंद्र सरकार कि पूँजीपरस्त, मज़दूर व जनविरोधी नीतियों के खिलाफ 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 26 नवंबर 2020 को अखिल भारतीय आम हड़ताल की घोषणा की है। मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) 18 अक्टूबर से 18 दिसंबर तक दो माह का ‘मज़दूर संघर्ष अभियान’ चला रहा है। हड़ताल के समर्थन के साथ मासा ने इसे अनुष्ठान की जगह निरंतर, जुझारू और निर्णायक लड़ाई में तब्दील करने का आह्वान किया है। मासा के घटक ‘मज़दूर सहयोग केंद्र’ ने भी समर्थन के साथ पर्चा जारी किया है।

मज़दूर सहयोग केंद्र द्वारा जारी पर्चा-

केंद्र सरकार की पूँजीपरस्त, मज़दूर व जनविरोधी नीतियों के खिलाफ

26 नवम्बर, 2020 की अखिल भारतीय आम हड़ताल को सफल बनाओ!

आज एक ऐसा भयावह दौर है, जब मज़दूर-मेहनतकश आवाम का कोई भी हिस्सा सुरक्षित नहीं रह गया है। मज़दूरों- किसानों-बेरोजगारों-महिलाओं की एक बड़ी आबादी मोदी की लगातार जय-जयकार करती रही और तबाही का सौगात मिलता रहा। कोरोना संकट के बहाने देश की मज़दूर-मेहनतकश आवाम के खिलाफ एक के बाद एक हमले घातक रूप से तेज होते गए और अब मालिकों के मन मुताबिक मज़दूरों के लंबे संघर्षों से हासिल श्रम कानूनी अधिकार खत्म हो गये।

खेती-किसानी को कारपोरेट मुनाफे के हवाले कर दिया गया। आम जनता के खून पसीने से खड़े सार्वजनिक और सरकारी उद्यमों को देशी-विदेशी लुटेरों के हाथों में सौंपने का काम और तेज हो गया। बेरोजगारी अपने चरम पर पहुँच गई, महँगाई रोज-बा-रोज रिकॉर्ड तोड़ रही है। स्थाई नौकरी सपना बनने जा रहा है। यह है मोदी सरकार का कारनामा।

मोदी सरकार ने पिछले तीन दशक से जारी उदारीकरण की पूँजीपरस्त नीतियों को बेखौफ तेजी से लागू करते हुए एक मुकाम पर पहुँचा दिया है। तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए मोदी सरकार ने 44 श्रम कानूनों को खत्म करके तीन बची हुई श्रम संहिताओं को भी धक्काजोरी से पारित कर दिया और तेजी से उसकी नियमावली बनाने में जुट गई। दूसरी ओर किसानों के खिलाफ 3 कृषक बिल लाकर तबाही के एक और दस्तावेज पर मोहर लगा दिया है। रेलवे, ऑर्डिनेंस, कोइलरी से लेकर बिजली, रोडवेज, बैंक, बीमा सब कुछ निजी लुटेरों के हाथों में सौंपने का काम तेजी से हो रहा है।

मोदी सरकार की जल्दबाजी का यह नमूना ही था कि कोविड-19/लॉकडाउन के विकट दौर में ही मोदी सरकार इन कानूनों को मालिकों के हित में पारित करने में सक्रिय रही। तमाम विरोधों के बाद जब यह नहीं हो सका तो केन्द्र सरकार के इशारे पर गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से लेकर पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, उड़ीसा तक की सरकारों ने हमला तेज कर दिया। इसमे भाजपाई ही नहीं, गैर भाजपाई कांग्रेसी, एनसीपी, शिवसेना आदि की सरकारें भी शामिल हैं, जिन्होंने मज़दूरों को बंधुआ बनाने के इस कार्य को ही तेज गति दी।

देश की मेहनतकश आवाम का सबसे बड़ा हिस्सा, जो असंगठित क्षेत्र में है, उसकी स्थिति और भी ज्यादा भयावह हो चुकी है। रोजी रोटी का संकट, आजीविका का संकट विकट हो गया है। इसी के साथ स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था को भी पूरी तरीके से ध्वस्त कर दिया गया है। नई शिक्षा नीति के नाम पर शिक्षा के बुनियादी हक़ को मुनाफे के धन्धे में बदल दिया गया है।

ऑनलाइन शिक्षा के नाम पर गरीब मेहनतकश आवाम के बच्चों को शिक्षा से पूरी तरह से वंचित करने का सामान जुटाया गया है। शिक्षा को शत-प्रतिशत बहुराष्ट्रीय शिक्षा माफियाओं के हवाले कर दिया गया है और वैज्ञानिक शिक्षा के तन्त्र को ध्वस्त किया जा रहा है। इस तरह से शिक्षा का भगवाकरण और कारपोरेटीकरण एक साथ हो रहा है।

