पूंजीवादी लूटपाट की महागाथा – दरभंगा के अशोक पेपर मिल के बंद होने की कहानी

कारखाना पूरी तरह खंडहर लेकिन, खस्ता हालत से उबारने का दे दिया गया  ठेका

दरभंगा: बिहार के दरभंगा जिले के बाहरी हिस्सों में 400 एकड़ की अहम ज़मीन पर काबिज अशोक पेपर मिल 11 नवंबर, 2003 से बंद पड़ी है। चीनी उद्योग की तरह, यह भी खराब हालत में चल रहा एक और खराब उद्यम है। जबकि एक दौर में यह मिल अपने गुणवत्तापूर्ण कागज़ के उत्पादन के लिए जानी जाती थी।

इस उद्यम को 1958 में दरभंगा राजा (खंडवाल वंश) ने हयाघाट विधानसभा के रामेश्वर नगर में स्थापित किया था। यह दरभंगा से कुछ दूर स्थित कस्बा है, जो बागमती नदी के आसपास बसा है। इस ज़मीन को इलाके के किसानों से इस वायदे के साथ लिया गया था, कि उन्हें नौकरियां दी जाएंगी और इलाके का विकास होगा। उस वक़्त पूरे उत्तर बिहार में यही एक बड़ा उद्योग था। कंपनी की 1963 में दो यूनिट हो गईं। एक दरभंगा के रामेश्वर नगर और दूसरी असम के जोगीहोपा में। इसे 1970 में सरकार ने अधिग्रहित कर लिया, तब यह बिहार सरकार, असम सरकार और केंद्र के बीच एक संयुक्त उद्मय बन गया। इंडस्ट्रियल बैंक ऑफ इंडिया (IDBI) इसका मुख्य निवेशक था। 1978 के बाद कंपनी की वित्तीय स्थिति खराब होना शुरू हो गई। इसकी वजह कथित भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन था। 1982 आते-आते कारखाना बंद हो गया। कुछ लोगों का कहना है कि वित्त से इतर, बिजली और कच्चे माल की कमी से कारखाना बंद हुआ था।

15 अगस्त, 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के बीच हुए असम शांति समझौते से अशोक पेपर मिल को दोबारा खड़ा करने का रास्ता निकला। केंद्र ने असम की यूनिट के लिए 67 करोड़ रुपयों का आंवटन किया। केंद्र सरकार पर दोनों ईकाईयों में भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए अशोक पेपर मिल कामग़ार यूनियन (APKMU) ने नई दिल्ली में एक विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में उन्होंने दोनों ईकाईयों को बराबर फायदे देने और दोनों को उबारने की अपील की। मई 1987 में 9 दिन चली इस भूख हड़ताल के बाद केंद्रीय मंत्री जे वेंगल राव ने प्रदर्शनकारियों की मांगें मान लीं और लिखित में वायदा किया। लेकिन इससे भी कुछ हासिल नहीं हुआ। यह भूख हड़ताल APKMU के प्रेसिडेंट उमाधर सिंह के नेतृत्व में हुई थी, जो कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के नेता थे, वे हयाघाट विधानसभा से दो बार विधायक (1985-1990 और 2000-2005) भी चुने गए।

बिहार यूनिट की वित्तीय स्थिति अच्छी नहीं हो पाई। 1988 में मामले को बोर्ड ऑफ इंडस्ट्रियल एंड फॉयनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन (BIFR) के पास बढ़ाया गया, जहां 15 नवंबर, 1989 को दोनों ईकाईयों को अलग-अलग करने का फैसला लिया गया। यह फ़ैसला लिया गया कि दोनों राज्य सरकारें अपनी-अपनी ईकाई पर नियंत्रण लेंगी और केंद्र सरकार उन्हें वित्तीय और तकनीकी मदद प्रदान करेगी। असम सरकार ने 1990 में अपनी ईकाई का नियंत्रण ले लिया। लेकिन बिहार सरकार ने ऐसा नहीं किया। नतीज़तन APKMU ने सुप्रीम कोर्ट में रिट पेटिशन दाखिल की।

15 नवंबर, 1991 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि BIFR द्वारा जो समझौता किया गया है, उसे लागू किया जाए। लेकिन केंद्र ने रास्ता बदल दिया और औद्योगिक खस्ताहाल को सुधारने के लिए निजीकरण का नया प्रस्ताव दिया। 1995 में उच्चतम न्यायालय ने औद्योगिक नीति और प्रोत्साहन विभाग के सचिव को अशोक पेपर मिल को फिर से खड़ा करने की संभावना का आंकलन करने के लिए कहा। इस दौरान कामग़ारों के अधिकारों को ध्यान में रखने के लिए कहा गया। विभाग ने बाद में एक प्रस्तावना का मसौदा पेश किया, इसमें निजीकरण के ज़रिए उद्योग को सुधारने की योजना बनाई गई थी। जुलाई, 1996 में कोर्ट ने इस योजना को मान लिया।

IDBI को मर्चेंट बैंकर बनाया गया और नीलामी करवाई गई। अशोक पेपर मिल को आखिरकार 1997 में एक समझौते के तहत मुंबई की कंपनी नोविऊ कैपिटल एंड फॉयनेंस लिमिटेड (NC&FL) को बेच दिया गया। इसके मालिक धर्म गोधा हैं। समझौते के मुताबिक, NC&FL को 16 ब्याज़ रहित किश्तों में 6 करोड़ रुपये देने थे, इसके बाद दोनों राज्य सरकारों की हिस्सेदारी उसकी हो जाती। रिज़र्व बैंक ने कंपनी को “निष्क्रिय” करार दे दिया। यह रिज़र्व बैंक के पास एक गैर बैंकिग वित्तीय कंपनी के तौर पर दर्ज नहीं थी।

कंपनी के एक वरिष्ठ तकनीकी कर्मचारी ने नाम ना छापने की शर्त पर न्यूज़क्लिक को बताया कि “गोधा का इतिहास उनकी अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता। जिन फैक्ट्रियों का अधिग्रहण उन्होंने किया, वे उबर नहीं पाईं और उनकी परिणिति अशोक पेपर मिल की तरह ही हुई। उन पर सार्वजनिक बैंकों और वित्तीय संस्थानों में फर्जीवाड़े का आरोप भी लगा है।” कर्मचारी ने आगे बताया,”1988-89 में गोधा ने यूनिवर्सल पेपर मिल का अधिग्रहण किया गया था, इस मिल की स्थापना 1972 में पश्चिम बंगाल के झारग्राम में हुई थी। एक साल में ही कंपनी की कुल कीमत ऋणात्मक हो गई। BIFR के पास भी कंपनी से संबंधित बात कही गई थी।”

1997 में कंपनी की पेपर मिल में आग लग गई। कर्मचारी ने बताया कि गोधा पर आगे लगाने का आरोप लगा, ताकि उन्हें बीमा का पैसा मिल जाए और वे बैंकों को मूर्ख बना सकें। गोधा के स्वामित्व में अपोलो पेपर नाम की एक कंपनी और थी, जिसने गुजरात सरकार से 1997-98 में कागज मिल लगाने के लिए ज़मीन ली थी। उस मिल को कभी नहीं लगाया गया और ज़मीन को बेच दिया गया।

लेकिन इन आरोपों की स्वतंत्र तरीके से पुष्टि नहीं की जा सकी। इस संवाददाता ने NC&FL के वरिष्ठ कर्मियों से बातचीत की, लेकिन उन्होंने इन आरोपों की जानकारी होने से इंकार कर दिया। योजना के तहत, निवेशकों को अशोक पेपर मिल को उबारने के लिए 504 करोड़ रुपये इकट्ठे करने थे। यह पैसा 36 महीनों में इकट्ठा किया जाना था, नहीं तो समझौते को अमान्य करार दे दिया जाता।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमति प्राप्त, 38 बिंदुओं वाली इस योजना के तहत दो चरणों में मिल को उबारना था। पहले चरण के तहत निवेशकों को सरकार के साथ समझौता करने के 18 महीनों के भीतर मिल में दोबारा काम चालू करवाना था। दूसरी शर्तों के बीच एक शर्त मिल में मौजूद पूरी श्रमशक्ति को काम देने और उनका पिछला बकाया चुकाने की की भी थी। साथ में, बिगड़े हुए कलपुर्जों को ठीक करवाने के अलावा, मिल की किसी भी संपत्ति को परिसर के बाहर नहीं ले जाया जा सकता था।

