इस सप्ताह : निलय उपाध्याय की पांच कविताएं !

बेदख़ल / निलय उपाध्याय

मै एक किसान हूँ
अपनी रोजी नहीं कमा सकता इस गाँव में
मुझे देख बिसूरने लगते हैं मेरे खेत

मेरा हँसुआ
मेरी खुरपी
मेरी कुदाल और मेरी,
जरूरत नहीं रही
अंगरेज़ी जाने बगैर सम्भव नहीं होगा अब
खेत में उतरना

संसद भवन और विधान सभा में बैठकर
हँसते हैं
मुझ पर व्यंग्य कसते हैं
मेरे ही चुने हुए प्रतिनिधि

मैं जानता हूँ
बेदख़ल किए जाने के बाद
चौड़े डील और ऊँची सींग वाले हमारे बैल
सबसे पहले कसाइयों द्वारा ख़रीदे गये
कोई कसाई…
कर रहा है मेरी बेदख़ली का इंतजार

घर के छप्पर पर
मैंने तो चढ़ाई थी लौकी की लतर –
यह क्या फल रहा है?
मैने तो डाला था अदहन में चावल
यह क्या पक रहा है?

मैंने तो उड़ाये थे आसमान में कबूतर
ये कौन छा रहा है?

मुझे कहाँ जाना है-
किस दिशा में?

बरगद की छाँव के मेरे दिन कहाँ गये
नदी की धार के मेरे दिन कहाँ गये
माँ के आँचल-सी छाँव और दुलार के मेरे दिन कहाँ गये
सरसों के फूलों और तारों से भरा आसमान
मेरा नहीं रहा

धूप से
मेरी मुलाकात होगी धमन-भट्ठियों में
हवा से कोलतार की सड़कों पर
और मेरा गाँव?

मेरा गाँव बसेगा
दिल्ली मुम्बई जैसे महानगरों की कीचड़-पट्टी में


जिबह-बेला / निलय उपाध्याय

मेरे मुँह मे ठुँसा है कपड़ा
ऐंठ कर पीछे बँधे हैं हाथ

कोई कलगी नोचता हॆ
कोई पाख
कोई गर्दन काटता हॆ
कोई टाँग
हलक मे सूख गई हॆ
मेरी चीख़

मारने से पहले जैसे बिल्ली
चूहे से खेलती है
कोई
खेल रहा है हमसे

लो
फिर आ गए
फिर आ गए सात समन्दर पार से
कसाई….

फिर आया गँडासा
दिल्ली के हाथ


चूहेदानी / निलय उपाध्याय

टूट गई चूहेदानी
टूट गया बरसों का संचित यक़ीन

दीवारों को जंग खा गई
लाचार है लौह-तीलियाँ
कह भी नही पाती
कि चौकस नहीं रही अब उसकी चोंच

घर में गेहूँ के बोरे से
कपड़े तक
कुछ नहीं नहीं सलामत,
हवा में उड़ते है कविताओं के पन्ने
गाँधी की आत्मकथा का हाल देख आती है रूलाई
और यह कैसे बयान करूँ कि
हमारी नज़रो के सामने
एक चूहा आया
रसोई में घुसा, ढक्कन हटाया, रोटी निकाली
और चूहेदानी में घुसकर खाता रहा
इतमिनान से

भाड़ में जाय ऐसी चूहेदानी

मगर चूहे ?
चुहे
किसी से नहीं डरते

बिल्ली की
गर्दन में घंटी बाँध देते हैं
कुतर देते है बाँस…
बाँसुरी वाले का

क्या सचमुच कोई अयस्क नहीं
धरती के गर्भ मे

क्या सचमुच कोई कारीगर नहीं
किसकी चाकरी मे लगा है विज्ञान

सुनो
अरे कोई तो सुनो..

देखो…
अरे कोई तो देखो

नूनी खा गया
नींद मे सोए
मेरे अबोध बेटे की
लोढ़े की तरह एक मोटा चूहा ।


भोजन की जंग में / निलय उपाध्याय

कुत्तों और गिद्धों के बीच छिड़ी
भोजन की जंग में
आदमी
गिद्धों के साथ था

सुबह की सुनहरी धूप में
डांगर का माँस
इतना रक्तिम, इतना ताज़ा लग रहा था
जैसे शिकार किया हो अभी-अभी
सेना कुत्तों की थी तो कम न थी पलटन गिद्धों की
थोड़ी देर तक चला सब कुछ ठीक-ठाक
फिर शुरू हो गई
गिद्धों की क्रे…क्रे… कुत्तों की भौं…भौं…

कभी गिद्ध कुत्तों का पीछा करते
कभी कुत्ते गिद्धों का

आदम ने डंडा उठाया तो
दूनी ताकत से भौंके कुत्ते,
उत्साह से भरे … मगर यह क्या
आदमी ने कुत्तों को ही खदेड़ा और
खदेड़ता रहा घूम-घूमकर दस फीट की परिधि में
डांगर की खाल उतर चुकी थी और उसे जल्दी थी

बहुत मायूस होकर देखा कुत्तों ने
आदमी का न्याय
अब हड्डियों के लिए था
और वह गिद्धों के साथ था ।


जेबकतरा / निलय उपाध्याय

मालवानी की चाल में
पूरे एक महीने के
प्रशिक्षण के बाद निकला था
जेबकतरा
आज पहला दिन था उसका
बोहनी का दिन ।

मुम्बई की लोकल मे,
उसे हर स्टेशन पर उतरना था
और करना था
उस्ताद को फ़ोन

दस दिनों तक सीखा था उसने
नाख़ून के भीतर ब्लेड घुसाना
दस दिनों तक सीखा
पानी से भरे बर्तन मे कमल के पत्ते पर
इस तरह मारना ब्लेड कि पानी की बून्द
ब्लेड पर न पड़े और आख़िरी दस दिनो तक
अँग्रेज़ी के वी आकृति मे जेब पर ब्लेड चलाना
ताकि आसानी से आकर
हाथ मे गिरे पर्स

मलाड मे
फ़ोन कर उस्ताद को किया प्रणाम
कामयाबी की दुआएँ ली और सवार हो गया
मुम्बई की लोकल में, पहले देखो, समझो
फ़िर लगाओ हाथ, उस्ताद की नसीहत
याद करने मे पता ही नहीं चला
कब आ गया गोरेगाँव

गोरेगाँव उतर गया
और दूसरी ट्रेन के आने के पहले
जब लगाया फ़ोन अपने उस्ताद को
रह गया भौंचक, पैसा ही नही बचा था मोबाईल मे
उस्ताद से बात करने के बाद शेष थे
चौवन रूपए पचास पैसे मोबाईल में,
किसने काट लिए आते आते
गोरेगाँव



28 जनवरी, 1963 को बिहार में जन्मे निलय उपाध्याय हिंदी के सुपरिचित कवियों में एक हैं ! इनके कविता संकलन हैं- अकेला घर हुसैन का, कटौती और जिबह वेला ! इनके दो उपन्यास-अभियान और वैतरनी प्रकाशित हो चुके हैं ! इन्होने गंगोत्री से गंगा सागर तक की साइकिल से यात्रा की ! ये मुंबई में रहते है और पटकथा लेखन से जुड़े हैं ! पहाड़ इनका तीसरा उपन्यास है जो दशरथ मांझी के जीवन पर आधारित है !


%d bloggers like this: