कोरोना लॉकडाउन को दुनिया का सबसे बड़ा कारावास मानते हैं अर्जेंटीना के लोग

लॉकडाउन के नियम काफी सख़्त, पांच महीने से हैं घरों में कैद

कोरोना वायरस का प्रकोप पूरी दुनिया में है. कुछ देशों में लॉकडाउन अब भी लागू है, कुछ देशों में कुछ ढील के साथ लॉकडाउन लागू है तो कुछ देश ऐसे भी हैं जहां लॉकडाउन को पूरी तरह से हटा लिया गया है. लेकिन विश्व इतिहास में संभवत: यह पहला मौक़ा है जब पूरी दुनिया लगभग थम सी गई है.

अर्जेंटीना में कुछ मज़ाकिया लोगों ने इस दौर के लिए एक नया शब्द ईजाद किया है- क्वारेटर्नल. यह शब्द कभी ना ख़त्म होने वाले कोविड-19 क्वारंटीन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इस शब्द और उसके मायने से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अर्जेंटीना में लोग लॉकडाउन को किस तरह से देख रहे हैं. बीते पांच महीने के लॉकडाउन ने लोगों के सोचने के तरीक़े को भी प्रभावित किया है. पांच महीने के लॉकडाउन को अर्जेंटीना के लोग अब दुनिया का सबसे बड़ा और निर्बाध कारावास मान रहे हैं.

लेकिन इस मज़ाक से इतर कोई भी ऐसा नहीं है जो अर्थव्यवस्था पर हंस रहा हो और कोई ऐसा भी नहीं है जो 20 मार्च के बाद से बदले हालातों के कारण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तौर पर आए बदलावों पर मुस्कुरा रहा हो.

लॉकडाउन ने अर्जेंटीना के आर्थिक केंद्र यानी दिल कहे जाने वाले मेट्रोपोलिटन प्रांत ब्यूनस आयर्स को सबसे अधिक प्रभावित किया है. जहां देश की क़रीब चालीस फ़ीसदी जनता रहती है और जहां कोरोना वायरस ने सबसे अधिक दहशत फैलायी है. कोरोना वायरस संक्रमण के 25 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक़, अर्जेंटीना में अब तक तीन लाख 50 हज़ार से अधिक मामले सामने आए हैं. संक्रमण के लिहाज़ से अर्जेंटीना दुनिया का पंद्रहवां सबसे अधिक प्रभावित देश है. लेकिन देश में अभी तक 7300 से अधिक मौतों की पुष्टि भी हुई है. हालांकि अर्जेंटीना में मरने वालों की संख्या अपने पड़ोसी देशों ब्राज़ील, चिली, कोलंबिया और कई यूरोपीय देशों की तुलना में काफी कम है.

अगर इटली की बात करें तो यहां संक्रमण के मामले भले ही अर्जेंटीना की तुलना में कम हों लेकिन मरने वालों की संख्या कहीं अधिक है. अर्जेंटीना की तुलना अगर एशियाई देश फ़िलीपिंस से करें तो यहां चार महीने का लॉकडाउन था और यहां अभी तक दो लाख केसों की ही पुष्टि की गई है जबकि मरने वालों की संख्या भी तीन हज़ार के लगभग ही है. अर्जेंटीना में लॉकडाउन के नियम काफी सख़्त हैं. ब्यूनस आयर्स में रहने वाले लोगों को सिर्फ़ खाने-पीने की चीज़ों के लिए दुकान पर जाने की अनुमति है और सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ों की ख़रीदारी के लिए ही यहां के लोग पास की दुकानों तक जा सकते हैं. व्यस्कों का मनोरंजन या सैर-सपाटे के लिए घर से बाहर जाना मना है. सार्वजनिक यातायात के साधन सिर्फ़ उन लोगों के लिए हैं जिन्हें बहुत ज़रूरी काम से घर के बाहर निकलना पड़ रहा है और या फिर उनके लिए जिनके पास स्पेशल परमिट हो. जो लोग बिना परमिट के अपनी गाड़ी लेकर सड़कों पर निकल रहे हैं और उनके लाइसेंस रद्द कर दिये जा रहे हैं या फिर निलंबित. बीते जून महीने से ही लोगों को घर से बाहर दौड़ने जाने के लिए अनुमति दी गई है लेकिन वो सिर्फ़ तय घंटों के दौरान. अर्जेंटीना में अधिकारियों का कहना है कि इन पाबंदियां के चलते ही हज़ारों लोगों को कोरोना की चपेट में आने से बचा लिया गया. वे इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि अर्जेंटीना में कोरोना संक्रमण के जितने भी मामले सामने आए हैं उनमें से करीब 90 फ़ीसदी एएमबीए प्रांत में हैं.

अर्जेंटीना में प्रति लाख लोगों पर मृत्यु दर 13.6 है. यह दर लैटिन अमरीका के और दुनिया के कई देशों की तुलना में बेहद कम है. इसके अलावा देश में स्वास्थ्य व्यवस्था अब भी बेहतर बनी हुई है और विफल नहीं हुई है. हालांकि कुछ इलाक़ों में संसाधनों की कमी ज़रूर सामने पेश आई. अर्जेंटीना में जारी प्रतिबंधों पर कई लोगों का कहना है कि लॉकडाउन का जो प्रतिफल मिलना था वो मिल चुका है और ऐसे में अब प्रतिबंधों को वापस ले लेना चाहिए. कुछ जगहों को तो देखकर ऐसा लगता भी है कि लोगों ने सरकारी आदेशों को मानना बंद कर दिया है क्योंकि कई इलाक़ों में सोशल डिस्टेंसिंग के विपरीत लोगों की भीड़ देखी गई.