यहां गौर करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करते हुए, असली मायनों में पहला चरण कभी शुरू ही नहीं हुआ। नवंबर 1988 में एक तकनीकी सलाहकार की देखरेख में कारखाने का एक ट्रॉयल रन करवाया गया। तकनीकी सलाहकार ने कहा कि कारखाने की 95 फ़ीसदी मशीनरी ठीक ढंग से काम कर रही है, बाकी में भी हल्के-फुल्के सुधार की ही जरूरत है। इस प्रमाणीकरण से गोधा के दूसरा फर्जी प्रमाणपत्र बनवाने का मौका मिला। उस प्रमाणपत्र में कहा गया कि अशोक पेपर मिल ने उत्पादन शुरू कर दिया है। इसके आधार पर दो सार्वजनिक वित्तीय संस्थानों (IDBI से 19 करोड़ रुपये और यूनाईटेड बैंक ऑफ इंडिया से 9 करोड़ रुपये) से कर्ज़ ले लिया गया। मिल में काम चलाने के नाम पर लिया गया यह पैसा कभी कारखाने में निवेश ही नहीं किया गया।

न्यूज़क्लिक को पता चला है कि प्रायोजकों ने 2012 तक सरकार को पहली दो किश्तों का पैसा दे दिया है, लेकिन बाकी के पैसे की स्थिति का पता नहीं चल पाया। कर्मचारियों ने कहा अधिग्रहण के बाद कर्मचारियों को उनकी सेवाओं के लिए भुगतान तक नहीं किया गया, जबकि NC&FL ने 28 करोड़ रुपये इकट्ठा किए थे। कारखाने के कलपुर्जे विभाग में तैनात रहे मोतीलाल यादव के बेटे केदार यादव बताते हैं, “कंपनी ने मेरे पिताजी को 19 महीने तनख़्वाह नहीं दी। जब गोधा ने कंपनी का अधिग्रहण कर लिया, तो उसने सभी को विश्वास दिलाया कि उनका पिछला बकाया भी चुका दिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि मेरे पिताजी को कंपनी के पे रोल से हटाकर दैनिक वेतनभोगी बना दिया गया। नए प्रबंधन के दौर में उन्हें अपने काम के पैसे तक नहीं दिए गए। 2018 में वे रिटायर हो गए और उनके पास किसी तरह की रिटायरमेंट सुविधाएं नहीं थीं। प्रॉविडेंट फंड से उन्हें करीब 55,000 रुपये मिले।”

कामग़ारों का कहना है कि अधिग्रहण के बाद, उनका कर्मचारी दर्ज़ा स्थायी से बदलकर अनौपचारिक कर दिया गया। कारखाने में सुरक्षाकर्मी के तौर पर काम करने वाले रामू यादव ने बताया, “जब गोधा ने कंपनी का अधिग्रहण कर लिया, तो सभी 471 कर्मचारियों को दैनिक वेतनभोगियों में बदल दिया गया। इसका केवल एक ही उद्देश्य था कि कैसे भी श्रमशक्ति को परेशान और उनका शोषण किया जाए।”

दूसरों ने बताया कि उन्होंने कंपनी द्वारा दिलाए इस भरोसे पर काम करना शुरू कर दिया कि जब कारखाना चालू हो जाएगा, तो उन्हें उनका बकाया चुका दिया जाएगा। कारखाने में सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले 55 साल के सुरेश यादव बताते हैं, “अधिग्रहण के बाद हमने केवल इसी शर्त पर काम करना शुरू किया था कि उत्पादन चालू होने के बाद किश्तों में हमारा पुराना बकाया पैसा चुका दिया जाएगा। जिन लोगों ने आवाज उठाई, उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया और नई नियुक्तियां कर दी गईं।