बेरोजगारी बेइंतहा बढ़ रही है और बेरोजगारों से भर्ती फार्म द्वारा उल्टे पैसा वसूला जा रहा है। 30 वर्ष की नौकरी या 50 साल की उम्र वाले सरकारी कर्मचारियों को जबरिया बाहर किया जा रहा है। इसी के साथ देश की जनता के ऊपर खतरनाक तरीके से भय का माहौल बनाने, दमन करने, फर्जी मुकदमा ठोकने, जेल में ठूंसने का काम भी गति पकड़ चुका है। जनता को बांटने के लिए धर्मोन्माद को चरम पर पहुँचा दिया गया है। संघ-भाजपा ने धर्म-जाति के नाम पर मानव को मानव का खतरनाक दुश्मन बना दिया है।

सोचो साथियों, भाजपा-संघ की जो मोदी सरकार अंधराष्ट्रवाद की आंधी बहाकर हमें बांट रही है, वही देश की पूरी अर्थव्यवस्था को, देश की संपदा को, यहाँ तक कि शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर दी है। यह कौन सी राष्ट्रभक्ति है कि कथनी में जनता के लिए राष्ट्रीयता का जुमला और वास्तविकता में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गुलामी!

आज एक विकट कठिनाई का दौर है। स्पष्ट रूप से दो वर्ग, दो धर्म, दो जातियां आमने सामने खड़ी हैं- एक तरफ देशी और विदेशी लुटेरों की पूरी जमात है, जिसके साथ मोदी सरकार खुलकर खड़ी है और जिसके हित में संविधान से परे जाकर सारी नीतियां व कानून बना रही है और दूसरी तरफ देश की बहुसंख्यक मेहनतकश आवाम, जिसके दम पर सब कुछ पैदा होता है, वही दमित और हमलों का शिकार है। इसलिए सीधे-सीधे मेहनतकश आवाम को अपने धर्म, अपने मजहब, अपनी जाति- मेहनतकश मज़दूर होने की जाति-धर्म को समझना होगा और वर्गीय एकता के साथ आर-पार के संघर्ष के लिए आगे आना होगा।

केंद्र सरकार कि पूँजीपरस्त, मज़दूर व जनविरोधी इन्हीं नीतियों के खिलाफ 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आगामी 26 नवंबर 2020 को अखिल भारतीय आम हड़ताल की घोषणा की है। आइए इसे सफल बनाएं। अनुष्ठान की जगह इसे जुझारू, निरंतरता में आगे बढ़ने वाले और निर्णायक लड़ाई में तब्दील करें।

इसी उद्देश्य से मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) 18 अक्टूबर से 18 दिसंबर तक दो माह का ‘मज़दूर संघर्ष अभियान’ चला रहा है और 19 दिसंबर, 2020 काकोरी कांड के शहीदी दिवस पर देशव्यापी प्रतिरोध कार्यक्रम की भी घोषणा की है।

आइए अपने हक-हकूक के इस संघर्ष को गति दें, आगे बढ़ें और मज़दूर वर्ग की मुक्ति के निर्णायक संघर्ष के लिए कमर कस लें।

  • मोदी सरकार की मज़दूर विरोधी 4 श्रम संहिताएँ निरस्त कराने के लिए; 
  • छँटनी-बेरोजगारी, निजीकरण, महँगाई, प्रवासी व असंगठित मज़दूरों के जीवन-आजीविका का संकट हल करने के लिए;
  • कोरोना महामारी का बोझ मज़दूरों और मेहनतकशों की पीठ पर डालने पर लगाम लगाने के लिए;
  • सभी जरूरतमंद लोगों को मुफ्त राशन देने की माँग पर;
  • श्रमिकों को लॉकडाउन के समय का वेतन देने की माँग पर;
  • देश की रेलवे, आर्डिनेंस फैक्ट्री, कोयला, पेट्रोलियम, बंदरगाह आदि को मुनाफाखोरों को बेचने के खिलाफ;
  • सभी मज़दूरों के यूनियन गठन करने के अधिकार को मजबूत करने के लिए;
  • ठेका व अन्य असंगठित मज़दूरों के स्थायी रोजगार व सामाजिक सुरक्षा की माँग पर;
  • असंगठित मज़दूरों के लिए पेंशन की माँग पर और
  • केंद्र सरकार की मज़दूर विरोधी-जनविरोधी नीतियों के खिलाफ-

26 नवम्वर, 2020 की देशव्यापी हड़ताल को सफल बनाओ!

मज़दूर आन्दोलन को मज़दूर वर्ग के निरंतर, जुझारू और निर्णायक संघर्ष में तब्दील करो!

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,

मज़दूर सहयोग केंद्र

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