समाचार पत्र पगीना 12 में 3 अगस्त को प्रकाशित एक सर्वेक्षण के मुताबिक़, दस में से आठ अर्जेंटीना वासी का मानना है कि लॉकडाउन वायरस को रोकने में सफल रहा. वहीं क़रीब 70% से अधिक लोगों ने जारी शर्तों में छूट की मांग की है. अर्जेंटीना में लॉकडाउन के नियम 30 अगस्त तक लागू रहेंगे. लॉकडाउन के नियमों की अवहेलना से हालांकि संक्रमण के मामलों में तेज़ी आई है. मौजूदा समय की बात करें तो अर्जेंटीना प्रति 24 घंटे में आने वाले मामलों के लिहाज़ से अग्रणी देशों में से एक है. सरकार और उसके आलोचक एक-दूसरे पर इन मामलों के बढ़ने को लेकर छींटाकशी करने में पीछे नहीं हैं.

अधिकारियों का कहना है कि मामलों में आई तेज़ी के लिए उन्हें ही ज़िम्मेदार माना जाना चाहिए जो नियमों को तोड़ रहे हैं. वहीं आलोचकों के मुताबिक़, बढ़ते केस ये दिखाते हैं कि सरकार की रणनीति फ़ेल रही है.

अगस्त महीने की शुरुआत में सरकार ने एक डिक्री जारी कर बंद जगहों पर होने वाले सभी सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों पर प्रतिबंध लगा दिया था. इन नियमों की अवहेलना को अपराध के तहत रखा गया जिसमें दो साल की सज़ा का भी प्रावधान तय किया गया. हालांकि यह दूसरी बात है कि अभी तक ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है. इसके विरोध में 17 अगस्त को हज़ारों की संख्या में लोगों ने मार्च करके विरोध दर्ज कराया. बीते साल दिसंबर में पद संभालने के बाद से राष्ट्रपति अलबर्टो के अब तक के कार्यकाल में हुआ यह सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन रहा.

हालांकि इस बात की सटीक गणना कर पाना मुश्किल है कि लॉकडाउन में कितना नुकसान हुआ लेकिन सच्चाई यह है कि अर्जेंटीना साल 2001-2002 के गंभीर आर्थिक संकट के बाद से देश अपनी सबसे बड़ी आर्थिक गिरावट का सामना कर रहा है. महामारी से पहले से ही देश मंदी के दूसरे वर्ष में था. अब लॉकडाउन ने हज़ारों ग़ैर-ज़रूरी कारोबारों पर ताला लगा दिया है. अर्जेंटीना के चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड सर्विसेज़ के मुताबिक़, क़रीब 42 हज़ार छोटे और मध्यम इंटरप्राइज़ेज़ मार्च से बंद हैं. यह संख्या साल 2001-2002 के आंकड़ों का दोगुना है. सैकड़ों और हज़ारों लोग अपना रोज़गार खो चुके हैं और उन्हें यह भी पता नहीं है कि लॉकडाउन के बाद उन्हें नौकरी मिलेगी या नहीं. इन सभी बातों के साथ ही लोगों के स्वास्थ्य पर भी इस लॉकडाउन ने असर डाला है. अर्जेंटीना के जाने-माने न्यूरोसाइंटिस्ट फाकुंडो मेनेस के द इनेको फ़ाउंडेशन का मानना है कि अवसाद की समस्या पांच गुना बढ़ी है. अर्जेंटीना में लोगों को यह भी नहीं पता है कि वो अपने बच्चों को दोबारा स्कूल कब भेज पाएंगे. देश में ज्यादातर विमान सेवाएं रद्द हैं और उड्डयन मंत्रालय ने घोषणा भी कर रखी है कि विमान सेवाएं एक सितंबर तक के लिए रद्द ही रहेंगी. इन सारी चिंताओं से इतर विशेषज्ञ जिस बात को लेकर सबसे अधिक परेशान हैं वो है स्वास्थ्य से जुड़ी दूसरी परेशानियां. विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन के कारण दूसरी कई किस्म की बीमारियां लोगों में घर कर रही हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्यूनस आयर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है देश की आधे से अधिक आबादी ने कोई हेल्दी एक्टिविटी नहीं की है. अर्जेंटीना की न्यूट्रिशियन सोसायटी के मुताबिक़, दस में से छह लोगों का वज़न बढ़ा है. लेकिन जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है वो अभी आंखों के सामने नहीं आया है. कुछ प्रमुख स्वास्थ्य संगठनों ने इस बात को लेकर चिंता ज़ाहिर की है कि जबसे लॉकडाउन शुरू हुआ है मेडिकल कंस्लटेशन के लिए आने वाले लोगों की संख्या बहुत कम हुई है. लोगों ने कोरोना वायरस के डर से डॉक्टर से सलाह लेनी बंद कर दी है.

( वेरोनिका स्मिंक, बीबीसी न्यूज़ से साभार)

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