कंपनी के रिकॉर्ड के मुताबिक, कारखाने पर 179 कर्मचारियों के 2।50 करोड़ रुपये बकाया हैं। यह राशि 18 अगस्त, 1997 से 31 दिसंबर, 2002 के बीच की है। इस पूंजी में इंक्रीमेंट और प्रोमोशन जैसे दूसरे फायदे शामिल नहीं हैं। अपने सातवें दशक के आखिर में चल रहे सूरज साहनी हस्तक्षेप करने के पहले दूसरे लोगों की बात ध्यान से सुनते हैं। वह बताते हैं कि 1980 के बाद से मिल बंद रहने के बावजूद भी उन्हें उनका वेतन और नौकरी से मिलने वाली सुविधाएं मिलती रहीं। उन्होंने कहा, “मैंने अपनी पूरी जिंदगी इसी कारखाने में काम किया। जब यह बंद हो गया, तब भी लालू ने सुनिश्चित करवाया कि हमें सुविधाएं मिलती रहें। लेकिन जबसे नीतीश कुमार ने गोधा को मिल दी है, हमें कुछ नहीं मिला। उसके पास जो कुछ भी कर्मचारी थे, वे स्थानीय नहीं थे। नीतीश ने हमारी आजीविका पर डाका डाला है।”

एक और उम्रदराज पुरुष कहते हैं कि नीतीश कुमार उनका सामना नहीं कर सकते और पिछले 15 सालों से झूठे वायदे किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “2015 के विधानसभा चुनाव में कुमार को मिल के परिसर में एक रैली को संबोधित करना था। कारखाने ने अपने परिसर के इस्तेमाल के लिए NOC भी जारी की थी। स्टेज तैयार था। मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर स्टेज के ऊपर पहुंच गया, लेकिन उसने ज़मीन पर लैंडिंग नहीं की। मुसीबत का अंदेशा होते ही जिला प्रशासन ने 11 वें घंटे में कार्यक्रम को रद्द कर दिया। हर कोई जानता है कि नीतीश कुमार के काम ना करने और झूठे वायदों से हर कोई बहुत गुस्से में है। इस चुनाव में उनका पूरी तरह से सफाया हो जाएगा।” सभी की कहानियां अलग-अलग तरह की हैं। कंपनी का दावा है कि कारखाने ने 10 साल तक उत्पादन जारी रखा, वहीं कामग़ारों का कहना है कि बमुश्किल एक साल तक ही उत्पादन हुआ होगा।

NC&FL के एक मुख्य इंजीनियर ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, “हमने नवंबर, 1998 में उत्पादन शुरू किया था। यह उत्पादन अगले दस साल तक चलता रहा। कारखाने का ऑपरेशन इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि बिना किसी नोटिस के बिजली बंद कर दी जाती थी। संयंत्र में थोड़े से तकनीकी बदलावों के साथ 2012 में उत्पादन को दोबारा शुरू किया गया, जो 2015 तक चला। लेकिन यह व्यवसायिक उत्पादन नहीं था।”

कंपनी कारखाने के ना चल पाने के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराती है। इंजीनियर ने बताया, “यह पूरी तरह से नीतीश सरकार की असफलता थी, जिसने हमें किसी भी तरह से समर्थन नहीं दिया। समझौते के मुताबिक़, सरकार को हमें वित्तीय मदद मुहैया करानी थी। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को कारखाने में ऑपरेशन के दूसरे चरण में मदद करने के लिेए कहा। जबकि हम पहले चरण का ऑपरेशन सफलता के साथ पूरा कर चुके थे। कामग़ारों की यूनियन को भ्रमित किया गया और हमारे खिलाफ़ खड़ा कर दिया गया। हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं बचा, इसलिए हमें मिल को बंद करना पड़ा।” इंजीनियर ने दावा किया कि जिस दिन सरकार से सभी से पैसा आ जाएगा, उसी दिन उत्पादन चालू हो जाएगा, क्योंकि सभी मशीनें सुचारू अवस्था में हैं। जब हमने उससे पूछा कि क्या कारखाने के दोबारा चालू होने की कोई संभावना है, तो उसने कहा, “कंपनी प्रायोजक की तलाश कर रही है। यहां तक कि प्रायोजक खोजने में भी सरकार हमारी मदद नहीं कर रही है।”

लेकिन कारखाने में काम करने वाले लोग इन दावों को खारिज करते हैं, वे कहते हैं कि धर्म गोधा के अधिग्रण करने के बाद कारखाने में सिर्फ एक ही साल उत्पादन हुआ है। कारखाने के कर्मचारी रहे मनोज कुमार यादव बताते हैं, “2001 में उत्पादन शुरू हुआ था और 2002 में रोक दिया गया था। इस अवधि में जो कागज़ बनाया गया, उसकी गुणवत्ता बेहद घटिया थी। इस अवधि में कागज़ के उत्पादन की मात्रा मे भी बहुत कमी आई। आधिकारिक तौर पर कारखाने की उत्पादन क्षमता एक दिन में 80 टन की है। लेकिन हम पुराने दौर में अच्छी गुणवत्ता वाला 150 टन उत्पादन हर दिन करते थे। लेकिन जब गोधा ने अधिग्रहण किया, तो उसके बाद 40 टन प्रतिदिन तक उत्पादन की गिरावट आ गई। यह कहना पूरी तरह गलत है कि 2012 में गैर व्यवसायिक उत्पादन शुरू हुआ था।”

मनोज कुमार यादव के आरोपों का दूसरे कामग़ारों ने भी समर्थन किया। उन्होंने कहा कि 2002 के बाद कागज़ के एक पन्ने का तक उत्पादन नहीं किया गया। कामग़ार आरोप लगाते हुए कहते हैं कि जब भी कोई सरकारी कर्मचारी जांच के लिए आता, वह लोग उसमें भूसा भर देते, ताकि चिमनियों से आग का धुंआ निकलना शुरू हो जाए। जहां तक संयंत्र की मशीनरी के अच्छी हालत में होने की बात है, तो कामग़ार दावा करते हैं कि कारखाना एक खंडहर से ज़्यादा कुछ नहीं बचा है।

कारखाने के निर्देश विभाग में फिटर का काम करने वाले सुरेंद्र यादव आरोप लगाते हैं, “कारखाना पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। कारखाने के उबारने के नाम पर उसकी संपत्तियों को लूटा गया। कारखाने में जर्मनी और फ्रांस से मंगवाई गई आधुनिक मशीनें थीं। अगर उनका दावा है कि कारखाना सही हालत में है, तो क्यों नहीं वे पत्रकारों को अंदर जाने देते और तस्वीर खींचने की अनुमति देते हैं? वे लोग झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने सारी चीजें लूट ली हैं। गोधा ने जिन चीजों की तस्करी की है, उनकी कीमत करोड़ों में है।”

इन लोगों का आरोप है कि पेपर मिल को थलवारा रेलवे स्टेशन से जोड़ने वाली रेल लाइन को तक नहीं छोड़ा गया, जिसका इस्तेमाल सामान के लाने-ले जाने में होता था। IDBI और यूनाइटेड बैंक से कारखाने को सुधारने के नाम पर कर्ज़ लेने के बाद, गोधा ने कारखाने को बंद कर दिया। इसके बाद 11 नवंबर, 2003 को अगले सात साल के लिए वह लापता हो गया। बिहार में एनडीए के शासन में आने के बाद, जल्द ही 2011 में वह दोबारा सामने आया। कारखाने में काम करने वाले आरोप लगाते हैं कि कारखाने में सुधार के नाम पर उसने उच्च दर्जे की तकनीक वाली मशीनों को हटाना शुरू कर दिया। इन कामग़ारों ने 10 नवंबर, 2012 को कारखाने के परिसर से बाहर आते और लोहे के सामानों से लदे ट्रकों का विरोध भी किया। कंपनी के हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों ने इसके जवाब में गोलियां चला दीं, जिसमें सुशील शाह नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई, वहीं दुखी यादव और जय कुमार यादव घायल हो गए।

3 अगस्त, 2013 को मामले में गोधा को मुख्य आरोपी बनाया गया। उसकी एंटीसिपेटरी बेल भी खारिज़ कर दी गई, लेकिन इसके बावजूद गोधा को गिरफ़्तार नहीं किया गया और वह अब भी फरार है। इसके बावजूद उसे कारखाने पर नियंत्रण की अनुमति मिल गई। उद्योग विभाग में कोई भी इस मामले पर टिप्पणी नहीं करना चाहता।

( तारिक अनवर, न्यूज़क्लिक से साभार)

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